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स्वदेशी आंदोलन की जीवित धरोहर, राजमंड्री के हस्तनिर्मित रत्नम पेन की गौरवगाथा

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महात्मा गांधी की प्रेरणा से शुरू हुआ राजमंड्री का रत्नम पेन वर्क्स आज भी पूरी तरह हस्तनिर्मित स्वदेशी फाउंटेन पेन बनाकर आत्मनिर्भर भारत की विरासत को जीवित रखे हुए है. 1935 में गांधी जी ने इसकी गुणवत्ता की सराहना करते हुए इसे विदेशी पेन का बेहतरीन विकल्प बताया था. आज भी यह ऐतिहासिक प्रतिष्ठान अपनी पारंपरिक शिल्पकला और उत्कृष्ट गुणवत्ता के लिए देश-दुनिया में पहचान बनाए हुए है.

हैदराबाद. भारत के स्वतंत्रता संग्राम और स्वदेशी आंदोलन की गूंज आज भी आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक शहर राजमंड्री की गलियों में जीवंत है. तेलंगाना सीमा के समीप कोटागुम्मम यानी फोर्ट गेट क्षेत्र में स्थित रत्नम पेन वर्क्स महज एक व्यावसायिक दुकान नहीं, बल्कि भारतीय आत्मनिर्भरता का एक ऐतिहासिक प्रतीक है. सन 1932 में कोसुरी वेंकट रत्नम द्वारा स्थापित यह दुकान आज भी पूरी तरह से हस्तनिर्मित स्वदेशी फाउंटेन पेनों का निर्माण कर महात्मा गांधी के आत्मनिर्भर भारत के सपने को आगे बढ़ा रही है. इतिहासकार ज़ाहिद रहीम बताते हैं कि इस ऐतिहासिक यात्रा की नींव सन 1921 में पड़ी, जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मुलाकात के.वी. रत्नम से हुई.

गांधी जी ने उनसे विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के विकल्प के रूप में कुछ ऐसा उपयोगी बनाने का आग्रह किया, जो पूरी तरह भारतीय हो और आम नागरिकों के काम आ सके. एक दशक के कड़े परिश्रम और शोध के बाद, रत्नम जी ने पूरी तरह स्वदेशी फाउंटेन पेन तैयार किया. सन 1935 में जब एक एबोनाइट पेन गांधी जी को भेंट किया गया तो उन्होंने इसका उपयोग करने के बाद 16 जुलाई 1935 को वर्धा से एक ऐतिहासिक प्रशंसा पत्र लिखा. इस पत्र में गांधी जी ने लिखा था कि यह पेन विदेशी उत्पादों का एक बेहतरीन और कुशल विकल्प है. यह बहुमूल्य पत्र आज भी इस प्रतिष्ठान में प्रेमियों और आगंतुकों के देखने के लिए सहेज कर रखा गया है.

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी जैसी महान विभूतियाँ इस हस्तनिर्मित रत्नम पेन की मुरीद रही हैं. रत्नम पेन की सबसे बड़ी विशेषता इसका निर्माण तरीका है आधुनिक मशीनीकरण और प्लास्टिक के दौर में भी, यहां पेनों को एबोनाइट की छड़ों से पारंपरिक खराद मशीन पर हाथों से तराश कर बनाया जाता है. इसके बाहरी आवरण को आकार देने से लेकर निब के बारीक समायोजन तक, हर प्रक्रिया में शिल्पकार की कुशलता और कई घंटों की मेहनत शामिल होती है. अपनी इसी बेजोड़ गुणवत्ता और ऐतिहासिक महत्ता के कारण, यह स्थान आज भी इतिहास प्रेमियों, लेखकों और शोधकर्ताओं के लिए एक जीवित संग्रहालय के समान है.

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Monali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें



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