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लोकल 18 से बातचीत के दौरान प्रगतिशील युवक किसान राघवेंद्र मिश्रा बताते है कि पहले परिवार पारंपरिक खेती करता था. लेकिन उन्होंने कुछ नया करने का फैसला किया. इसके लिए उन्होंने जैविक खेती का तरीका अपनाया. खेत में गोबर की सड़ी खाद, वर्मी कम्पोस्ट और जीवामृत का इस्तेमाल किया जाता है. रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों से दूरी रखी जाती है, जिससे फसल की गुणवत्ता बेहतर रहती है और मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहती है.
गोंडा: उत्तर प्रदेश गोंडा जिले के युवा अब नौकरी के पीछे भागने के बजाय आधुनिक और जैविक खेती को अपना रहे है. जिले के एक युवक ने ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद जैविक तरीके से अरबी (घुईया) की खेती शुरू की. आज उनकी मेहनत रंग ला रही है और उन्हें अच्छी पैदावार के साथ बेहतर आमदनी भी हो रही है.
कितने महीने में तैयार होती है फसल:
राघवेंद्र मिश्रा बताते है कि अरबी की फसल लगभग 6 से 7 महीने में तैयार हो जाती है. बाजार में जैविक तरीके से तैयार अरबी की अच्छी मांग रहती है, सामान्य खेती की तुलना में बेहतर दाम मिल जाता है. युवक का कहना है कि सही देखभाल और समय पर सिंचाई से उत्पादन भी अच्छा मिलता है. राघवेंद्र मिश्रा ने बताया कि खेत में समय-समय पर निराई-गुड़ाई और जैविक घोल का छिड़काव किया जाता है. इससे पौधों की बढ़वार अच्छी होती है और रोगों का खतरा भी कम रहता है. जैविक खेती अपनाने से लागत में भी कमी आती है और मिट्टी लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहती है.
कितने बीघा में कर रहे हैं खेती:
राघवेंद्र मिश्रा बताते हैं कि इस समय लगभग आधा बीघा में अरबी की खेती कर रहे है. उन्होंने बताया कि हम पिछले 4 वर्षों से अरबी की खेती कर रहे है. शुरू में हमारी लागत लगभग तीन से 4 सौ रुपए आई थी. उसके बाद हम घर पर ही बीज शोधित करके उसी की बुवाई करते हैं केवल थोड़ा बहुत निराई गुड़ाई में पैसा लगता है. उन्होंने बताया कि आधा बीघा में लगभग 8 से 9 कुंतल अरबी का पैदावार होता है. मार्केट में लगभग 40 से 50 रुपए प्रति किलो में बिक जाता है. अरबी से हमारी अच्छी खासी इनकम हो रही है भविष्य में इसको और आगे बढ़ाना है.
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काशी के बगल चंदौली से ताल्लुक रखते है. बिजेनस, सेहत, स्पोर्टस, राजनीति, लाइफस्टाइल और ट्रैवल से जुड़ी खबरें पढ़ना पसंद है. मीडिया में करियर की शुरुआत ईटीवी भारत हैदराबाद से हुई. अभी लोकल18 यूपी के कॉर्डिनेटर की…और पढ़ें