महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़े सियासी भूचाल की चरम पर है. उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के कई सांसदों के पार्टी से अलग होने की अटकलों ने जोर पकड़ लिया है. हालात ऐसे हैं कि पार्टी के वरिष्ठ नेता अपने सांसदों से फोन पर भी संपर्क नहीं कर पा रहे हैं. कई सांसदों के मोबाइल फोन बंद बताए जा रहे हैं, जिससे मातोश्री की चिंता और बढ़ गई है.
खबर है कि उद्धव ठाकरे और पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेता खुद सांसदों को मनाने और पार्टी के साथ बनाए रखने की कोशिश में जुट गए हैं. इसी बीच दिल्ली में तेजी से बदलते घटनाक्रम ने महाराष्ट्र की राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है.
दिल्ली पहुंचे एकनाथ शिंदे, बागियों के साथ होगी बैठक
सूत्रों का दावा है कि उद्धव गुट के कुछ सांसद आज सुबह करीब 8:30 बजे श्रीकांत शिंदे के दिल्ली स्थित आवास पर बैठक करेंगे. इस बैठक में शिंदे पिता-पुत्र भी मौजूद रहेंगे.
बताया जा रहा है कि इसके बाद कुछ सांसद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से भी मुलाकात कर सकते हैं. चर्चा यह है कि पहले लोकसभा में एक अलग संसदीय समूह बनाने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी और बाद में उस समूह का विलय शिंदे नेतृत्व वाली शिवसेना में कराया जा सकता है.
किन सांसदों के नाम चर्चा में?
सियासी गलियारों में जिन सांसदों के नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, उनमें संजय दीना पाटिल, संजय देशमुख, नागेश पाटिल अष्टीकर, ओमराजे निंबालकर, भाऊसाहेब वाकचौरे और संजय जाधव शामिल हैं. इसके अलावा राजाभाऊ वाजे का नाम भी संभावित बागियों की लिस्ट में जोड़ा जा रहा है.
हालांकि इनमें से कुछ सांसदों ने सार्वजनिक तौर पर पार्टी छोड़ने की बात से इनकार किया है. नासिक के सांसद राजाभाऊ वाजे और मुंबई नॉर्थ ईस्ट के सांसद संजय दीना पाटिल ने कहा है कि वे उद्धव ठाकरे के साथ मजबूती से खड़े हैं.
उद्धव की सेना ने चली ममता वाली चाल
इस सारी अटकलों के बीच उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने ममता बनर्जी वाली चाल चली है. पार्टी के वरिष्ठ सांसद अरविंद सावंत ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि पार्टी के किसी भी सांसद के अलग गुट बनाने या किसी अन्य दल में विलय के दावे को मान्यता न दी जाए. ठीक इसी तरह का पत्र ममता बनर्जी की टीएमसी ने भी स्पीकर ओम बिरला को लिखा था.
इस पत्र में कहा गया है कि शिवसेना यूबीटी एक ही राजनीतिक दल है, और कानून की नजर में वही मान्य है. पार्टी ने कहा कि संसद में पार्टी का अस्तित्व मूल राजनीतिक दल से आता है, इसलिए अलग-अलग गुट बनाकर उसी पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का दावा नहीं किया जा सकता.
सावंत ने अपने पत्र में कहा है कि संविधान की दसवीं अनुसूची में 2003 के संशोधन के बाद अलग गुट बनाने का प्रावधान समाप्त हो चुका है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी सांसद की वैधता राजनीतिक दल से आती है, न कि केवल संसदीय दल से. उन्होंने आग्रह किया कि यदि कोई समूह खुद को अलग गुट बताता है तो उसे किसी भी प्रकार की मान्यता, सुविधा या विशेष दर्जा न दिया जाए.
मातोश्री की बैठक से बढ़ा सस्पेंस
इससे पहले उद्धव ठाकरे ने रविवार को मातोश्री में अपने सभी नौ लोकसभा सांसदों की बैठक बुलाई थी. लेकिन नौ में से केवल चार सांसद ही इस मीटिंग में व्यक्तिगत रूप से पहुंचे. बाकी सांसदों ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या फोन के जरिए हिस्सा लिया. इसी बैठक के बाद राजनीतिक हलकों में सवाल उठने लगे कि आखिर कई सांसद व्यक्तिगत रूप से क्यों नहीं पहुंचे. पार्टी ने इसे सामान्य बताया, लेकिन विरोधी खेमा इसे असंतोष का संकेत बता रहा है.
संजय देशमुख की मुलाकात से बढ़ी चर्चा
शिंदे गुट ने खोले दरवाजे
महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और शिंदे गुट के नेता प्रताप सरनाईक ने संकेत दिया है कि अगर उद्धव गुट के सांसद या विधायक एकनाथ शिंदे के नेतृत्व पर भरोसा जताते हैं तो उनका स्वागत किया जाएगा.
सरनाईक ने कहा कि जो नेता बालासाहेब ठाकरे के विचारों में विश्वास रखते हैं और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में काम करना चाहते हैं, उनके लिए शिवसेना के दरवाजे खुले हैं. उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे नेताओं को प्राथमिकता दी जाएगी.
संजय राउत का पलटवार
इस बीच दिल्ली पहुंचे शिवसेना (यूबीटी) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने टूट की खबरों को सिरे से खारिज कर दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र के सांसदों को खरीदने की कोशिश की जा रही है. राउत ने दावा किया कि कुछ लोगों को सांसदों को अपने पक्ष में करने के लिए करोड़ों रुपये की पेशकश की जा रही है. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि महाराष्ट्र के सांसदों को खरीदने के लिए प्रति सांसद 15 करोड़ रुपये तक की पेशकश की जा रही है. राउत ने यह भी कहा कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है और सभी सांसद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में विश्वास जताते हैं.
चौथी बरसी से पहले बढ़ी बेचैनी
उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) में इस टूट की चर्चा ऐसे समय जोर पकड़ रही है, जब ठीक चार पहले वर्ष 2022 में इसी वक्त एकनाथ शिंदे ने बगावत कर दिया था. उस बगावत ने शिवसेना को दो हिस्सों में बांट दिया और महाराष्ट्र की राजनीति का चेहरा बदल दिया था.
अब सवाल यह है कि क्या इतिहास खुद को दोहराने जा रहा है या फिर उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी को एकजुट रखने में सफल रहेंगे. फिलहाल दिल्ली में चल रही बैठकों और बंद मोबाइल फोन वाले सांसदों ने महाराष्ट्र की राजनीति में सस्पेंस और बढ़ा दिया है.