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झारखंड की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में राज्य सरकार ने रांची के ओरमांझी स्थित सिकिदिरी स्वर्णरेखा जलविद्युत परियोजना के आधुनिकीकरण की तैयारी शुरू कर दी है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री सह विभागीय मंत्री हेमंत सोरेन की समीक्षा बैठक में दिए गए निर्देश के बाद अब इसको लेकर कार्रवाई तेज हो गयी है। जल्द ही झारखंड उर्जा उत्पादन निगम की एक टीम प्लांट जाकर हर पहलू की जांच करेगी। इसके बाद प्लांट के आधुनिकीकरण एवं प्लांट की क्षमता बढ़ाने जाने को लेकर एक प्रस्ताव तैयार करके उर्जा विभाग को सौंपा जाएगा। बतातें चलें कि सीएम ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि प्लांट में लगी पुरानी और नई मशीनों की कार्यक्षमता का तुलनात्मक अध्ययन कराया जाए तथा आधुनिक तकनीक के जरिए कम पानी में अधिक बिजली उत्पादन की संभावनाओं पर विस्तृत तकनीकी रिपोर्ट तैयार की जाए। मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य की बढ़ती बिजली जरूरतों को देखते हुए केवल वर्तमान उत्पादन बनाए रखना पर्याप्त नहीं होगा। नई तकनीकों और बेहतर संसाधन प्रबंधन के माध्यम से उत्पादन लागत कम करने तथा बिजली उत्पादन बढ़ाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे, जिससे झारखंड ऊर्जा के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बन सके। फैक्ट फाइल क्षमता के अनुसार नहीं हो पाता उत्पादन करीब चार दशक पहले स्थापित सिकिदिरी हाइडल पावर प्लांट झारखंड का एकमात्र बड़ा सरकारी जलविद्युत संयंत्र है। इसकी कुल स्थापित क्षमता 130 मेगावाट है। यहां 65-65 मेगावाट की दो यूनिट स्थापित हैं, जो गेतलसूद (रुक्का) डैम से छोड़े गए पानी के दबाव से बिजली पैदा करती हैं। हालांकि, मशीनें पुरानी होने और उत्पादन का पूरी तरह जल उपलब्धता पर निर्भर रहने के कारण कई बार क्षमता के अनुरूप उत्पादन नहीं हो पाता। इसलिए अहम है यह प्लांट सिकिदिरी परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता इसकी पीक लोड सपोर्ट क्षमता है। जब राज्य में अचानक बिजली की मांग बढ़ती है, तब यह परियोजना कुछ ही मिनटों में उत्पादन शुरू कर सकती है, जबकि थर्मल पावर प्लांट को चालू होने में कई घंटे लगते हैं। इसी कारण ग्रिड की स्थिरता बनाए रखने में सिकिदिरी की भूमिका अहम मानी जाती है।नई तकनीकों और बेहतर संसाधन प्रबंधन के माध्यम से उत्पादन लागत कम करने तथा बिजली उत्पादन बढ़ाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। जल्द ही इसपर काम भी शुरू होगा। वाटर सप्लाई व बिजली उत्पादन के बीच रखा जाएगा संतुलन परियोजना का महत्व केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। जिस गेतलसूद जलाशय से इस प्लांट को पानी मिलता है, वही रांची शहर की लगभग 90 प्रतिशत पेयजल आपूर्ति का भी प्रमुख स्रोत है। ऐसे में जल प्रबंधन के दौरान पेयजल और बिजली उत्पादन के बीच संतुलन बनाए रखना पड़ता है। कम वर्षा वाले वर्षों में इसका सीधा असर बिजली उत्पादन पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार समयबद्ध तरीके से रेनोवेशन एंड मॉडर्नाइजेशन की योजना लागू करती है और आधुनिक टरबाइन व नियंत्रण प्रणाली स्थापित की जाती है, तो बिना नया बांध बनाए भी मौजूदा संसाधनों से अधिक बिजली उत्पादन संभव हो सकता है। इससे राज्य को अपेक्षाकृत सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध होगी।
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