झारखंड राज्यसभा चुनाव में ऐसा खेला हो गया, जिसकी गूंज 10 जनपथ के गलियारों तक सुनाई देगी. कांग्रेस के लिए सबसे ज्यादा शर्मिंदगी की बात ये है कि जिसके लिए छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जैसे दिग्गज रणनीतिकार रांची भेजे गए, जिनसे खुद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा डायरेक्ट टच में थे, वही कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा चुनाव हार गए. यह सामान्य हार नहीं है, यह ऐसी पटखनी है जो इंडिया अलायंस को हिलाकर रख देगी. आंकड़ों को देखें तो जिस सीट को आसानी से इंडिया अलायंस के कैंडिडेट को जीतना चाहिए था, वही सीट वे हार गए और वह भी 8 वोटों के अंतर से… इस चुनाव ने कांग्रेस के रणनीतिकारों को दिन में तारे दिखा दिए होंगे.
हार के बाद प्रणव झा ने कहा, मैं अपनी पार्टी का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि उन्होंने मुझ जैसे संगठन के कार्यकर्ता को झारखंड से उम्मीदवार बनाया. मैं हमारे सभी विधायकों का भी धन्यवाद करता हूं, जिन्होंने कड़ी मेहनत की और अपनी कोशिशों में कोई कसर नहीं छोड़ी. हर पक्ष को मिले वोटों की संख्या से ही तय होता है कि कौन जीतेगा. राज्यसभा चुनाव में दो सीटें थीं और तीन उम्मीदवार मैदान में थे. विधायकों के डाले गए वोटों के आधार पर दो उम्मीदवार जीते. उनमें से एक झारखंड मुक्ति मोर्चा से हमारी पार्टी के उम्मीदवार बैद्यनाथ राम थे. मैं उन्हें दिल से बधाई और शुभकामनाएं देता हूं. दूसरे निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी थे. मैं उन्हें भी शुभकामनाएं देता हूं. उन्हें मुझसे ज्यादा वोट मिले. मुझे उम्मीद है कि वे झारखंड के लोगों के लिए काम करेंगे और उनकी भलाई में योगदान देंगे. प्रणव झा के इस बयान में नाराजगी नहीं थी, कोई टीस भी नहीं थी, लेकिन इंडिया अलायंस में बवंडर होना तय है.
जब बहुमत साथ था, तो कैसे लगी सेंध
इस पूरे सियासी ड्रामे और हार-जीत के तिलिस्म को समझने के लिए आपको झारखंड विधानसभा के भीतर के गणित को बहुत बारीकी से देखना होगा. विधानसभा में कुल 81 विधायक हैं और राज्यसभा की एक सीट पर जीत पक्की करने के लिए प्रथम वरीयता के 28 वोटों की स्पष्ट दरकार थी. इंडिया अलायंस के झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस पार्टी के टोटल वोट मिला लिए जाएं, तो उनके पास पूरे 56 विधायकों का मजबूत समर्थन था.
गणित एकदम सीधा और सरल था. 28-28 वोट अपने दोनों उम्मीदवारों को दिलाइए और उन्हें शान से राज्यसभा भेज दीजिए. दूसरी तरफ बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के पास सिर्फ 24 विधायक थे, यानी जीत के जादुई 28 के आंकड़े से वे पूरे चार कदम पीछे खड़े थे. इसके बावजूद एनडीए ने हार मानकर मैदान खाली छोड़ने के बजाय एक बहुत बड़ा और आक्रामक दांव खेला. उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवानी को अपना पूर्ण समर्थन देकर मैदान में उतार दिया. यहीं से कांग्रेस के खेमे की नींद उड़नी शुरू हो जानी चाहिए थी, लेकिन वो अपना 56 का आंकड़ा भी नहीं बचा पाए. नतीजा एनडीए के 24 विधायकों का समर्थन लेकर उतरे नथवानी ने सेंधमारी करते हुए 28 वोट बटोर लिए और राज्यसभा की सीढ़ियां चढ़ गए.
कांग्रेस को मझधार में किसने छोड़ा
आंकड़े देखें तो झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी पार्टी का किला तो पूरी तरह से सुरक्षित कर लिया, लेकिन कांग्रेस को मझधार में डूबने के लिए बेसहारा छोड़ दिया. झामुमो के उम्मीदवार बैजनाथ राम को आराम से 30 वोट मिल गए और उनका राज्यसभा जाने का रास्ता एकदम साफ हो गया. इससे एक बात साफ तौर पर जाहिर होती है कि हेमंत सोरेन का अपनी पार्टी के विधायकों पर पूरा और मजबूत कंट्रोल था. उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनके उम्मीदवार के खाते में कोई भी सेंधमारी न हो सके और एक भी वोट इधर से उधर न जाए.
सवाल क्यों उठ रहा
सबसे बड़ा सवाल, क्या इंडिया अलायंस के अंदर दोनों सहयोगी पार्टियों के बीच कोई मजबूत समन्वय या ईमानदारी नहीं थी? झामुमो ने तो अपना काम बखूबी निकाल लिया, लेकिन जब बात गठबंधन धर्म निभाने की आई या कांग्रेस के विधायकों को एकजुट रखने में मदद करने की आई, तो वहां सब कुछ ताश के पत्तों की तरह बिखरता हुआ नजर आया. राजनीति की इस शतरंज की बिसात पर हेमंत सोरेन एक बेहद चतुर और सुलझे हुए खिलाड़ी साबित हुए, जबकि कांग्रेस के बड़े-बड़े रणनीतिकार सिर्फ बगलें झांकते और एक-दूसरे का मुंह ताकते रह गए.
कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका क्यों ?
प्रणव झा को आलाकमान का आशीर्वाद प्राप्त था. वह पार्टी के बेहद करीबी माने जाते हैं. खुद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पल-पल की अपडेट ले रहे थे और क्रॉस वोटिंग के खौफ से ही चुनाव मैनेजमेंट के मास्टर माने जाने वाले भूपेश बघेल को स्पेशल ऑब्जर्वर बनाकर तुरंत रांची भेजा गया था. मतदान से ठीक एक रात पहले की सरगर्मी तो और भी ज्यादा दिलचस्प थी. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सरकारी आवास पर बाकायदा एक ‘मॉक पोल’ यानी डमी वोटिंग का अभ्यास भी आयोजित किया गया था, ताकि किसी भी विधायक से वोट डालने में कोई तकनीकी चूक न हो जाए या कोई बहाना न बना सके. लेकिन जब असली परीक्षा की घड़ी आई तो हकीकत यह रही कि प्रणव झा को मात्र 19 वोट ही नसीब हुए. यानी गठबंधन के जिन विधायकों ने डमी वोटिंग में तो साथ होने का पूरा दिखावा किया, जब असली बैलेट पेपर हाथ में आया तो उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार की पीठ में बेरहमी से खंजर घोंप दिया.