पलामू. पलामू जिले में वर्षों से लगने वाला डिज्नीलैंड मेला आजकल फिर लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया है. सावन के मौसम में आयोजित होने वाला यह मेला हर साल नई-नई मनोरंजन की सौगात लेकर आता है. इस वर्ष भी मेले का शुभारंभ हो चुका है, जहां बच्चों से लेकर युवाओं और महिलाओं तक सभी के लिए विशेष आकर्षण मौजूद हैं. समय के साथ यह मेला पहले से कहीं अधिक भव्य और आधुनिक स्वरूप ले चुका है. राखी पर जब बेटियां मायके आती हैं तो इस मेले का आनंद ले सकती हैं.
जीरो ग्रेविटी झूला बनेगा सबसे बड़ा आकर्षण
बता दें कि इस बार मेले की सबसे बड़ी खासियत जीरो ग्रेविटी झूला है. आयोजकों ने बताया कि इस झूले पर बैठने के बाद लोगों को कुछ क्षणों के लिए वैसा ही एहसास होगा, जैसा अंतरिक्ष में जीरो ग्रेविटी के दौरान होता है. इस झूले का टिकट 70 रुपये रखा गया है.
इसके अलावा नए अंदाज में जलपरी शो, टॉवर झूला, ब्रेक डांस, टोरा-टोरा, नौका सम्राट, मौत का कुआं, बच्चों के लिए मिक्की माउस, छोटे झूले और कई दूसरी आकर्षक राइड्स भी मेले में मौजूद हैं. रोमांच और मनोरंजन का यह अनूठा संगम लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है.
देशभर से पहुंचे 150 से अधिक स्टॉल
आयोजक अजय कुमार ने बताया कि मेले में केवल झूले ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों से आए करीब 150 स्टॉल भी लगाए गए हैं. इन स्टॉलों पर घरेलू उपयोग की वस्तुएं, हस्तशिल्प, सजावटी सामान, खिलौने, कपड़े, खानपान और कई तरह के उत्पाद उपलब्ध हैं. महिलाओं और बच्चों की पसंद को ध्यान में रखते हुए विशेष स्टॉल लगाए गए हैं, जिससे मेला खरीदारी और मनोरंजन का बेहतरीन केंद्र बन गया है.
सुरक्षा और सुविधाओं का विशेष इंतजाम
आयोजक अजय कुमार ने आगे बताया कि मेला प्रतिदिन सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक खुला रहेगा. प्रवेश शुल्क 20 रुपये रखा गया है. सुरक्षा के लिए पूरे परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और करीब 20 महिला एवं पुरुष सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई है. इसके अलावा फर्स्ट एड सेंटर और महिलाओं के लिए विशेष शौचालय की व्यवस्था भी की गई है, ताकि परिवार के साथ आने वाले लोगों को किसी प्रकार की असुविधा न हो.
पुरानी परंपरा से जुड़ा है मेले का इतिहास
स्थानीय समाजसेवी मनोहर कुमार लाली ने बताया कि पलामू में सावन के मेले की परंपरा कई दशकों पुरानी है. पहले श्रावणी मेला नदी किनारे आयोजित होता था, जहां लोग परिवार के साथ घूमने आते थे. उस समय आधुनिक झूले नहीं होते थे, फिर भी दूर-दूर से लोग इस मेले का आनंद लेने पहुंचते थे.
आज तकनीक के साथ मेले का स्वरूप बदल गया है, लेकिन लोगों का उत्साह और इससे जुड़ी भावनाएं आज भी वैसी ही हैं. यह मेला न केवल मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि स्थानीय व्यापार, रोजगार और सामाजिक मेलजोल को भी बढ़ावा देने वाला महत्वपूर्ण आयोजन बन चुका है.