लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों का बिगुल बजने में भले ही अभी समय बाकी हो, लेकिन भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी सियासी बिसात पूरी तरह बिछा ली है. एक तरफ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और युवाओं के मुद्दों को लेकर आक्रामक है, तो वहीं दूसरी तरफ सीएम योगी ने बीजेपी को अपने सबसे परखे हुए हथियार. हाल ही में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर विधानसभा से लेकर सड़क तक छिड़ी बहस और इसे अनिवार्य बनाने व संवैधानिक प्रतीकों के सम्मान से जुड़े नए वैधानिक प्रस्तावों वंदे मातरम बिल पर संसद में सोमवार को होने वाले चर्चा से साफ हो जाएगा कि बीजेपी यूपी चुनाव 2027 की जंग किस नैरेटिव पर लड़ने जा रही है.
बीते विधानसभा सत्र के दौरान भी सीएम योगी आदित्यनाथ ने राष्ट्रगीत का विरोध करने वालों और तुष्टीकरण की राजनीति में जुटी विरोधी पार्टियों पर करारा प्रहार किया था. सीएम योगी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो लोग भारत में रहते हैं, उन्हें संवैधानिक प्रतीकों और ‘वंदे मातरम’ का सम्मान करना ही होगा.
‘वंदे मातरम’ और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: बीजेपी का नया नैरेटिव
सीएम योगी आदित्यनाथ का कड़ा रुख हमेशा चर्चा में रहता है. वह अक्सर बोलते रहते हैं कि हिंदुस्तान में रहकर भारत के राष्ट्रगीत गाने से जिन्हें दिक्कत होती है, वे संविधान और राष्ट्र दोनों का अपमान कर रहे हैं. तुष्टीकरण की राजनीति के लिए महापुरुषों और राष्ट्रीय प्रतीकों पर समझौता नहीं किया जा सकता.
‘जातीय कार्ड’ का तोड़ और ‘सनातनी एकजुटता’ का चुनाव
वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘वंदे मातरम’ के इर्द-गिर्द बुना जा रहा यह नैरेटिव सिर्फ एक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके जरिए बीजेपी उत्तर प्रदेश के मतदाता को एक बार फिर से ‘राष्ट्रवाद’ की छत्रछाया में एकजुट करने का प्रयास कर रही है. 2024 के लोकसभा चुनावों में यूपी के भीतर सपा-कांग्रेस गठबंधन ने मंडल राजनीति जातीय समीकरणों के जरिए बीजेपी को काफी नुकसान पहुंचाया था. इसी की काट के लिए अब ब्रांड योगी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को ढाल बना रहा हैं.
राजनीतिक धड़ा मुख्य चुनावी एजेंडा बीजेपी का काउंटर प्लान
सपा-कांग्रेस गठबंधन जातिगत जनगणना, बेरोजगारी, पीडीए (PDA) दांव, छात्र आंदोलन. विकास कार्यों के साथ अखंड ‘राष्ट्रवाद’ और कानून व्यवस्था का मुद्दा. वहीं बीजेपी का योगी मॉडल सांस्कृतिक पहचान अयोध्या, काशी, मथुरा, सुरक्षा और सख्त प्रशासन और अब वंदे मातरम जैसे मुद्दों से तुष्टीकरण की राजनीति को बेनकाब करना चाहती है.
बुलडोजर न्याय से लेकर धार्मिक कॉरिडोर तक का फॉर्मूला
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ केवल बयानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका प्रशासनिक और राजनीतिक मॉडल ‘कट्टर हिंदुत्व’ और ‘सुशासन’ के मिश्रण पर आधारित है. अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के बाद काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, मथुरा-वृंदावन का कायाकल्प और चित्रकूट जैसे तीर्थस्थलों के विकास को सीधे हिंदू जनमानस से जोड़ा जा रहा है. धर्मांतरण विरोधी कानून, लव जिहाद पर सख्ती और माफियाओं के खिलाफ जारी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को बीजेपी अपने सबसे बड़े एसेट के रूप में पेश कर रही है.
क्या रंग लाएगा सीएम योगी का राष्ट्रवाद?
राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो उत्तर प्रदेश में जब-जब चुनाव होते हैं, तब जातीय ध्रुवीकरण और धार्मिक-राष्ट्रीय ध्रुवीकरण के बीच सीधी टक्कर होती है. अखिलेश यादव जहां अति-पिछड़ों और दलितों को जोड़ने में लगे हैं, वहीं योगी आदित्यनाथ ‘वंदे मातरम’ और सांस्कृतिक गौरव जैसे मुद्दों से हिंदू समाज को जातियों से ऊपर उठाकर एक वोट बैंक के रूप में बांधना चाहते हैं. 2027 का चुनाव यह तय करेगा कि यूपी की जनता जातीय नैरेटिव को चुनती है या फिर योगी के ‘राष्ट्रवाद-सुशासन’ मॉडल को. साफ है कि लखनऊ से लेकर दिल्ली तक बीजेपी 2027 के लिए अपने ‘ब्रांड योगी’ और राष्ट्रवाद के एजेंडे को धार देने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है. आने वाले दिनों में वंदे मातरम और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की यह गूंज यूपी की सियासत को और ज्यादा आक्रामक बनाने वाली है.