![]()
भास्कर न्यूज| सरायकेला नई पीढ़ी को अपनी भाषा, संस्कृति, वैदिक परंपराओं से जोड़ने के उद्देश्य से उत्कलीय पुरोहित समाज ने माजना घाट स्थित शिव मंदिर परिषद परिसर में रविवार शाम नि:शुल्क उड़िया भाषा, संस्कृत, वैदिक कर्मकांड शिक्षा अभियान का शुभारंभ किया। कार्यक्रम का उद्घाटन नारियल फोड़कर किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शिक्षाविद नीलांबर सिंह उपस्थित रहे। इस अवसर पर समाज के अध्यक्ष घासीराम सतपथी ने कहा कि ब्रह्म कुमारों में वैदिक संस्कारों का बीजारोपण तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए यह पहल शुरू की गई है। उन्होंने बताया कि जिले के विभिन्न क्षेत्रों में संपर्क अभियान चलाकर नामांकन कराया जा रहा है। इस अभियान के तहत बच्चों को उड़िया भाषा, संस्कृत, वैदिक कर्मकांड की प्रारंभिक, व्यावहारिक शिक्षा नि:शुल्क प्रदान की जाएगी। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि नीलांबर सिंह ने कहा कि उड़िया भाषा संरक्षण, संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में यह पहल समाज के लिए प्रेरणादायक साबित होगी। इससे बच्चों को अपनी जड़ों, सांस्कृतिक मूल्यों को समझने का अवसर मिलेगा। कर्मकांड संबंधी ज्ञान भी नई पीढ़ी तक पहुंचेगा। समाज के सचिव नीलकंठ षाड़ंगी, कोषाध्यक्ष पुलक सतपथी, सदस्य पुलक सतपथी-2, नवकुमार रथ, रजन पति, मनोज पाणीग्राही ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने अभियान को समाजहित में महत्वपूर्ण कदम बताया। समिति के अनुसार अब तक उड़िया भाषा, संस्कृत की शिक्षा के लिए 11 विद्यार्थियों का नामांकन हो चुका है। वैदिक कर्मकांड प्रशिक्षण के लिए 7 विद्यार्थियों ने आवेदन पत्र जमा किए हैं। रविवार, अन्य अवकाश के दिन छात्रों को इसकी शिक्षा दी जाएगी। समाज की इस पहल को लेकर लोगों में उत्साह देखा जा रहा है। समाज से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। उम्मीद जताई गई कि यह अभियान आने वाले समय में भाषा, संस्कृति, वैदिक परंपराओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सरायकेला में उत्कलीय पुरोहित समाज द्वारा शुरू की गई नि:शुल्क उड़िया भाषा, संस्कृत, वैदिक कर्मकांड शिक्षा केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं। यह बदलते समय में अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाने का प्रयास है। आधुनिक शिक्षा, तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा, धार्मिक परंपराओं, संस्कारों से दूर होती जा रही है। समाज के कई परिवारों में अब बच्चों को न तो उड़िया भाषा का पर्याप्त ज्ञान है, न ही वैदिक कर्मकांड की समझ। इसी चिंता को देखते हुए समाज ने बच्चों के लिए नि:शुल्क प्रशिक्षण की व्यवस्था की है। इस पहल से भाषा संरक्षण को बल मिलेगा। संस्कृत, वैदिक परंपराओं के प्रति युवाओं की रुचि भी बढ़ेगी। प्रारंभिक चरण में ही विद्यार्थियों का नामांकन होना इस बात का संकेत है कि समाज के लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए गंभीर हैं। यदि यह अभियान निरंतर चलता रहा तो यह क्षेत्र में भाषा, संस्कृति संरक्षण का एक प्रभावी मॉडल बन सकता है।
Source link