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बांकीपुर उपचुनाव में बीजेपी की हार ने बिहार एनडीए में हलचल बढ़ा दी है. इसके बाद नीतीश कुमार और पीएम मोदी की मुलाकात काफी अहम मानी जा रही है. हालांकि बिहार में उपचुनावों के नतीजे कभी भी विधानसभा चुनाव के पक्के संकेत नहीं होते. साल 2010 में भी ऐसा ही हुआ था. फिलहाल इसे केवल एक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए. जेडीयू और बीजेपी को तालमेल बढ़ाना होगा.
बांकीपुर उपचुनाव में हार के अगले दिन ही नीतीश कुमार नई दिल्ली आए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले. (Photo: Nitish Kumar/X)
बांकीपुर की हार के बाद नीतीश कुमार और पीएम मोदी की मीटिंग अहम है. दरअसल बिहार में एनडीए गठबंधन के दोनों साथियों में खट्टा-मीठा रिश्ता हमेशा से रहा है. 2020 चुनाव के बाद ये और तेज हुआ, जब ज्यादा सीटों पर लड़ने के बावजूद जेडीयू सिर्फ 43 सीटों पर सिमट गई थी. इसके बाद जब भी उपचुनाव हुए गठबंधन धर्म के बावजूद दोनों दल एक-दूसरे की ताकत का टेस्ट लेते रहे.
बोचहां में बीजेपी की बेबी कुमारी की हार इसी का नतीजा थी. उस समय जेडीयू खेमे में एक अलग तरह का जश्न था. अब तक बड़े भाई की भूमिका में रही जेडीयू के लिए बीजेपी की हार मलहम का काम कर रही थी. हालांकि, इसके बावजूद नीतीश कुमार ने अगस्त, 2022 में यू टर्न ले ही लिया. तब बोचहां में स्थानीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ सवर्णों में नाराजगी की बात सामने आ रही थी. इसके उलट जब कुढ़नी का उपचुनाव हुआ तो बीजेपी का कैडर जेडीयू को सबक सिखाना चाहता था. क्योंकि ये चुनाव दिसंबर में था और नीतीश अब तेजस्वी के साथ सरकार चला रहे थे. ये सीट आरजेडी विधायक के अयोग्य घोषित होने के बाद खाली हुई थी. फिर क्या था. जो ताकतें बोचहां में बीजेपी की हार का कारण बनीं वही कुढ़नी में बीजेपी के केदार गुप्ता की जीत के कारण बनीं.
बांकीपुर में प्रशांत किशोर की शानदार जीत. (Photo : PTI)
अब बांकीपुर में बीजेपी की हार के बाद जेडीयू कैसा महसूस कर रही है, इसे समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है. श्याम रजक की नसीहत आ चुकी है. बीजेपी अपने कार्यकर्ताओं का सम्मान करे. यह बयान अपने आप में गठबंधन के भीतर की मनोदशा को दिखाता है. बिहार की राजनीति लंबे समय से त्रिकोणीय रही है. यहां जो दो ध्रुव एक साथ आ जाते हैं, सरकार उसी की बनती है. नीतीश कुमार अब सार्वजनिक तौर पर बीजेपी के साथ स्थायी रहने की बात कर चुके हैं. ऐसे में जब तक जेडीयू का अस्तिव है, वो नहीं चाहेगी कि प्रशांत किशोर जैसी कोई तीसरी ताकत बिहार में उभरे.
वैसे भी बिहार के उपचुनाव पहले कभी बड़े संकेतक नहीं रहे हैं. 2010 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले 10 सीटों पर उपचुनाव हुए थे. ये सभी सीटें एनडीए के पास थीं, लेकिन उनमें से पांच पर आरजेडी ने कब्जा कर लिया. ये सीटें थीं – लौकहा, त्रिवेणीगंज, रूपौली, बायसी और कस्बा. उस समय भी यही नैरेटिव बना कि 2010 से पहले आरजेडी का कमबैक हो रहा है. लेकिन जब अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव हुए, तो तस्वीर पूरी तरह बदल गई और आरजेडी सिर्फ 22 सीटों पर सिमट गई.
आज नई दिल्ली स्थित संसद भवन में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के कार्यालय कक्ष में उनसे शिष्टाचार मुलाकात की। @narendramodi pic.twitter.com/LhUq77CCfb