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एल नीनो के कारण झारखंड में कम बारिश हुई है. इससे धान की खेती पर संकट मंडरा रहा है. कृषि वैज्ञानिक ने किसानों को रणनीति बदलने की सलाह दी है. किसान रोपाई के बदले छींटा विधि अपनाएं. वे 15 अगस्त तक पारंपरिक रोपाई कर सकते हैं. कम पानी वाली ‘अभिषेक’ और ‘वंदना’ जैसी किस्में चुनें.
पलामूः झारखण्ड में अबतक सामान्य से कम बारिश होने से किसानों के लिए समस्या बढ़ गई है. वहीं पलामू जिला में अबतक कई किसान धान के रोपा और बिहन तक नहीं कर पाए है. इस वर्ष एल नीनो के प्रभाव के कारण मानसून कमजोर होने के कारण सबसे अधिक असर धान की खेती पर पड़ रहा है. समय पर पर्याप्त वर्षा नहीं होने से नर्सरी तैयार करने, रोपाई करने और खेतों में आवश्यक नमी बनाए रखने में किसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में कृषि वैज्ञानिक किसानों को मौसम के अनुसार खेती की रणनीति बदलने और कम अवधि वाली धान की किस्मों को अपनाने की सलाह दे रहे हैं.
छींटा विधि से करें धान की बुआई
कृषि वैज्ञानिक डॉ. विनोद पांडे ने बताया कि यदि बारिश सामान्य नहीं हो रही है तो किसान रोपा विधि का इंतजार करने के बजाय छींटा (ब्रॉडकास्टिंग) विधि से धान की खेती कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि जुलाई में यदि एक-दो अच्छी बारिश भी हो जाती है तो छींटा विधि से बोई गई फसल को पर्याप्त नमी मिल जाएगी और किसानों को अच्छा लाभ मिल सकता है. विशेष रूप से मध्यम और ऊपरी जमीन वाले किसान इस विधि को अपनाकर जोखिम कम कर सकते हैं.
रोपाई करनी हो तो 15 अगस्त तक करें
डॉ. पांडे ने आगे कहा कि जो किसान पारंपरिक रोपा विधि से धान की खेती करना चाहते हैं, वे कुछ समय तक बारिश का इंतजार कर सकते हैं. यदि 15 अगस्त से पहले पर्याप्त बारिश हो जाती है तो रोपाई कर धान की खेती की जा सकती है. हालांकि देर से रोपाई करने पर उत्पादन सामान्य से कम होने की संभावना रहती है, लेकिन फसल तैयार हो जाएगी और किसानों को पूरी तरह नुकसान नहीं होगा.
कम अवधि वाली किस्में रहेंगी बेहतर
उन्होंने बताया कि मौजूदा मौसम को देखते हुए किसानों को कम अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्मों का चयन करना चाहिए. इनमें श्रवण श्रेया (लगभग 110 दिन), अभिषेक, वंदना, नवीन तथा बिरसा विकास धान-101 जैसी किस्में उपयुक्त हैं. ये किस्में लगभग 100 से 110 दिनों में तैयार हो जाती हैं और कम बारिश की स्थिति में भी बेहतर प्रदर्शन करती हैं.
कम पानी में भी मिलेगा बेहतर उत्पादन
कृषि वैज्ञानिक ने आगे कहा कि अभिषेक, वंदना और बिरसा विकास धान-101 जैसी किस्मों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें हाइब्रिड धान की तुलना में कम पानी की आवश्यकता होती है. वहीं इनका उत्पादन भी कई परिस्थितियों में हाइब्रिड किस्मों के बराबर प्राप्त किया जा सकता है. इसलिए कम वर्षा वाले क्षेत्रों के किसानों के लिए ये किस्में अधिक सुरक्षित और लाभदायक विकल्प साबित हो सकती हैं. मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए वैज्ञानिकों ने किसानों से स्थानीय कृषि विभाग की सलाह के अनुसार समय पर बुआई और किस्मों का चयन करने की अपील की है.
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मीडिया में 6 साल का अनुभव है. करियर की शुरुआत ETV Bharat (बिहार) से बतौर कंटेंट एडिटर की थी, जहां 3 साल तक काम किया. पिछले 3 सालों से Network 18 के साथ हूं. यहां बिहार और झारखंड से जुड़ी खबरें पब्लिश करता हूं.