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झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) में क्षेत्रीय भाषा के रूप में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका को शामिल करने का मामला फिलहाल उलझता नजर आ रहा है। इस मुद्दे पर गठित सात सदस्यीय उच्चस्तरीय मंत्रियों की कमेटी ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी है, लेकिन कमेटी किसी सर्वसम्मति पर नहीं पहुंच सकी। दिलचस्प यह है कि कमेटी के भीतर ही मतभेद साफ तौर पर सामने आए हैं। झामुमो के सुदिव्य कुमार, योगेंद्र प्रसाद महतो और हफीजुल हसन अंसारी के साथ कांग्रेस की मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने इन भाषाओं को शामिल करने का विरोध किया, जबकि कांग्रेस के ही राधाकृष्ण किशोर और दीपिका पांडेय सिंह तथा राजद के संजय प्रसाद यादव ने इसके समर्थन में अपनी राय रखी। सात मंत्रियों की कमेटी में चार का विरोध खास बात यह रही कि कांग्रेस कोटे से आने वाली शिल्पी नेहा तिर्की ने अपनी ही पार्टी के दो अन्य मंत्रियों से अलग रुख अपनाया। इससे पहले बनी पांच सदस्यीय कमेटी में तीन मंत्री इन भाषाओं के पक्ष में और दो विरोध में थे, लेकिन बाद में सर्वसम्मति नहीं बनने पर हफीजुल हसन अंसारी और शिल्पी नेहा तिर्की को कमेटी में शामिल किया गया। दोनों के विरोध में आने से सात सदस्यीय कमेटी में चार मंत्री विरोध और तीन समर्थन में हो गए, जिससे बहुमत विरोध के पक्ष में झुक गया। हालांकि अंतिम निर्णय पर सहमति नहीं बनने के कारण अब यह मामला मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पास पहुंच गया है। इस पर अंतिम फैसला वही लेंगे। भाषा विवाद पर किसने क्या कहा पक्ष में : राधाकृष्ण किशोर, दीपिका सिंह और संजय प्रसाद समान अवसरः किसी भी क्षेत्र के अभ्यर्थियों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। सभी को समान अवसर मिलना चाहिए। व्यावहारिक पक्षः पलामू, गढ़वा, लातेहार, देवघर, गोड्डा और साहिबगंज जैसे सीमावर्ती जिलों में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका बोलने वालों की बड़ी आबादी है। इन्हें बाहर रखना व्यावहारिक नहीं होगा। दोहरा मापदंडः जब बांग्ला ओड़िया जैसी बाहरी भाषाओं को क्षेत्रीय भाषा का दर्जा मिला तो भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका को बाहर रखना गलत है। विपक्ष में : सुदिव्य सोनू, हफीजुल हसन, योगेंद्र प्रसाद और शिल्पी नेहा तिर्की मूल क्षेत्रीय भाषा नहींः इन मंत्रियों का कहना है कि भोजपुरी, मगही और अंगिका झारखंड की मूल क्षेत्रीय भाषाएं नहीं हैं, इसलिए इन्हें सूची में शामिल करने का औचित्य नहीं है। बीपीएससी का उदाहरणः जब बिहार ने प्रशासनिक सेवा परीक्षाओं में इन भाषाओं को शामिल नहीं किया है, तो झारखंड पर भी ऐसा करने की बाध्यता नहीं है। सांस्कृतिक पहुंचानः झारखंड की अपनी विशिष्ट जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाई पहचान है, इसलिए परीक्षा नियमावली में उसी को प्राथमिकता मिले। तीन बैठकों में भी नहीं बनी सहमति पहली बैठकः अधिकारी 2012 और 2016 की नियमावली तथा पूर्व में हुई परीक्षाओं में भाषाओं के चयन से जुड़े दस्तावेज और आंकड़े लेकर नहीं पहुंचे थे। इस पर मंत्रियों ने नाराजगी जताई और शिक्षा व कार्मिक विभाग से पूरा ब्योरा मांगा। दूसरी और तीसरी बैठकः भोजपुरी, मगही, मैथिली, अंगिका और कुड़माली को क्षेत्रीय भाषा की सूची में शामिल करने के मुद्दे पर मंत्रियों के बीच तीखे मतभेद सामने आए। कुछ मंत्रियों ने समर्थन किया, जबकि कुछ ने कड़ा विरोध जताया। सीएम के निर्देश पर मई में बनी थी कमेटी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के निर्देश पर मई में वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय कमेटी गठित की गई थी। दो बैठकों में सहमति नहीं बनने पर अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक समाज से एक-एक मंत्री को भी कमेटी में शामिल किया गया।
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