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Agriculture Ground Report : राजस्थान का हाड़ौती अंचल, जिसे प्रदेश का ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है, इस बार कमजोर मानसून के कारण गंभीर कृषि संकट का सामना कर रहा है. कोटा के ग्रामीण इलाकों में धान, मक्का और सोयाबीन की फसलें पानी की कमी से प्रभावित हो रही हैं. किसानों का कहना है कि पिछले तीन से चार दशकों में पहली बार ऐसी स्थिति देखने को मिल रही है, जब ट्यूबवेल और बोरवेल तक सूखने लगे हैं. कई किसानों को दोबारा बुवाई करनी पड़ी, जिससे लागत और बढ़ गई. सिंचाई के साधनों की कमी, बढ़ते खर्च और संभावित उत्पादन नुकसान ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. प्रभावित किसान सरकार से जल्द गिरदावरी, उचित मुआवजा, राहत पैकेज और सिंचाई के लिए अतिरिक्त पानी उपलब्ध कराने की मांग कर रहे हैं.
कोटा. राजस्थान का कोटा और हाड़ौती अंचल अपनी उपजाऊ भूमि और धान की बंपर पैदावार के लिए पूरे प्रदेश में ‘धान का कटोरा’ के नाम से जाना जाता है. लेकिन इस साल मानसून साथ नहीं दे रहा है. धान को सबसे ज्यादा पानी की ही जरूरत होती है. ऐसे में भरपूर बारिश नहीं होने के कारण इस बंपर पैदावार वाले इलाके में गंभीर संकट मंडराने लगा है. बारिश की कमी से न केवल खेतों में नमी खत्म हो चुकी है, बल्कि वाटर लेवल भी लगातार गिरने लगा है. इससे सिंचाई के साधन बचे ही नहीं. पानी की कमी में धान, मक्का और सोयाबीन की तैयार होती फसलें खेतों में ही सूखकर पीली पड़ने लगी हैं, जिससे क्षेत्र के किसान परेशान और हताश हैं
ग्राउंड जीरो की वास्तविक स्थिति जानने के लिए लोकल18 ने कोटा के ग्रामीण क्षेत्र गिरधरपुरा का दौरा किया और सीधे उन किसानों से बातचीत की जो इस परिस्थिति के मारे हैं. टीम जब किसानों से बात कर रही थी तब उनकी आंखों में आर्थिक बदहाली का डर साफ दिखाई दिया. वर्षों से खेती कर रहे स्थानीय किसानों ने बताया कि धान की फसल को लगातार पानी की जरूरत होती है. रोपाई से लेकर फसल पकने तक खेतों में पर्याप्त पानी रहना जरूरी होता है. लेकिन इस बार मानसून शुरुआत में सक्रिय रहने के बाद थम गया. इससे रोपाई का काम काफी प्रभावित हुआ और जिन किसानों ने किसी तरह रोपाई कर भी दी, उनकी फसलें अब पानी के अभाव में सूखने लगी हैं.
30-35 साल में पहली बार ऐसा संकट
स्थानीय किसान दालचंद और अन्य किसानों ने बताया कि वे पिछले 30-35 वर्षों से खेती कर रहे हैं, लेकिन ऐसा संकट पहले कभी नहीं देखा. उनके अनुसार ट्यूबवेल और बोरवेल लगभग सूख चुके हैं. किसानों ने खाद, बीज और दवाइयों के लिए कर्ज लेकर फसल बोई थी, लेकिन अब वही फसल उनकी आंखों के सामने सूख रही है.
कम बारिश से बढ़ी किसानों की परेशानी
किसान मस्तराम मीणा, धन्नालाल और अन्य कई महिला काश्तकारों ने बताया कि कम बारिश के कारण केवल सिंचाई की समस्या ही नहीं बढ़ी, बल्कि फसलों में कई तरह की बीमारियां और कीटों की समस्या आ गई है. फसलों को बचाने के लिए किसानों को महंगे दामों पर डीएपी, यूरिया और कीटनाशक दवाइयां खरीदनी पड़ रही हैं. कई खेतों में पहली बार बोया गया बीज पूरी तरह खराब हो गया, जिसके बाद किसानों को दोबारा दोगुनी लागत लगाकर बुवाई करनी पड़ी. इसके बावजूद वाटर लेवल लगातार नीचे जाने से न तो बोरवेल से पानी मिल रहा है और न ही नहरों से जरूरत के मुताबिक सिंचाई हो पा रही है.
किसानों ने की राहत और मुआवजे की मांग
कृषि लागत बढ़ने और उत्पादन कम रहने की आशंका पहले से ही है. इस बात ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है. ज्यादातर किसानों ने साहूकारों और बैंकों से ब्याज पर पैसा लेकर खेती की थी. अब फसल खराब होने से उनके सामने परिवार का पालन-पोषण, बच्चों की पढ़ाई और रोज के खर्च का संकट खड़ा हो गया है. किसानों का कहना है कि यदि शासन और प्रशासन ने समय रहते गिरदावरी कराकर मुआवजे की घोषणा नहीं की और सिंचाई के लिए कहीं से पानी की व्यवस्था नहीं की, तो हालात और गंभीर हो सकते हैं. हाड़ौती का किसान अब सरकार से जल्द राहत पैकेज और अन्य जरूरी मदद की उम्मीद लगाए बैठा है.
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आनंद पाण्डेय वर्तमान में News18 हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाते हुए उन्होंने राजनीति, अपराध और लाइफ…और पढ़ें