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जेटेट भाषा विवाद:सीएम को सौंपी रिपोर्ट, भोजपुरी-मगही की एंट्री कठिन




उच्चस्तरीय कमेटी भी नहीं सुलझा सकी मामला 5 सदस्यीय कमेटी में पक्ष में था बहुमत, दो मंत्री जुड़ने के बाद विरोधी पक्ष हुआ भारी अंतिम फैसला सीएम लेंगे
झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) में क्षेत्रीय भाषा के रूप में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका की एंट्री फिलहाल मुश्किल दिख रही है। सात मंत्रियों की उच्चस्तरीय कमेटी ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी है। कमेटी के चार मंत्री—झामुमो के सुदिव्य कुमार, योगेंद्र प्रसाद महतो, हफीजुल हसन अंसारी और कांग्रेस की शिल्पी नेहा तिर्की—इन भाषाओं को शामिल करने के विरोध में रहे। वहीं, कांग्रेस के राधाकृष्ण किशोर, दीपिका पांडेय सिंह और राजद के संजय प्रसाद यादव ने इन्हें शामिल करने का समर्थन किया। दिलचस्प यह है कि कांग्रेस कोटे की मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने अपनी पार्टी के ही दो मंत्रियों राधाकृष्ण किशोर और दीपिका पांडेय सिंह से अलग राय रखी। इस तरह सात सदस्यीय कमेटी में चार मंत्री विरोध और तीन मंत्री समर्थन में रहे। इससे पहले बनी पांच सदस्यीय कमेटी में तीन मंत्री इन भाषाओं को शामिल करने के पक्ष में और दो विरोध में थे। सीएम के निर्देश पर मई में बनी थी कमेटी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के निर्देश पर मई में वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय कमेटी गठित की गई थी। दो बैठकों में सहमति नहीं बनने पर अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक समाज से एक-एक मंत्री को भी कमेटी में शामिल किया गया। कमेटी की तीन बैठकें हुईं, लेकिन सहमति नहीं बनी पहली बैठक: अधिकारी 2012 और 2016 की नियमावली तथा पूर्व में हुई परीक्षाओं में भाषाओं के चयन से जुड़े दस्तावेज और आंकड़े लेकर नहीं पहुंचे थे। इस पर मंत्रियों ने नाराजगी जताई और शिक्षा व कार्मिक विभाग से पूरा ब्यौरा माँगा। दूसरी और तीसरी बैठक: भोजपुरी, मगही, मैथिली, अंगिका और कुड़माली को क्षेत्रीय भाषा की सूची में शामिल करने के मुद्दे पर मंत्रियों के बीच तीखे मतभेद सामने आए। कुछ मंत्रियों ने समर्थन किया, जबकि कुछ ने कड़ा विरोध जताया। सात मंत्री, दो राय… पढ़िए—किसने क्या कहा पक्ष में तीन मंत्री और उनके तर्क समान अवसर: किसी भी क्षेत्र के अभ्यर्थियों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। सभी को समान अवसर मिलना चाहिए। व्यावहारिक पक्ष: पलामू, गढ़वा, लातेहार, देवघर, गोड्डा और साहिबगंज जैसे सीमावर्ती जिलों में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका बोलने वालों की बड़ी आबादी है। इन्हें बाहर रखना व्यावहारिक नहीं होगा। दोहरा मापदंड: जब बांग्ला-ओड़िया जैसी बाहरी भाषाओं को क्षेत्रीय भाषा का दर्जा मिला, तो भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका को बाहर रखना गलत है। विरोध करने वाले मंत्रियों की दलील मूल क्षेत्रीय भाषा नहीं: इन मंत्रियों का कहना है कि भोजपुरी, मगही और अंगिका झारखंड की मूल क्षेत्रीय भाषाएँ नहीं हैं, इसलिए इन्हें सूची में शामिल करने का औचित्य नहीं है। बीपीएससी का उदाहरण: जब बिहार ने प्रशासनिक सेवा परीक्षाओं में इन भाषाओं को शामिल नहीं किया है, तो झारखंड पर भी ऐसा करने की बाध्यता नहीं है। सांस्कृतिक पहचान: झारखंड की अपनी विशिष्ट जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाई पहचान है, इसलिए परीक्षा नियमावली में उसी को प्राथमिकता मिले।



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