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पलामू में धान रोपाई का काम तेजी से जारी है. नीलांबर-पीतांबरपुर में महिलाएं खेतों में लोकगीत गा रही हैं. ‘ऊंची रे अंटरिया…’ जैसे गीतों से काम आसान होता है. यह परंपरा मां-दादी से मिली है. ये गीत थकान मिटाते हैं और सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखते हैं.
पलामूः पलामू सहित पूरे झारखंड को कृषि प्रधान प्रदेश कहा जाता है और यहां खेती सिर्फ आजीविका का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति और परंपराओं का भी अभिन्न हिस्सा है. वहीं देश के अलग-अलग हिस्सों की अपनी अलग बोली, रीति-रिवाज और लोक परंपराएं हैं. इन्हीं परंपराओं में धान की रोपाई के दौरान महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से लोकगीत गाने की परंपरा भी शामिल है. खेतों में घंटों तक मेहनत करने के बीच ये गीत न केवल थकान को कम करते हैं, बल्कि आपसी सहयोग, उत्साह और सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत बनाए रखते हैं.
धान की रोपनी में गीत गाने की परंपरा
बता दें कि पलामू जिले के विभिन्न इलाकों में धान की रोपाई का कार्य तेजी से चल रहा है. जिले के नीलांबर-पीतांबरपुर प्रखंड के गांवों में महिलाएं धान रोपते समय पारंपरिक लोकगीत गाते हुए नजर आ रही हैं. खेतों में एक स्वर में गूंजते ये गीत ग्रामीण जीवन की सादगी और लोक संस्कृति की खूबसूरती को दर्शाते हैं. वर्षों पुरानी यह परंपरा आज भी गांवों में जीवित है, हालांकि आधुनिकता के दौर में ऐसे लोकगीत धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं.
धान की रोपाई कर रही रीता देवी ने लोकल18 को बताया कि खेत में लगातार काम करने के दौरान गीत गाने से मन लगा रहता है और काम भी आसान महसूस होता है. उन्होंने कहा कि यह परंपरा उन्हें अपनी मां और दादी से मिली है. बचपन से ही वे इन गीतों को सुनते और सीखते आए हैं. धान रोपनी के कई पारंपरिक गीत हैं, जिन्हें महिलाएं मौसम, खेती और पारिवारिक भावनाओं के अनुसार गाती हैं. उनका मानना है कि ये गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि गांव की सांस्कृतिक पहचान भी हैं.
‘ऊंची रे अंटरिया के पूरबी दुहरिया’
आगे कहा कि रोपाई के दौरान महिलाएं कई पारंपरिक गीत गाती हैं. जिसमें एक “ऊंची रे अंटरिया के पूरबी दुहरिया, सेहो बैसी सुतले मायेनवा रे…” भी शामिल है. इस गीत का भावार्थ है कि ऊंचे आंगन के पूर्व दिशा वाले बरामदे में मां बैठी या लेटी हुई विश्राम कर रही है. इस छोटी-सी पंक्ति में गांव, घर, मां और परिवार के प्रति आत्मीयता का सुंदर चित्र उभरकर सामने आता है. ऐसे लोकगीत ग्रामीण समाज की संवेदनाओं, रिश्तों और जीवनशैली को सहज रूप से अभिव्यक्त करते हैं.
आज जब खेती में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है, तब भी पलामू के गांवों में धान रोपनी के साथ गूंजते ये लोकगीत यह संदेश देते हैं कि विकास के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजकर रखना भी उतना ही जरूरी है. खेतों में महिलाओं का सामूहिक स्वर न केवल मेहनत को उत्सव में बदल देता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक लोक संस्कृति को जीवित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम भी बनता है.
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मीडिया में 6 साल का अनुभव है. करियर की शुरुआत ETV Bharat (बिहार) से बतौर कंटेंट एडिटर की थी, जहां 3 साल तक काम किया. पिछले 3 सालों से Network 18 के साथ हूं. यहां बिहार और झारखंड से जुड़ी खबरें पब्लिश करता हूं.