मध्य प्रदेश के बालाघाट में 13 जून को बालाघाट-गर्रा रेलवे ओवर ब्रिज का उद्घाटन हुआ. इस ब्रिज में कई ऐसी तकनीकी खामियां थी लेकिन विवाद हुआ नामकरण को लेकर. दरअसल, इस ब्रिज के लोकार्पण के ठीक एक दिन पहले नामकरण की तख्ती लगाई गई. नाम रखा गया परमार वंश के शासक राजा भोज के नाम पर है.
दरअसल, बालाघाट में एक जाति के लोग राजा भोज को अपना आराध्य मानते हैं. कई लोग ये भी दावा करते हैं कि वह राजा भोज के वंशज है. अब इसी बात पर बहस शुरू हुई कि अगर जनता के टैक्स के पैसों से इस रेलवे ओवरब्रिज का नाम एक जाति के आराध्य के नाम पर ही क्यों रखा गया. यह विवाद इतना बढ़ गया है कि शांति का टापू माने जाने वाले बालाघाट का सामाजिक सौहार्द दांव पर है.
नामकरण के साथ ही शुरू हुआ विवाद
बालाघाट के गर्रा रेलवे ओवर ब्रिज के लोकार्पण से ठीक एक दिन पहले नगरपालिका ने ब्रिज का नाम परमार वंश से ताल्लुक रखने वाले शासक राजा भोज के नाम पर रखा गया. नगरपालिका अध्यक्ष भारती ठाकुर ने एक वीडियो जारी कर कहा था कि गौरी भाऊ (पूर्व मंत्री गौरीशंकर बिसेन) की अनुशंसा पर रखा गया. ऐसे में वही से विवाद शुरू हुआ. सोशल मीडिया पर शुरू हुई बहस चौक-चौराहों तक पहुंची. ब्रिज के लोकार्पण की शाम को पूर्व सांसद कंकर मुंजारे ब्रिज का निरीक्षण करने पहुंचे. यहां पर उन्होंने ब्रिज की गुणवत्ता पर सवाल उठाए. उन्होंने मीडिया के एक सवाल पर कहा बालाघाट के इस रेलवे ओवरब्रिज का नाम स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर रखा जाना चाहिए था. राजा भोज कौन है उन्हें बालाघाट में कौन जानता है. उनका बालाघाट से कोई ताल्लुक नहीं है. ऐसे में राजा भोज नाम रखना सिर्फ एक वर्ग को खुश करने की राजनीति है. इसी के बाद से नामकरण विवाद ने तूल पकड़ लिया. सोशल मीडिया पर ही राजा भोज के उपासकों ने आपत्ति दर्ज करवाई.
पूर्व सांसद के घर का घेराव तक पहुंचा विरोध
ब्रिज के नामकरण का विरोध अब राजनीतिक बयानबाजी तक पहुंचा. एक विशेष जाति के जिलाध्यक्ष विशाल बिसेन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और एफआईआर की मांग को लेकर कलेक्टर और एसपी को ज्ञापन देने की भी बात कहीं गई. लेकिन जब 18 जून को इसी के विरोध में कार्यक्रम रखा गया. फिर उग्र भाषण और माफी की मांग को लेकर एक रैली निकली, जहां पर मध्य प्रदेश के बालाघाट ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के भी लोग विरोध करने पहुंचे. एक रैली निकली जो शहर के अंबेडकर चौक से होते हुए पूर्व सांसद कंकर मुंजारे के घर तक पहुंची. यहां पर कंकर मुंजारे के खिलाफ सिर्फ नारे ही नहीं बल्कि अपशब्द भी कहें गए. नीम का पत्ता कड़वा है, कंकर मुंजारे *&#* है के नारे भी लगे. यहां पर घंटे भर से ज्यादा समय तक प्रदर्शन चलता रहा. आंदोलनकारियों ने पूर्व सांसद को घर से बाहर निकालने के लिए ललकार भी लगाई और कंकर बाहर भी आए लेकिन उन्होंने मांग के मुताबिक माफी नहीं मानी. इस बीच पुलिस ने बीच बचाव किया और कंकर को समझाकर घर में भेज दिया ताकि कोई अनहोनी न हो. इसके बाद कंकर मुंजारे का पुतला दहन भी किया गया. माफी की मांग पूरी नहीं होने पर आंदोलनकारी एसपी कार्यालय पहुंचे, जहां पर एसपी आदित्य मिश्रा से मुलाकात कर एफआईआर दर्ज करवाई गई. आखिर में कंकर मुंजारे के खिलाफ बीएनएस की धारा 299 के तहत मामला पंजीबद्ध हुआ.
इस पूरे प्रकरण में कंकर मुंजारे नें पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए. उनका कहना था कि प्रदर्शन करना सभी का मौलिक अधिकार है लेकिन मेरे घर के आगे प्रदर्शन करना गलत था. वहीं, इस मामले में सीएसपी मयंक तिवारी ने आंदोलनकारियों के रूट और कार्यक्रम के बारे पूछा तो उन्होंने कहा इस प्रदर्शन की अनुमति एसडीएम ने दी. इसलिए उन्हें रूट की जानकारी नहीं थी.
कंकर के समर्थकों ने भी किया थाना घेराव
इसके ठीक अगले दिन कंकर मुंजारे के समर्थकों ने भी आंदोलन को गलत ठहराते हुए आरोप लगाया कि भीड़ की आड़ में पूर्व सांसद पर हमला करने की कोशिश की गई. ऐसे में उन्होंने उस भीड़ के खिलाफ भी एफआईआर करने की मांग की थी. लेकिन पुलिस ने उनका आवेदन तो लिया लेकिन एफआईआर नहीं लिखी.
कंकर ने किया माफी मांगने से इनकार
इस मामले में लोकल 18 ने कंकर से पूछा कि आपको अपने बयान पर अफसोस है, तो उनका कहना था कि यह बयान एक बार नहीं सौ बार दूंगा. मैंने राजा भोज का कोई अपमान नहीं किया है. बस यहीं कहा है कि उनका बालाघाट से कोई ताल्लुक नहीं है. उनका कार्यकाल सिर्फ धार, उज्जैन और भोपाल तक था. वहीं, एक समाज के जिलाध्यक्ष विशाल बिसेन का कहना है कि कौन होते हैं कंकर मुंजारे. उन्होंने हमारे आराध्य पर टिप्पणी कैसे की. भारत का संविधान हमें आजादी देता है कि हम अपने आराध्य को मान सकते हैं. राजा भोज हमारे है और हम उनको पुजते हैं. उन्हें कोई अधिकार नहीं हमारे राजा भोज पर टिप्पणी करने का.
साल भर पहले ही हो चुका है नामकरण
गर्रा रेलवे ओवरब्रिज का नाम राजा भोज रेलवे ओवर ब्रिज रखा गया. लेकिन यह नाम कब तय हुआ. नगर पालिका ने पहले जाहिर क्यों नहीं किया. ऐसे में नगरपालिका की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं. विशाल बिसेन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ही खुलासा किया था कि 28 मार्च 2025 को नगर परिषद की बैठक में 25 से ज्यादा स्थानों का नामकरण किया गया है. इसकी पुष्टि विपक्ष के भी पार्षदों ने की. लेकिन सवाल उठता है कि अगर उन स्थानों के नामकरण किए गए, तो पहले नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए. इससे पहले सरेखा रेलवे ब्रिज का नाम भी सावित्रीबाई फुले के नाम पर रखा गया लेकिन आज तक बोर्ड नहीं लगा. वहीं सरेखा अंडर पास का नाम भी छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम पर रखा गया. लेकिन उसका भी बोर्ड नहीं लगाया गया है. इस मामले में लोकल 18 नपा अध्यक्ष भारती ठाकुर से बातचीत की उन्होंने कहा कि परिषद की बैठक की सारे मुद्दे सार्वजनिक हो जाते हैं. वहीं, बोर्ड नहीं लगने पर कहा कि जल्द सभी स्थानों पर बोर्ड लगाएंगे जाएंगे.
क्या वाकई में राजा भोज का बालाघाट से कनेक्शन
राष्ट्रीय पंवार महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नंदलाल चौधरी ने पूर्व सांसद कंकर मुंजारे के दावे पर आपत्ति दर्ज करवाते हुए बिना किसी शर्त माफी मांगने की मांग की थी. उन्होंने ये भी दावा किया कि राजा भोज ने कलचुरी वंश के शासकों को हराकर उन्होंने बालाघाट सहित इस इलाके में कब्जा जमाया था. उन्होंने कृषि के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य किया था. ऐसे में लोकल 18 ने ऐतिहासिक तथ्यों को जानने के लिए बालाघाट पुरातत्व संग्रहालय के प्रमुख और इतिहासकार वीरेंद्र सिंह गहरवार से बातचीत की. उन्होंने धार के इतिहासकार और लेखक मुकुंद शास्त्री की किताब धार के राजवंश के पंवार राजवंश किताब का संदर्भ देते हुए बताया कि राजा सिंधुराज भोज एक प्रसिद्ध राजा थे. वह सिंधुराज के पुत्र थे. की मौत के बाद राजा भोज को 1010 ई. में गद्दी मिली. उनकी राजधानी धार में थी. मालवा के अलावा पूर्व में विदिशा भोपाल तक राज्य की सीमाएं थी. वहीं, पश्चिम में चित्तौड़गढ़ तक और दक्षिण में कोंकण तक उनकी सीमाएं थी. लेकिन बालाघाट तक उनकी सीमाएं होने के कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते हैं. वहीं, कलचुरी वंश के किस राजा को हराया गया है यह भी वह नहीं बता सके. ऐसे में राष्ट्रीय पंवार महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नंदलाल चौधरी के दावे पर ही सवाल खड़े होते हैं.
ब्रिज की गुणवत्ता पर भी उठे सवाल
सेतु विभाग के एसडीओ अर्जुन सनोड़िया ने मीडिया से बातचीत में बताया था कि 746 मीटर ब्रिज पर पूरा ही फुटपाथ बनाया ही नहीं गया. तब क्या समाज के जिला अध्यक्ष विशाल बिसेन अपने संगठन के साथ आंदोलन करेंगे. इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि भविष्य में समझ आता है कि अगर ब्रिज में भ्रष्टाचार हुआ है. ऐसा समझ आएगा, तब बतौर नागरिक आंदोलन जरूर करेंगे. यह जवाब भी अब कई सवाल खड़े करता है.