JPSC Paper Leak: देशभर में एक बार फिर प्रतियोगी परीक्षाओं की साख पर सवाल उठ रहे हैं. कुछ दिन पहले तक NEET परीक्षा को लेकर हजारों छात्र दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे थे. अब झारखंड में झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC)और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC)से जुड़े मामलों को लेकर अभ्यर्थी सड़कों पर हैं. छात्रों का आरोप है कि भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता नहीं रही और गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए.इसी बीच झारखंड में जांच एजेंसियों की कार्रवाई ने इस पूरे विवाद को और गंभीर बना दिया है.CID और रांची पुलिस ने JPSC परीक्षा में कथित गड़बड़ियों की जांच के तहत रांची समेत कई जिलों में एक साथ छापेमारी की.यह कार्रवाई जांच के दौरान अभय तिवारी से हुई पूछताछ के आधार पर की गई.
जांच एजेंसियों ने रांची, धनबाद, हजारीबाग, पलामू और बिहार के कई ठिकानों पर एक साथ कार्रवाई की. जांच के दायरे में 15 से अधिक ठिकाने आए.रांची के नामकुम में आदित्य पांडेय के घर पर भी छापा पड़ा, जबकि पलामू में कोचिंग संचालक रवि के ठिकाने पर भी CID पहुंची. जांच के दौरान बताया गया कि रवि का मोबाइल बंद मिला और वह कथित तौर पर फरार है.यह ध्यान रखना जरूरी है कि जांच अभी जारी है और एजेंसियां कथित अनियमितताओं की पड़ताल कर रही हैं. अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएंगे लेकिन इतना जरूर है कि बार-बार सामने आने वाले ऐसे मामलों ने युवाओं के मन में परीक्षा प्रणाली को लेकर गहरा अविश्वास पैदा कर दिया है.
जब हर परीक्षा के बाद विवाद
पिछले कुछ वर्षों में देश ने कई ऐसी घटनाएं देखी हैं जहां प्रतियोगी परीक्षाओं के बाद पेपर लीक, कथित धांधली, परीक्षा रद्द होने, तकनीकी गड़बड़ियों या जांच की नौबत आई.हर बार एक जैसी तस्वीर सामने आती है-जांच एजेंसी सक्रिय होती है, एफआईआर दर्ज होती है, गिरफ्तारियां होती हैं, छापेमारी होती है, समितियां बनती हैं और सुधारों का वादा किया जाता है लेकिन कुछ समय बाद फिर कोई नया विवाद सामने आ जाता है.यही वजह है कि आज सवाल सिर्फ किसी एक परीक्षा का नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता का बन चुका है.
नुकसान सबसे ज्यादा किसका होता है?
किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के पीछे केवल एक प्रश्नपत्र नहीं होता बल्कि लाखों युवाओं की वर्षों की मेहनत होती है.कोई छात्र गांव छोड़कर शहर में कोचिंग करता है.कोई परिवार जमीन बेचकर फीस भरता है. कोई नौकरी छोड़कर तैयारी करता है. ऐसे में यदि परीक्षा पर सवाल उठते हैं.जांच शुरू होती है या परीक्षा रद्द होती है तो सबसे बड़ा नुकसान उसी ईमानदार अभ्यर्थी का होता है जिसने पूरी मेहनत से परीक्षा दी होती है.इसीलिए परीक्षा की विश्वसनीयता केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि सामाजिक भरोसे का भी प्रश्न बन जाती है.
JPSC का मामला क्या बताता है?
झारखंड में चल रही कार्रवाई यह दिखाती है कि अब जांच एजेंसियां केवल परीक्षा परिणाम तक सीमित नहीं रह गई हैं बल्कि पूरे नेटवर्क की जांच कर रही हैं.कोचिंग संस्थानों, शिक्षकों, संदिग्ध संपर्कों और अलग-अलग जिलों तक जांच का दायरा बढ़ाया गया है.इससे एक बड़ा सवाल सामने आता है-यदि किसी परीक्षा में कथित अनियमितताओं की आशंका हो तो क्या हमारी सुरक्षा व्यवस्था इतनी मजबूत है कि शुरुआती स्तर पर ही उसे रोका जा सके? यही वह बिंदु है जहां परीक्षा सुरक्षा पर गंभीर चर्चा की जरूरत महसूस होती है.
आज सुरक्षा का मतलब क्या है?
पहले परीक्षा सुरक्षा का मतलब केवल प्रश्नपत्र को सुरक्षित रखना माना जाता था लेकिन आज परीक्षा का पूरा ढांचा डिजिटल हो चुका है. ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल रिकॉर्ड, डेटा सेंटर, बायोमेट्रिक सत्यापन, कंप्यूटर आधारित परीक्षा, सुरक्षित नेटवर्क, लाइव मॉनिटरिंग और डिजिटल पहचान-सब कुछ परीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा है.इसलिए अब सुरक्षा केवल प्रश्नपत्र की नहीं बल्कि पूरी डिजिटल और प्रशासनिक श्रृंखला की होनी चाहिए.
भारत के पास तकनीक है, लेकिन उसका पूरा उपयोग हो रहा है?
भारत आज डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (Digital Public Infrastructure) के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है.यूपीआई, आधार और अन्य डिजिटल सेवाओं ने दिखाया है कि बड़े पैमाने पर सुरक्षित और पारदर्शी डिजिटल सिस्टम बनाए जा सकते हैं.फिर सवाल उठता है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में वही स्तर की सुरक्षा और पारदर्शिता हर जगह क्यों नहीं दिखाई देती?विशेषज्ञ मानते हैं कि तकनीक उपलब्ध है लेकिन सभी परीक्षा संस्थाओं में उसका समान और प्रभावी उपयोग नहीं हो पाता।
असल चुनौती तकनीक नहीं, भरोसे का सिस्टम है
परीक्षा सुरक्षा विशेषज्ञ आशीष मित्तल का कहना है कि परीक्षा सुरक्षा को केवल तकनीकी समाधान के रूप में नहीं देखा जा सकता.उनके अनुसार यह भरोसे की पूरी व्यवस्था है जो मजबूत तकनीक, पारदर्शी प्रक्रियाओं और जवाबदेह संस्थागत ढांचे पर टिकी होती है.अगर प्रक्रियाएं कमजोर हों.नियमित ऑडिट न हो, निगरानी ढीली हो और जवाबदेही तय न हो तो सबसे आधुनिक तकनीक भी पूरी तरह सफल नहीं हो सकती.
आखिर बार-बार ऐसी स्थिति क्यों बनती है?
विशेषज्ञों के अनुसार इसके कई कारण हो सकते हैं.प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर उसकी छपाई, सुरक्षित स्टोर और वितरण तक हर चरण बेहद संवेदनशील होता है. यदि किसी भी स्तर पर सुरक्षा कमजोर हो तो जोखिम बढ़ सकता है.दूसरी ओर डिजिटल सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. यदि सर्वर, डेटा या नेटवर्क पर्याप्त रूप से सुरक्षित नहीं हों या साइबर सुरक्षा मानकों का पालन न हो तो खतरे बढ़ जाते हैं.इसके अलावा मानव हस्तक्षेप भी बड़ी चुनौती है. किसी भी व्यवस्था में यदि जवाबदेही स्पष्ट न हो कर्मचारियों का प्रशिक्षण पर्याप्त न हो या निगरानी कमजोर हो तो तकनीक अकेले समाधान नहीं बन सकती.
AI से लेकर बायोमेट्रिक तक
आज AI, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, डेटा एनालिटिक्स, एन्क्रिप्टेड डेटा प्रबंधन और सुरक्षित डिजिटल प्लेटफॉर्म परीक्षा व्यवस्था को पहले से कहीं अधिक सुरक्षित बना सकते हैं लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक तभी प्रभावी होगी जब उसके साथ नियमित साइबर ऑडिट, प्रशिक्षित कर्मचारी, मजबूत निगरानी और समय पर जवाबदेही भी जुड़ी हो.
देशभर में एक समान सुरक्षा मानक क्यों जरूरी हैं?
परीक्षा की सुरक्षा से जुडे आशीष मित्तल बताते हैं कि भारत में अलग-अलग आयोग और एजेंसियां अलग-अलग परीक्षाएं आयोजित करती हैं. कुछ संस्थाएं डिजिटल परीक्षा संचालन में विशेषज्ञ हैं जबकि कुछ सुरक्षित टेस्ट डिलीवरी और उम्मीदवार सत्यापन पर काम करती हैं. ऐसे में जरूरी है कि सभी संस्थाओं के लिए समान न्यूनतम सुरक्षा मानक तय हों और उनका सख्ती से पालन कराया जाए. यदि हर संस्था अलग-अलग स्तर की सुरक्षा अपनाएगी तो पूरे सिस्टम में समान भरोसा बनाना मुश्किल होगा.
जवाबदेही तय होगी तभी लौटेगा युवाओं का भरोसा
हर विवाद के बाद जांच शुरू होती है लेकिन छात्रों का सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि अगली परीक्षा सुरक्षित होगी या नहीं.
युवाओं को केवल कार्रवाई की खबर नहीं चाहिए बल्कि यह भरोसा चाहिए कि भविष्य में उनकी मेहनत किसी लापरवाही, किसी कथित गिरोह या किसी कमजोर व्यवस्था की वजह से प्रभावित नहीं होगी.जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी और हर स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी तब तक यह भरोसा पूरी तरह वापस नहीं आ पाएगा.