देश में जजों की नियुक्ति को लेकर लंबे समय से चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने कॉलेजियम सिस्टम पर खुलकर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता की कमी की वजह से ऐसे लोग भी न्यायपालिका का हिस्सा बन जाते हैं, जो किसी समुदाय या वर्ग के लोगों को ‘चींटी’ जैसी उपमा देते हैं और बाद में बिना किसी जवाबदेही के बच निकलते हैं. उन्होंने ऐसे बयानों को संविधान की भावना के पूरी तरह खिलाफ बताया.
जस्टिस भुइयां ने साफ कहा कि अगर न्यायपालिका में नियुक्ति की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होती और उम्मीदवारों को लेकर सार्वजनिक चर्चा होती, तो ऐसे लोगों की एंट्री रोकी जा सकती थी.
‘जज बनने वालों पर सार्वजनिक चर्चा से क्या नुकसान?’
नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC) में विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की ओर से आयोजित कार्यक्रम में ‘द ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी इंडेक्स’ रिपोर्ट जारी करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि आखिर जज बनने वाले लोगों के बारे में सार्वजनिक चर्चा होने में क्या दिक्कत है.
उन्होंने कहा, ‘अगर ऐसे लोगों की नियुक्ति रोकनी है तो चर्चा होनी चाहिए. लोगों को यह जानने का अधिकार है कि देश में किन लोगों को जज बनाया जा रहा है. इसमें क्या नुकसान है कि जनता के सामने यह जानकारी रखी जाए?’ उनका कहना था कि पारदर्शिता बढ़ने से न्यायपालिका पर जनता का भरोसा भी और मजबूत होगा.
कॉलेजियम की गोपनीयता पर उठाए सवाल
जस्टिस भुइयां ने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम में जजों की नियुक्ति और तबादलों से जुड़ी पूरी प्रक्रिया बेहद गोपनीय रहती है. कई बार यह भी सार्वजनिक नहीं किया जाता कि किसी नाम को मंजूरी क्यों मिली या किसी सिफारिश को क्यों टाल दिया गया.
उन्होंने खास तौर पर 2025 की तीन कॉलेजियम बैठकों का जिक्र करते हुए कहा कि उनके फैसलों में नियुक्ति या तबादले के पीछे कोई स्पष्ट कारण सार्वजनिक नहीं किया गया. जबकि पहले कई मामलों में कॉलेजियम अपने फैसलों के पीछे विस्तृत कारण भी जारी करता था.
‘लोगों को चींटियां कहकर भी बच जाते हैं जज’
जस्टिस भुइयां ने कहा, ‘कारण न बताकर, संस्थान असल में उन कई न्यायधीशों का नुकसान करता है जो सचमुच बेहतरीन हैं और जिन्होंने बहुत अच्छा काम किया है.’ उन्होंने कहा, ‘इसके उलट, कारण न बताने से हम न्यायपालिका में ऐसे लोगों के आने की गुंजाइश भी बनाते हैं जो बाद में लोगों के समूहों को ‘चींटियां’ कह सकते हैं और ऐसी अन्य टिप्पणियां कर सकते हैं जो पूरी तरह से असंवैधानिक और संविधान के मूल्यों के खिलाफ हों.’ उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के प्रवेश को रोकने के लिए ‘कुछ चर्चा होनी चाहिए और कुछ कारण बताए जाने चाहिए’.
जस्टिस भुइयां ने कहा कि हाल ही में एक हाईकोर्ट के जज ने ऐसी टिप्पणी की थी. भुइयां ने हालांकि किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक पूर्व जज ने 2024 में विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में अपनी टिप्पणी से हंगामा खड़ा कर दिया था, जिसके बाद विपक्षी नेताओं ने उनके ‘घृणा भाषण’ के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी.
हाईकोर्ट जज ने कहा, ‘अपने देश में हमें सिखाया जाता है कि छोटे-से-छोटे जीव को भी नुकसान न पहुंचाएं, चींटियों को भी न मारें, और यह बात हमारे मन में गहराई से बैठ जाती है. शायद इसीलिए हम सहनशील और दयालु होते हैं; जब दूसरे दुख में होते हैं, तो हमें भी दर्द महसूस होता है. लेकिन आपकी संस्कृति में, बच्चों को कम उम्र से ही जानवरों को मारे जाने का दृश्य दिखाया जाता है. ऐसे में आप उनसे सहनशील और दयालु होने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?’
‘जज कौन होगा, यह जानना जनता का अधिकार’
जस्टिस भुइयां ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के पिछले तीन बयानों में न्यायाधीशों की पदोन्नति की सिफारिश करने का कोई कारण नहीं बताया गया था. उन्होंने कहा, ‘कुछ लोग तो यह भी कह सकते हैं कि वे कुछ हद तक एक ही ढर्रे पर आधारित या ‘हूबहू उठाकर रखने’ जैसे थे. लेकिन कम से कम उन सुझावों को सही ठहराने के लिए कुछ कारण तो बताए गए थे.’
कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कुछ लोगों को ‘कॉकरोच’ कहकर विवाद खड़ा कर दिया, जिससे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम का एक ऑनलाइन आंदोलन शुरू हुआ, जिसने नीट पेपर लीक के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया.
कॉलेजियम व्यवस्था की आलोचना का जिक्र करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने पहले कहा था कि जब कॉलेजियम सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश करता है, तो कई बातों को ध्यान में रखा जाता है, जैसे कि उनका कामकाज, न्यायाधीश के तौर पर काम करने की अवधि, पहले संभाले गए पद और यहां तक कि उनका पेशेवर जीवन भी.