Last Updated:
Opinion: राज्यसभा चुनाव के नतीजे आने के पहले से ही चर्चा है कि झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन भाजपा के करीब जा सकते हैं. इसके कई कारण बताए जा रहे हैं. अव्वल तो वे सीबीआई और ईडी के कई कानूनी मामलों में उलझे हुए हैं. भाजपा के साथ रहने पर उन्हें राहत मिल सकती है. दूसरा बड़ा कारण यह कि जिस तरह भाजपा के आगे विपक्षी पार्टियों के सांसद-विधायक नतमस्तक होते जा रहे हैं, वह जेएमएम के लिए भी खतरे की घंटी साबित हो सकती हैं. हेमंत सोरेन की चुप्पी से नई संभावनाओं की अटकलों को बल मिल रहा है.
हेमंत सोरेन और राहुल गांधी. (फाइल फोटो)
अबूझ पहेली बनी ‘इंडिया’ की राजनीति
झारखंड की राजनीति फिलवक्त किसी की समझ में नहीं आ रही. राज्यसभा चुनाव के बाद से यही स्थिति बनी हुई है. सत्ताधारी इंडिया ब्लॉक की चारों पार्टियों कांग्रेस, राजद, सीपीआई (एमएल) और जेएमएम के दूरी कतार के नेता कुछ न कुछ बोल रहे हैं, लेकिन जिन पर गठबंधन का सारा दारोमदार है, उन्होंने खामोशी ओढ़ ली है. जेएमएम के प्रमुख और झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने राज्यसभा चुनाव में इंडिया समर्थित कांग्रेस उम्मीदवार की हार घटक दलों के गले नहीं उतर रही. कांग्रेस के प्रदेश स्तरीय नेता हार का ठीकरा राजद और माले पर फोड़ रहे हैं तो जेएमएम के राष्ट्रीय महासचिव सुप्रीयो भट्टाचार्य कहते हैं कि हेमंत सोरेन की सरकार 56 के बजाय अब सिर्फ 50 विधायकों के समर्थन पर आधारित है. यानी कांग्रेस की तरह उनका भी मानना है कि राजद और माले के जिन 6 विधायकों ने इंडिया ब्लॉक के उम्मीवार को वोट नहीं किया, वे अघोषित तौर पर गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं. इन सबके बावजूद हेमंत सोरेन की चुप्पी ने सबको सकते में डाल दिया है.
क्या बदल जाएगा सत्ता का स्वरूप
झारखंड में सरकार का स्वरूप बदल सकता है. अब इसकी तस्वीर धीरे-धीरे साफ होने लगी है. बिहार विधानसभा चुनाव के समय इंडिया ब्लॉक में शुरू हुई तनातनी अब संबंध विच्छेद के करीब पहुंच गई है. मार्के की बात यह कि इस स्थिति के लिए इंडिया ब्लॉक की पार्टियां खुद जिम्मेवार हैं. वे साथ रहते हुए भी आपस में गुत्थमगुत्था हो रही हैं. भाजपा तमाशबीन बन कर मजे ले रही है. गठबंधन की इस हालत के लिए इंडिया ब्लॉक की पार्टियां ही जिम्मेवार हैं. राजद और कांग्रेस ने बिहार में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) को तवज्जो नहीं दी. जेएमएम ने भी असम में कांग्रेस की खाट खड़ी करने में अपनी भूमिका निभाई. बची-खुची कसर राज्यसभा चुनाव में पूरी हो गई. एनडीए समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी की जीत सुनिश्चित कर इंडिया ब्लॉक की पार्टियों ने साफ कर दिया कि उनकी एकता सिर्फ सरकार तक ही सीमित है. बाकी फैसलों के लिए सभी आजाद हैं.
राज्यसभा चुनाव के नतीजे समझिए
जेएमएम के नेतृत्व वाले गठबंधन-इंडिया की झारखंड में सरकार है. सर्वाधिक सीटों के कारण हेमंत सोरेन सरकार के मुखिया हैं. जेएमएम के 34 विधायक हैं. इसके अलावा कांग्रेस के 16, राजद के 4, वाम दलों के 2 विधायक जेएमएम के समर्थन में हैं. यानी इंडिया ब्लॉक के कुल 56 विधायक हैं. राज्यसभा चुनाव में एक सीट पर जीत के लिए 28 विधायकों के वोट आवश्यक थे. कुल 81 सीटों वाली विधानसभा में 56 विधायकों के एक साथ होने से राज्यसभा की दोनों सीटें इंडिया ब्लॉक के खाते में जानी तय थीं. जेएमएम उम्मीदवार बैद्यनाथ राम को 30 वोट मिले. महागठबंधन समर्थित कांग्रेस उम्मीदवार को 20 वोट ही मिल पाए. मतदान पूर्व मॉक पोलिंग के बावजूद गठबंधन के 3 वोट निरस्त हो गए. यहां बड़ा सवाल यह है कि जब जेएमएम को 28 वोट ही पड़ने थे तो उसे 30 वोट क्यों और कैसे पड़ गए. कांग्रेस प्रत्याशी को 20 वोट ही क्यों मिले. जाहिर है कि इंडिया ब्लॉक की पार्टियों में एकता नहीं रह पाई. इसका फायदा निर्दलीय नाथवानी को हुआ. वे जीत गए, जबकि पर्याप्त वोट होने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार को हार का मुंह देखना पड़ा.
इंडिया ब्लॉक में शुरू हुई किचकिच
राज्यसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के साथ ही इंडिया ब्लॉक में सिर फुटव्वल शुरू हो गया है. कांग्रेस ने इसके लिए राजद और वाम दलों के विधायकों को जिम्मेवार ठहराया है. राजद ने उल्टे कांग्रेस पर ही बिकाऊ होने का आरोप मढ़ कर तल्खी बढ़ा दी है. वाम दलों में सीपीआई (एमएल) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने भी कांग्रेस के आरोप को सिरे से खारिज कर दिया है. जेएमएम ने चुप्पी साध ली है. आश्चर्य यह कि कांग्रेस भी जेएमएम की भूमिका पर कोई शक नहीं कर रही, जबकि यह साफ हो चुका है कि जेएमएम कैंडिडेट को 28 की जगह 30 वोट जब चले गए तो 2 वोट वैसे ही कांग्रेस को कम पड़ गए. यानी उसके हिस्से में 28 की जगह 26 ही आए, जो हार के लिए काफी थे. उसके बाद कौन बिका या कौन बिकने से बचा, यह बेमलब की बहस का मुद्दा है.
अनबन से तालमेल टूटने का खतरा
कांग्रेस यकीनन इस हार पर मंथन करेगी. राजद और वाम दलों ने भी तल्ख तेवर अपनाए हैं. जेएमएम कुछ बोल नहीं रहा. यह कांग्रेस को उकसाने वाला कदम साबित हो सकता है. अब देखना दिलचस्प होगा कि इस अपमान और धोखे के बाद भी कांग्रेस सरकार में बनी रहती है या अलग होने का रास्ता अख्तियार करती है. जेएमएम के दोनों हाथ में लड्डू हैं. भाजपा भी इशारों में हेमंत को साथ आने का न्यौता दे चुकी है. हेमंत की चुनाव नतीजों के तुरंत बाद दिल्ली यात्रा भी कुछ कहती है. दिल्ली में वे किससे क्या खिचड़ी पकाते हैं, बहुत जल्द सामने आ सकता है. गठबंधन में ऐसी स्थिति पैदा की जा रही है कि कांग्रेस आला कमान खुद अलग होने का फैसला कर ले.
सरयू राय ने JMM को फिर राय दी
इस बीच जेडीयू के इकलौते विधायक सरयू राय ने हेमंत सोरेन को फिर सलाह दी है कि वे भाजपा और कांग्रेस को छोड़ सरकार बनाएं. इसका फॉर्मूला भी उन्होंने सुझाया है. उनका कहना है कि जेएमएम के 34, राजद और वाम दलों के 6 तथा जेडीयू के 1 विधायक को लेकर 41 सदस्यों का बहुमत का आंकड़ा बन जाएगा. हेमंत चाहें तो इस फॉर्मूले से सरकार बना सकते हैं. यह सुझाव वे पहले भी हेमंत को दे चुके हैं. यह अलग बात है कि जेडीयू बिहार और केंद्र में एनडीए का हिस्सा है. राज्यसभा चुनाव में उन्होंने खुद एनडीए समर्थित उम्मीदवार को वोट करने की बात कही थी तो वोट किया भी होगा.
कैसा बन रहा है सियासी परिदृश्य
अभी तक यह बात सिर्फ चर्चा में है कि हेमंत भाजपा के करीब जा सकते हैं. इसके कई कारण गिनाए जा रहे हैं. अव्वल तो वे सीबीआई और ईडी के कई कानूनी मामलों में उलझे हुए हैं. भाजपा के साथ रहने पर उन्हें राहत मिल सकती है. दूसरा बड़ा कारण यह कि जिस तरह भाजपा के आगे विपक्षी पार्टियों के सांसद-विधायक नतमस्तक होते जा रहे हैं, वह जेएमएम के लिए भी खतरे की घंटी साबित हो सकती हैं. भाजपा के समर्थन से सरकार चलाने में उन्हें अधिक दिक्कत नहीं आएगी. पहले भी वे भाजपा के साथ सरकार चला चुके हैं. भाजपा के साथ जाने पर भी संख्या बल अधिक होने के कारण उनकी कुर्सी को कोई खतरा नहीं होगा. हेमंत अगर भाजपा के समर्थन से सरकार चलाने का फैसला करते हैं तो कांग्रेस में टूट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. कांग्रेस कोटे के मंत्री सत्ता सुख के लिए कुछ भी कर सकते हैं. अगर कांग्रेस के 10 विधायक भी टूटे तो जेएमएम अकेले बहुमत में आ जाएगा. जो भी हो, झारखंड में राजनीति का नया चेहरा जल्द ही देखने को मिल सकता है.
About the Author
प्रभात खबर, हिंदुस्तान और राष्ट्रीय सहारा में संपादक रहे. खांटी भोजपुरी अंचल सीवान के मूल निवासी अश्क जी को बिहार, बंगाल, असम और झारखंड के अखबारों में चार दशक तक हिंदी पत्रकारिता के बाद भी भोजपुरी के मिठास ने ब…और पढ़ें