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114 राफेल जेट खरीद की राह में 3 रोड़े, क्‍या टूट जाएगी...


India-France Rafale Deal: इंडियन एयरफोर्स दुनिया की ताकतवर वायुसेना में से एक है. बॉर्डर के एक तरफ पाकिस्‍तान और दूसरी तरफ चीन के होने के चलते नई दिल्‍ली के लिए सेना के तीनों अंगों (आर्मी, एयरफोर्स, नेवी) को मजबूत करना अनिवार्य है. इन दोनों पड़ोसी देशों के साथ भारत युद्ध लड़ चुका है. अतीत से सबक सीखते हुए बॉर्डर सिक्‍योरिटी को नेक्‍स्‍ट लेवल तक पहुंचाना बेहद जरूरी है. यही वजह है कि भारत आर्मी से लेकर एयरफोर्स और नेवी को अल्‍ट्रा मॉडर्न टेक्‍नोलॉजी से लैस करने के लिए हजारों-लाखों करोड़ रुपये खर्च कर रहा है. 21वीं सदी के वॉरफेयर में कई तरह के बदलाव आ चुके हैं. तोप-टैंक, फाइटर जेट और मिसाइल के साथ ही अब युद्ध के मैदान में ड्रोन का महत्‍व काफी बढ़ चुका है. इसके बावजूद फाइटर जेट एयर सुपिरियॉरिटी के लिए सबसे ज्‍यादा जरूरी है. मॉडर्न एज में भी जिस देश के पास जितना ताकतवर लड़ाकू विमान है, ग्‍लोबल लेवल पर उसका सिक्‍का उतनी ही तेज रफ्तार से चलता है. अमेरिका और रूस के बाद अब चीन भी इस सेगमेंट का अहम प्‍लेयर बन चुका है. भारत का चीन के साथ कैसा रिश्‍ता रहा है, यह बताने की जरूरत नहीं है, ऐसे में नई दिल्‍ली के लिए जरूरी है कि वह खुद को टू-फ्रंट वॉर के लिए तैयार रखे. इसके लिए एयरफोर्स के पास फाइटर जेट का पर्याप्‍त स्‍क्‍वाड्रन (यानी विमानों की संख्‍या) होना जरूरी है. मौजूदा हालात इस आवश्‍यकता के उलट है. इंडियन एयरफोर्स के लिए 42 स्‍क्‍वाड्रन मंजूर किए गए हैं, पर इसकी संख्‍या फिलहाल 29 है. यह अलार्मिंग सिचुएशन है. हालात को देखते हुए भारत दो मोर्चों पर एक साथ काम कर रहा है – फाइटर जेट इंपोर्ट करना और देसी टेक्‍नोलॉजी की मदद से अपने घर में लड़ाकू विमान का उत्‍पादन करना. भारत ने कुछ महीने पहले फ्रांस से 114 लड़ाकू विमान खरीदने के प्रस्‍ताव को हरी झंडी थी. अब इस डील पर आगे की बातचीत हो रही है. लेकिन, मल्‍टी-बिलियन डॉलर के इस डिफेंस डील में 3 महत्‍वपूर्ण रोड़े सामने आ रहे हैं. इन तीनों पर भारत और फ्रांस के बीच फिलहाल सहमति नहीं बन सकी है. हालांकि, इसे सुलझाने के लिए बातचीत की प्रक्रिया लगातार जारी है.

114 राफेल फाइटर जेट की खरीद प्रक्रिया को अंजाम तक पहुंचाने में जिन तीन मुद्दों पर बात अटकी है, उनमें राफेल के एक्टिव इलेक्‍ट्रॉनिकली स्‍कैन्‍ड ऐरे रडार (AESA) सिस्‍टम पर मालिकाना हक, सोर्स कोड की शेयरिंग और इंटरफेस कंट्रोल डॉक्‍यूमेंट शामिल हैं. भारतीय वायुसेना (IAF) के लिए 114 अतिरिक्त राफेल मल्टी-रोल लड़ाकू विमानों की करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की बहुप्रतीक्षित भारत-फ्रांस डिफेंस डील निर्णायक दौर में पहुंच गई है. हालांकि, समझौते से पहले 3 अहम तकनीकी मुद्दों पर दोनों देशों के बीच सहमति अभी तक नहीं बन पाई है. यही कारण है कि IAF की घटती स्क्वाड्रन संख्या के बीच भी यह रणनीतिक सौदा अंतिम रूप नहीं ले सका है. भारतीय वायुसेना ने इस वर्ष की शुरुआत में रक्षा मंत्रालय (MoD) को 114 राफेल विमानों की खरीद का प्रस्ताव भेजा था. इस योजना के तहत MRFA टेंडर प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट (G2G) मॉडल पर सौदा करने की तैयारी है. प्रस्ताव के अनुसार, 60 प्रतिशत से अधिक स्वदेशीकरण के लक्ष्य के साथ इन विमानों का निर्माण नागपुर स्थित डसॉल्ट एविएशन के ज्‍वाइंट प्‍लांट में किया जाएगा.

रडार IPR बनी बड़ी चुनौती

‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, राफेल में लगे RBE2-AA एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (AESA) रडार की बौद्धिक संपदा यानी इंटेलेक्‍चुअल प्रॉपर्टी राइट फ्रांसीसी कंपनी थेल्स (Thales) के पास है. डसॉल्ट एविएशन का कहना है कि रडार में किसी भी प्रकार के बदलाव का अधिकार उसके पास नहीं है, क्योंकि इसका स्वामित्व थेल्स के पास है. इससे भारत की भविष्य में स्वदेशी तकनीकों को जोड़ने की योजना प्रभावित हो सकती है.

सोर्स कोड तक पहुंच पर गतिरोध

दूसरा और अधिक संवेदनशील मुद्दा राफेल के सोर्स कोड तक पहुंच का है. यही सॉफ्टवेयर विमान के मिशन कंप्यूटर, सेंसर फ्यूजन और वेपन मैनेजेमेंट सिस्‍टम को कंट्रोल करता है. फ्रांस इस कोड को अपनी दशकों पुरानी रक्षा तकनीक की सुरक्षा से जोड़कर देखता है और उस पर कड़े निर्यात प्रतिबंध लागू हैं. यदि भारत को इस सोर्स कोड तक स्वतंत्र पहुंच नहीं मिलती है तो भविष्य में अस्त्र बियॉन्ड विजुअल रेंज (BVR) मिसाइल, रुद्रम एंटी-रेडिएशन मिसाइल या अन्य स्वदेशी हथियारों के इंटीग्रेशन के लिए हर बार डसॉल्ट पर निर्भर रहना पड़ेगा. इससे भारतीय वायुसेना की ऑपरेशनल लिबर्टी सीमित हो सकती है और पूरे लाइफ-साइकल के दौरान अपग्रेड तथा रखरखाव के लिए फ्रांसीसी कंपनियों पर निर्भरता बनी रहेगी.

फ्रांस की डसॉल्‍ट एविएशन इंडियन एयरफोर्स को 114 मल्‍टीरोल राफेल फाइटर जेट मुहैया कराएगी. (फाइल फोटो/Reuters)

ICD तक पहुंच चाहता है भारत

रक्षा मंत्रालय फिलहाल कम से कम इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट (ICD) तक पहुंच सुनिश्चित कराने पर जोर दे रहा है. आईसीडी ऐसा तकनीकी दस्तावेज है, जिसमें विमान के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के बीच कम्‍यूनिकेशन के तरीके, डेटा, इलेक्ट्रिक कनेक्शन और कम्युनिकेशन प्रोटोकॉल का विस्तृत विवरण होता है. आईसीडी विमान का सोर्स कोड नहीं होता, बल्कि यह बताता है कि बाहरी हथियारों और प्रणालियों को विमान से सुरक्षित तरीके से कैसे जोड़ा जा सकता है. इसके आधार पर डीआरडीओ और भारतीय निजी उद्योग अपने स्वयं के अडैप्टर, पाइलन और अन्य हार्डवेयर विकसित कर सकते हैं, ताकि भारतीय मिसाइलों को विमान पर एकीकृत किया जा सके.

Su-30MKI मॉडल को दोहराना चाहता है भारत

भारत पहले भी ऐसा मॉडल सफलतापूर्वक अपनाया है. Su-30MKI लड़ाकू विमान के मामले में रूस से आवश्यक इंटरफेस संबंधी तकनीकी जानकारी मिलने के बाद भारतीय इंजीनियरों ने विमान में संशोधन कर ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को सफलतापूर्वक इंटीग्रेट किया था. इस प्रक्रिया में रूस की प्रत्यक्ष निगरानी की आवश्यकता नहीं पड़ी थी. इसी अनुभव के आधार पर भारत अब राफेल के लिए भी आईसीडी तक पहुंच चाहता है, ताकि भविष्य में स्वदेशी हथियारों और प्रणालियों का एकीकरण अधिक स्वतंत्र तरीके से किया जा सके.

पुराने अनुभवों से सबक

रक्षा मंत्रालय का मानना है कि अतीत में मिराज-2000 अपग्रेड कार्यक्रम के दौरान सीमित तकनीकी पहुंच के कारण बातचीत लंबी चली थी और परियोजना की लागत भी बढ़ गई थी. इसलिए इस बार भारत किसी भी प्रकार के वेंडर लॉक-इन से बचना चाहता है. सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति के तहत रक्षा प्लेटफॉर्मों पर अधिकतम तकनीकी नियंत्रण हासिल करने पर जोर दिया जा रहा है. हालांकि, फ्रांस की ओर से डसॉल्ट, थेल्स, सफरान और एमबीडीए जैसी कंपनियां इस बात पर जोर दे रही हैं कि सोर्स कोड और संवेदनशील एल्गोरिद्म साझा करने से उनकी अत्याधुनिक रक्षा तकनीकों के रिवर्स इंजीनियरिंग का खतरा बढ़ सकता है.

फ्यूचर प्‍लानिंग

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत भविष्य में राफेल पर स्वदेशी उत्तम GaN आधारित AESA रडार या अन्य भारतीय प्रणालियों के इंटीग्रेशन की दिशा में आगे बढ़ता है, तो इसके लिए राफेल के सेंसर, स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और अन्य ऑनबोर्ड प्रणालियों के साथ गहन तकनीकी समन्वय की आवश्यकता होगी. इसमें डसॉल्ट और उसके साझेदारों की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी होगी. इसका महत्व केवल राफेल तक सीमित नहीं है. उत्तम रडार भविष्य में तेजस MK-2, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) और सुपर सुखोई अपग्रेडेशन कार्यक्रमों की आधारभूत तकनीक माना जा रहा है. यदि भारत इन प्रणालियों के सॉफ्टवेयर और इंटरफेस पर पर्याप्त नियंत्रण हासिल कर लेता है, तो नए एयर-टू-एयर, एयर-टू-ग्राउंड और स्टैंडऑफ हथियारों का इंटीग्रेशन कहीं अधिक तेज और स्वतंत्र रूप से किया जा सकेगा. इससे भारतीय वायुसेना के लिए नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता को मजबूत करने और रक्षा क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण बढ़त मिलेगी.



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