चंदौली: जिले के मुगलसराय विधानसभा क्षेत्र के कुंडा गांव में इन दिनों धान की रोपाई का काम शुरू हो गया है. जिले में पर्याप्त बारिश नहीं होने और नहरों में पानी की कमी के बावजूद गांव में हल्की बारिश के बीच किसान खेतों में धान की रोपाई करा रहे हैं. खेतों में बड़ी संख्या में महिलाएं मजदूरी कर रही हैं. इन महिलाओं का कहना है कि धान की रोपाई का काम महज 10 से 20 दिन ही चलता है. इसके बाद कटाई का मौसम आने तक उन्हें काम की तलाश में घर बैठना पड़ता है. मजदूरी में थोड़ी बढ़ोतरी जरूर हुई है, लेकिन सरकारी योजनाओं का लाभ आज भी अधिकांश महिलाओं तक नहीं पहुंच पाया है.
खेतों में मेहनत, लेकिन सीमित रोजगार
लोकल 18 की टीम जब कुंडा गांव के खेतों में पहुंची, तो वहां करीब 8 महिलाएं धान की रोपाई में जुटी थीं. पानी से भरे खेत में घंटों खड़े होकर महिलाएं धान के पौधों को एक निश्चित दूरी पर रोप रही थीं. यह काम काफी मेहनत और अनुभव वाला माना जाता है. महिलाएं बताती हैं कि बरसात के इस मौसम में यही उनका सबसे बड़ा रोजगार होता है.
मजदूरी बढ़ी, लेकिन महंगाई के सामने कम
धान की रोपाई कर रहीं गुड्डी देवी ने लोकल 18 से बताया कि वह कई वर्षों से यह काम कर रही हैं. उन्होंने कहा कि पिछले साल रोपाई की मजदूरी के रूप में 8 किलो गेहूं या करीब 200 रुपये मिलते थे. इस वर्ष मजदूरी बढ़ाकर 10 किलो गेहूं या लगभग 250 रुपये कर दी गई है. हालांकि उन्होंने कहा कि बढ़ती महंगाई के बीच यह मजदूरी भी परिवार चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है. गुड्डी देवी ने बताया कि रोपाई का काम खत्म होने के बाद उन्हें कोई नियमित रोजगार नहीं मिलता. कुछ दिन बाद धान की कटाई का काम आता है, तब दोबारा मजदूरी मिलती है. बाकी समय घर पर रहकर जैसे-तैसे परिवार का गुजारा करना पड़ता है.
सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिला
गुड्डी देवी ने कहा कि उन्हें सरकार की ओर से किसी भी योजना का लाभ नहीं मिला. उन्होंने बताया कि न तो उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिला और न ही अन्य सरकारी सुविधाएं मिलीं. उन्होंने कहा कि कई बार आवेदन और जानकारी देने के बावजूद उन्हें किसी योजना में शामिल नहीं किया गया.
ससुराल में सीखा रोपाई का काम
खेत में काम कर रही गायत्री देवी ने लोकल 18 से बताया कि वह पिछले 2 वर्षों से धान की रोपाई कर रही हैं. उन्होंने यह काम अपनी ससुराल में सीखा. उन्होंने कहा कि एक दिन में करीब ढाई बिस्वा खेत की रोपाई कर लेती हैं, जिसके बदले 10 किलो गेहूं या लगभग 250 रुपये मजदूरी मिलती है. उन्होंने भी बताया कि आज तक उन्हें किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला. न आवास मिला, न शौचालय और न ही अन्य सुविधाएं. उन्होंने कहा कि कई बार सूची में नाम जुड़ने की उम्मीद जगी, लेकिन आज तक कोई लाभ नहीं मिला.
बस मेहनत ही सहारा है
मीरा देवी भी वर्षों से खेतों में मजदूरी कर रही हैं. उन्होंने लोकल 18 से बताया कि परिवार का गुजारा खेती की मजदूरी पर ही निर्भर है. धान की रोपाई और फसल की कटाई के दौरान ही उन्हें रोजगार मिलता है. बाकी समय रोजगार का कोई स्थायी साधन नहीं होता. सरकारी योजनाओं के सवाल पर उन्होंने भी निराशा जताई. उन्होंने कहा कि आज तक उन्हें किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला. उन्होंने सरकार से मांग की कि गरीब मजदूर परिवारों तक योजनाओं का लाभ ईमानदारी से पहुंचाया जाए, ताकि उनका जीवन थोड़ा आसान हो सके.
महिलाओं की एक जैसी कहानी
गांव में जिन भी महिलाओं से बातचीत की गई, लगभग सभी की समस्याएं एक जैसी सामने आईं. अधिकांश महिलाओं ने बताया कि उनके पास नियमित रोजगार नहीं है. साल में कुछ दिन धान की रोपाई और फिर कटाई के दौरान ही मजदूरी मिलती है. इसके अलावा पूरे साल रोजगार का संकट बना रहता है. कई महिलाओं ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना, शौचालय निर्माण और अन्य सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी तो है, लेकिन उन्हें अब तक इनका लाभ नहीं मिला. कुछ महिलाओं ने बताया कि गैस कनेक्शन तो मिला, लेकिन सब्सिडी नहीं आती.
रोजगार के स्थायी अवसर उपलब्ध
बता दें कि कुंडा गांव की यह तस्वीर ग्रामीण मजदूर महिलाओं की जिंदगी की वास्तविकता को सामने लाती है. खेतों में घंटों मेहनत करने वाली ये महिलाएं सीमित मजदूरी और मौसमी रोजगार के भरोसे अपने परिवार का पालन-पोषण कर रही हैं. मजदूरी में थोड़ी बढ़ोतरी जरूर हुई है, लेकिन रोजगार की कमी और सरकारी योजनाओं से वंचित रहने की शिकायतें आज भी बरकरार हैं, ऐसे में इन महिलाओं की मांग है कि सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक समय पर पहुंचे और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के स्थायी अवसर भी उपलब्ध कराए जाएं, ताकि उनका जीवन केवल मौसम पर निर्भर न रहे.