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National Handloom Day: पश्चिम चम्पारण में थारू महिलाएं चरखे पर साड़ी, बेडशीट जैसे पारंपरिक कपड़े बुनती हैं. राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर इन केंद्रों की चर्चा हुई, जहाँ हाथ से बने कपड़ों की दिल्ली, मुंबई और नॉर्थ ईस्ट तक भारी डिमांड है. ये उत्पाद मजबूत, टिकाऊ और आकर्षक होते हैं.
पश्चिम चम्पारण: आज यानी 7 अगस्त को देशभर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में सेलिब्रेट किया जाता है. हथकरघा एक ऐसी तकनीक है, जिसके तहत लकड़ी के चरखों, प्लेटों और मशीनों की मदद से महिलाएं सदियों से चले आ रहे ट्रेडीशनल कपड़े जैसे साड़ी, ब्लाउज, पर्दे, बेड शीट इत्यादि बुनने का काम करती हैं. आश्चर्य की बात यह है कि आज के इस आधुनिक दौर में भी जहां मशीनों ने फैशन के नजरिए को बदल कर रख दिया है. बाजार में एक से बढ़कर एक डिजाइन दार कपड़े उतारे हैं. हथकरघा पर हाथों से बुने कपड़ों की डिमांड अपने चरम पर रहती है. क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से बिहार के सबसे बड़े जिले पश्चिम चम्पारण में भी कुछ ऐसे हथकरघा केंद्र संचालित हैं. जहां महिलाओं द्वारा चरखे पर तैयार किए गए पकड़ों की डिमांड देश की राजधानी दिल्ली सहित आर्थिक राजधानी मुंबई तक होती है.
चरखे पर तैयार होते हैं कपड़े
जिले के कुछ प्रखंड जैसे बगहा 02, रामनगर और गौनाहा में थारू जनजाति के लोगों का बसेरा है. जीविकोपार्जन के लिए यहां के पुरुष मुख्य रूप से खेती बाड़ी और पशुपालन पर निर्भर रहते हैं, तो महिलाएं हथकरघा में लकड़ी के फ्रेम और चरखे पर कपड़े बुनने का काम करती हैं. हाथों से की गई मजबूत बुनाई और कई पीढ़ियों से चली आ रही कला को जब महिलाएं पकड़ों पर उकेरती हैं, तो देखने वाले देखते ही रह जाते हैं. बगहा 02 के अंतर्गत आने वाले मिश्रौली गांव में संचालित हथकरघा की लीडर रुक्मणी देवी बताती हैं कि यहां तैयार किए गए कपड़ों की डिमांड दिल्ली, मुंबई, झारखंड, मध्यप्रदेश और यूपी सहित नॉर्थ ईस्ट के कई राज्यों तक होती है.
30 महिलाओं का समूह
उनके केंद्र में कुल 30 थारू महिलाएं हैं, जो हर दिन चरखे की मदद से धागों को सुलझाती हैं. लकड़ी की फ्रेम पर शॉल, गमछा, चादर, तकिया का खोल, स्वेटर इत्यादि चीजों की बुनाई कर उन्हें तैयार करती हैं. एक महिला एक दिन में करीब 15 शॉल, 8 गमछा, 5 बेड शीट और 10 पिलो कवर तैयार कर लेती है.हाथों से तैयार इन कपड़ों की कीमत उनपर बनाई गई कलाकृतियों के अनुसार तय की जाती है. शॉल की कीमत 400 से लेकर 600 रुपए तक, तो वहीं डबल साइज बेडशीट की कीमत 300 से लेकर 500 रुपए तक होती है.
मजबूत, टिकाऊ और आकर्षक
मजबूत सिलाई, ट्रेडिशनल डिजाइंस और बेहतरीन कलर कॉम्बिनेशन के साथ ये कपड़े बेहद आकर्षक दिखते हैं. यही कारण है कि बिहार से लेकर देश के बड़े बड़े राज्यों तक इनकी डिमांड हर वक्त बनी रहती है. यूं कहें तो वर्तमान में हथकरघा पर निर्मित कपड़ों का अपना अलग एक फैन बेस है, जो इसकी खरीदारी के लिए हर वक्त तैयार रहते हैं.
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अमित रंजन वर्तमान में News18 में बिहार, झारखंड और दिल्ली से जुड़ी खबरों के समन्वय और संपादन का कार्य देख रहे हैं. खोजी पत्रकारिता उनकी विशेष रुचि का क्षेत्र है. राजनीति, शिक्षा, खेल, क्राईम और मौसम जैसे विषयों …
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