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Palamu Bhaisakhur Shiv Mandir: पलामू के भैंसाखुर शिव मंदिर की पहचान सिर्फ इसकी खास मान्यताओं से नहीं, बल्कि यहां शिवलिंग के पास जमीन से अपने आप निकलने वाले जल से भी जुड़ी है. करीब 120 साल पुराने इस मंदिर में 60 साल पुराना मां दुर्गा मंदिर भी है. कहते हैं कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है, इसलिए इसे कामना पूरक मंदिर भी कहा जाता है.
पलामू. सावन का पावन महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है. इस दौरान शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, लेकिन झारखंड के पलामू जिले का भैंसाखुर शिव मंदिर अपनी अनोखी मान्यता और रहस्यमयी विशेषता के कारण अलग पहचान रखता है. पलामू जिला मुख्यालय मेदिनीनगर से करीब नौ किलोमीटर दूर सदर प्रखंड के जमुने गांव में स्थित यह प्राचीन मंदिर सावन में हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन जाता है. यहां आने वाले भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना भगवान शिव जरूर स्वीकार करते हैं.
धरती से खुद निकलता है जल
पुजारी कुसुमकांत पांडे ने लोकल 18 को बताया कि भैंसाखुर मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए किसी स्रोत की जरूरच नहीं पड़ती. मंदिर परिसर में शिवलिंग के पास जमीन के भीतर से वर्षों से स्वतः जल निकलता रहता है. उन्होंने कहा कि यह सिलसिला सैकड़ों वर्षों से लगातार जारी है. इस जल का स्रोत आज तक कोई नहीं खोज पाया, इसलिए श्रद्धालु इसे भगवान शिव का चमत्कार और दिव्य कृपा मानते हैं.
देवक्कड़ महाराज और जंगल की कथा
उन्होंने आगे कहा कि मंदिर का इतिहास लगभग 128 वर्ष पुराना माना जाता है, जबकि इससे जुड़ी लोककथा उससे भी कहीं अधिक प्राचीन है. कहा जाता है कि कभी यह पूरा इलाका घने जंगलों से घिरा था, जहां देवक्कड़ महाराज साधना करते थे. उस समय उनके पास एक बाघ और एक भैंसा था, जिन्हें वे साथ रखते थे. एक दिन दोनों के बीच भीषण संघर्ष छिड़ गया. घंटों तक चले इस युद्ध में आखिरकार भैंसे ने बाघ को परास्त कर दिया. यहां मान्यता है कि संघर्ष के दौरान भैंसे का खुर एक विशाल चट्टान पर गहराई तक धंस गया. उसी निशान के कारण इस स्थान का नाम भैंसाखुर पड़ा और यह कथा आज भी लोगों की जुबान पर जीवित है.
शिवलिंग की खोज और अटूट आस्था
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मंदिर में स्थापित शिवलिंग खुदाई के दौरान मिला था. इसके बाद यहां नियमित पूजा-अर्चना शुरू हुई और धीरे-धीरे यह स्थान दूर-दराज के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया. सावन के हर सोमवार को यहां विशेष पूजन, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक होता है. इसके साथ ही पलामू के अलावा झारखंड के अन्य जिलों तथा पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
कामना पूरक दुर्गा मंदिर और महाप्रसाद की परंपरा
पुजारी ने आगे बताया कि भैंसाखुर मंदिर परिसर में लगभग 60 वर्ष पुराना मां दुर्गा का मंदिर भी स्थित है, जिसे कामना पूरक मंदिर माना जाता है. श्रद्धालु यहां चुनरी और नारियल अर्पित कर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं. मान्यता है कि मां दुर्गा भक्तों की हर सच्ची इच्छा पूरी करती हैं. सावन के अंतिम सोमवार को मंदिर समिति की ओर से भव्य महाप्रसाद का आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं. आस्था, लोककथाओं और रहस्य का अनोखा संगम बना भैंसाखुर मंदिर आज भी पलामू की धार्मिक विरासत का एक जीवंत प्रतीक है.
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Raina Shukla is an experienced journalist and content professional with nearly two decades of experience in print and digital media. She holds a Master’s degree in Mass Communication and Journalism from Bundelk…
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