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एक न्योता, कई शर्तें और सैनिक का वेश… जब तिब्बत छोड़कर भारत पहुंचे दलाई लामा

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दलाई लामा का भारत पहुंचना इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक है. 1959 में चीन की सेना से बचने के लिए उन्होंने सैनिक का वेश धारण किया और रात के अंधेरे में तिब्बत छोड़ दिया. तीन सप्ताह तक कठिन पहाड़ी रास्तों से सफर करने के बाद वे भारत पहुंचे, जहां तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें राजनीतिक शरण दी. जानिए दलाई लामा के तिब्बत छोड़ने की पूरी कहानी.

एक न्योता, कई शर्तें और सैनिक का वेश… जब तिब्बत छोड़कर भारत पहुंचे दलाई लामाZoom

1959 में ऐसा क्‍या हुआ कि दलाई लामा को तिब्‍बत छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी.

नई दिल्ली. आज दुनिया भर में शांति और करुणा के प्रतीक माने जाने वाले दलाई लामा का जीवन संघर्ष और साहस से भरा रहा है. साल 1959 में एक ऐसा समय भी आया था, जब उन्हें अपनी जान बचाने के लिए तिब्बत छोड़ना पड़ा. चीन की सेना लगातार उनकी तलाश कर रही थी. हालात इतने खराब हो चुके थे कि उन्हें रात के अंधेरे में सैनिक के वेश में देश से निकलना पड़ा था. कई दिनों तक पहाड़ों और कठिन रास्तों से सफर करने के बाद वे आखिरकार भारत पहुंचे, जहां उन्हें शरण मिली.

दलाई लामा का जन्म 6 जुलाई 1935 को तिब्बत के छोटे से गांव तक्तसेर में हुआ था. उनका बचपन का नाम ल्हामो धोंडुप था. तिब्बती बौद्ध परंपरा के अनुसार, जब वे सिर्फ दो साल के थे, तब उन्हें 13वें दलाई लामा का पुनर्जन्म माना गया. इसके बाद उन्हें नया नाम तेनजिन ग्यात्सो दिया गया और तिब्बत का आध्यात्मिक नेता घोषित किया गया. तिब्बती लोगों के लिए दलाई लामा सिर्फ धार्मिक गुरु ही नहीं, बल्कि उनके सबसे बड़े नेता भी हैं.

  1. साल 1950 में चीन ने तिब्बत पर अपना नियंत्रण बढ़ाना शुरू कर दिया. हालात लगातार बिगड़ते गए और उसी दौरान दलाई लामा को कम उम्र में ही तिब्बत की राजनीतिक जिम्मेदारी भी संभालनी पड़ी थी.
  2. उन्होंने माओ त्से-तुंग, चाउ एन-लाई और डेंग शियाओपिंग जैसे चीन के शीर्ष नेताओं से बातचीत करके विवाद का शांतिपूर्ण समाधान निकालने की कोशिश की. लेकिन इन बैठकों का कोई नतीजा नहीं निकला.
  3. साल 1956 में दलाई लामा भारत आए थे. उस समय वे बुद्ध जयंती समारोह में शामिल हुए और भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से भी मिले. उन्होंने तिब्बत की बिगड़ती स्थिति पर चर्चा की, लेकिन उस समय वे वापस तिब्बत लौट गए थे.
  4. इसके बाद मार्च 1959 में हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए. 10 मार्च को चीनी सेना के एक जनरल ने दलाई लामा को एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में आने का निमंत्रण भेजा. शुरुआत में यह एक सामान्य निमंत्रण जैसा लगा, लेकिन बाद में इसमें कई शर्तें जोड़ दी गईं.
  5. कहा गया कि दलाई लामा अपने साथ कोई तिब्बती सैनिक नहीं लाएंगे और उनके अंगरक्षक भी बिना हथियार के होंगे. यहीं से शक पैदा हुआ कि कहीं यह दलाई लामा को गिरफ्तार करने की साजिश तो नहीं है.
  6. देखते ही देखते हजारों लोग उनके महल नोरबुलिंगका के बाहर जमा हो गए. उन्होंने दलाई लामा से कार्यक्रम में नहीं जाने की अपील की. पूरे शहर में तनाव का माहौल बन गया.करीब एक हफ्ते बाद 17 मार्च 1959 को फैसला लिया गया कि अब तिब्बत छोड़ना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है.
  7. अपनी पहचान छिपाने के लिए उन्‍होंने सैनिक की वर्दी पहनी और रात करीब 10 बजे वे अपने कुछ भरोसेमंद साथियों के साथ चुपचाप महल से निकल गए. बाद में उनके परिवार के सदस्य और दूसरे सहयोगी भी इस दल में शामिल हो गए.
  8. यह सफर बिल्कुल आसान नहीं था. उन्हें ऊंचे पहाड़, खराब मौसम और लगातार पीछा करती चीनी सेना के खतरे के बीच कई दिनों तक यात्रा करनी पड़ी. लगभग तीन सप्ताह तक कठिन रास्तों से गुजरने के बाद 31 मार्च 1959 को दलाई लामा भारतीय सीमा पर पहुंचे.

भारतीय सीमा पर दलाई लामा का हुआ भव्‍य स्‍वागत

उस समय अरुणाचल प्रदेश को ‘नेफा’ के नाम से जाना जाता था. भारतीय सेना और स्थानीय प्रशासन ने सीमा पर ही दलाई लामा और उनके साथियों का स्वागत किया. कड़ी सुरक्षा के बीच उन्‍हें वहां से पहले तवांग और फिर असम ले जाया गया. कुछ समय बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से उनकी मुलाकात हुई. इसके बाद भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर ऐलान किया कि दलाई लामा को भारत में शरण दी गई है. दलाई लामा के भारत आने के बाद बड़ी संख्या में तिब्बती नागरिक भी अपने देश से निकलकर भारत पहुंचे. इनमें से कई लोगों ने अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, कर्नाटक और देश के दूसरे हिस्सों में बसना शुरू कर दिया था.

हिमाचल के ‘छोटा ल्‍हासा’ में रहे दलाई लामा

दलाई लामा 1960 के बाद हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रह रहे हैं. यह जगह आज ‘छोटा ल्हासा’ के नाम से भी जानी जाती है. यहीं निर्वासित तिब्बती प्रशासन का मुख्यालय भी है. निर्वासन में रहने के दौरान दलाई लामा ने दुनिया भर में तिब्बत के मुद्दे को शांतिपूर्ण तरीके से उठाया. उनकी अपील पर संयुक्त राष्ट्र ने 1959, 1961 और 1965 में तिब्बत के समर्थन में प्रस्ताव पारित किए. उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए तिब्बत के संविधान का मसौदा भी जारी किया. इसके अलावा शिक्षा, संस्कृति और बौद्ध धर्म के संरक्षण के लिए कई संस्थानों की स्थापना की. आज भी दलाई लामा को दुनिया भर में शांति, अहिंसा और करुणा का संदेश देने वाले सबसे सम्मानित आध्यात्मिक नेताओं के तौर पर पहचाना जाता है.

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Anoop Kumar MishraAssistant Editor

Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at News18 Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international security affairs…और पढ़ें



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