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Palamu Low Rainfall: झारखंड के पलामू में हर साल ही बारिश कम होती है और इस साल स्थिति और ज्यादा खराब है. अभी तक जितनी बरसात हो जानी चाहिए थी उसमें 67 प्रतिशत की कमी है. आखिर क्या वजह है कि यहां बारिश नहीं होती और ऐसे में कौन से उपाय अपनाएं जा सकते हैं, जिनसे खासकर किसानों को राहत मिले.
पलामू. झारखंड राज्य में इस साल कम बारिश हो रही है. मौसम विभाग के अनुसार इस बार एल नीनो का बड़ा असर होने के कारण यह समस्या देखने को मिल रही है. इसका असर पलामू में भी दिख रहा है. पलामू में हर साल मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश होना कोई नई बात नहीं है. इस वर्ष भी जिले में जून और जुलाई के दौरान सामान्य की तुलना में करीब 67 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर पलामू में हर साल बारिश कम क्यों होती है? क्या इसकी वजह केवल एल नीनो है या इसके पीछे कोई भौगोलिक कारण भी है?
इस वजह से होती है पलामू में कम बारिश
झारखंड राज्य भर में ‘ट्री मैन’ के नाम से प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ. कौशल किशोर जायसवाल ने लोकल18 को बताया कि पलामू में कम बारिश का सबसे बड़ा कारण इसकी भौगोलिक स्थिति है. पलामू रेन शैडो एरिया (Rain Shadow Zone) में स्थित है. बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसूनी हवाएं सबसे पहले रांची और नेतरहाट जैसे ऊंचे पठारी क्षेत्रों से टकराती हैं.
इन क्षेत्रों में अच्छी बारिश होने के बाद बादलों की नमी काफी हद तक खत्म हो जाती है. जब यही बादल पलामू पहुंचते हैं तो उनमें बारिश कराने की क्षमता कम रह जाती है और वे आगे बढ़ जाते हैं. इसी कारण पलामू में अपेक्षाकृत कम वर्षा होती है. वहीं बादल आगे निकल जाते हैं.
खेती सबसे अधिक प्रभावित
डॉ. जायसवाल ने आगे बताया कि इस वर्ष एल नीनो के प्रभाव ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है. मानसून कमजोर रहने के कारण खेती-किसानी पर सीधा असर पड़ रहा है. धान जैसी फसलें सबसे अधिक प्रभावित हो रही हैं, जबकि किसानों को वैकल्पिक खेती और कम पानी में तैयार होने वाली फसलों की ओर ध्यान देना चाहिए. उन्होंने फलदार पौधों की खेती को भी बेहतर विकल्प बताया.
उन्होंने यह भी कहा कि अगर कभी मानसूनी हवाओं का रुख उत्तर या दक्षिण दिशा की ओर से होकर पलामू पहुंचे, तो जिले में सामान्य से अधिक बारिश होने की संभावना बन सकती है. लेकिन वर्तमान में बंगाल की खाड़ी से आने वाला मानसून पलामू की भौगोलिक बनावट के कारण अपेक्षित वर्षा नहीं करा पाता.
क्या है उपाय
पलामू में कम बारिश की समस्या केवल एक साल की नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही भौगोलिक चुनौती है. ऐसे में जल संरक्षण, तालाबों का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन और वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देना ही भविष्य में इस समस्या का प्रभाव कम करने का सबसे प्रभावी उपाय हो सकता है. बदलते मौसम के अनुरूप खेती की रणनीति अपनानी होगी और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में फलदार पौधों तथा सूखा सहन करने वाली फसलों की खेती बेहतर विकल्प हो सकती है.
जब पड़ा था सूखा
उन्होंने अपने बचपन का एक किस्सा भी बताया, जहां वर्ष 1966 के भीषण अकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय पूरे देश के साथ पलामू भी गंभीर रूप से प्रभावित हुआ था. उस दौर में 56 मन धान के बीज से केवल 18 मन धान की उपज हुई थी. पलामू के डाली गांव सहित कई इलाकों में कुएं तक सूख गए थे और लोगों को भोजन के लिए भी संघर्ष करना पड़ा था.
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बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन एंड जर्नलिज़्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट. पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और ABP न्यूज़ से होते हुए News18 Hindi तक पहुंचा. करियर और देश की …
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