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Jharkhand Lady Tarzan Jamuna Tudu: झारखंड की जमुना टुडू को लोग प्यार से ‘लेडी टार्जन’ कहते हैं. उनका यह नाम ऐसे ही नहीं पड़ा. उन्होंने सालों-साल जंगलों बचाने के लिए संघर्ष किया और अपने साथ दूसरों को भी जोड़ा. उनके इन्हीं प्रयासों के कारण साल 2019 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया.
झारखंड की धरती सिर्फ खनिज संपदा के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध जंगलों और प्रकृति से जुड़े लोगों के लिए भी जानी जाती है. इसी धरती की एक ऐसी बेटी हैं जमुना टुडू, जिन्हें लोग प्यार से ‘लेडी टार्जन’ के नाम से जानते हैं. पूर्वी सिंहभूम जिले के चाकुलिया क्षेत्र के माटुरखाम गांव से जुड़ी जमुना टुडू ने जंगल और पर्यावरण की रक्षा के लिए वर्षों तक संघर्ष किया है. उनके काम को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2019 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया.
जमुना टुडू का जंगल बचाने का संघर्ष उस समय शुरू हुआ, जब उन्होंने माटुरखाम पहुंचने के बाद आसपास के जंगलों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की अवैध कटाई देखी. जंगल स्थानीय लोगों के जीवन और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा था, लेकिन लकड़ी माफिया लगातार पेड़ों की कटाई कर रहे थे. जमुना ने इस स्थिति को देखकर चुप रहने के बजाय विरोध करने का फैसला किया. वर्ष 1998 में उन्होंने गांव की करीब पांच महिलाओं को साथ लेकर वन सुरक्षा समिति बनाई. शुरुआत में यह लड़ाई आसान नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे गांव की अन्य महिलाएं भी उनके साथ आ गईं.
जंगल की रक्षा के लिए जमुना और उनके साथ जुड़ी महिलाएं कई बार पारंपरिक धनुष-बाण और अन्य साधनों के साथ जंगलों में गश्त करती थीं. उनका उद्देश्य किसी से हिंसा करना नहीं, बल्कि अवैध कटाई को रोकना और ग्रामीणों में जंगल बचाने के प्रति जागरूकता पैदा करना था. उनका संघर्ष ऐसे इलाके में था, जहां लकड़ी माफिया के साथ-साथ नक्सली गतिविधियों की चुनौती भी मौजूद थी. इसके बावजूद उन्होंने अपने अभियान को जारी रखा.
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जमुना टुडू की खासियत सिर्फ जंगल की निगरानी तक सीमित नहीं रही. उन्होंने ग्रामीण समुदाय को यह समझाने का प्रयास किया कि जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि उनके जीवन, पानी, मिट्टी, वन्यजीव और भविष्य से जुड़ा हुआ है. उन्होंने महिलाओं को भी इस अभियान में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया. यही वजह रही कि उनका छोटा-सा महिला समूह धीरे-धीरे बड़े सामुदायिक अभियान में बदल गया. उनकी पहल ने यह संदेश दिया कि अगर स्थानीय लोग अपनी प्राकृतिक संपदा की रक्षा के लिए एकजुट हो जाएं, तो बड़े स्तर पर बदलाव संभव है.
जमुना टुडू को ‘लेडी टार्जन’ का नाम उनके इसी साहस और जंगलों के प्रति समर्पण के कारण मिला. पेड़ों को बचाने के लिए उनका भावनात्मक जुड़ाव इतना गहरा रहा कि वह पेड़ों को अपने परिवार का हिस्सा मानती हैं. उनके संघर्ष और पर्यावरण संरक्षण के काम को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और वर्ष 2019 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया. उनका जीवन इस बात की मिसाल है कि बदलाव लाने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति और समुदाय का साथ भी काफी होता है.
आज जमुना टुडू की कहानी सिर्फ पूर्वी सिंहभूम या झारखंड तक सीमित नहीं है. वह देशभर में पर्यावरण संरक्षण, महिला नेतृत्व और सामुदायिक भागीदारी की प्रेरणादायक मिसाल बन चुकी हैं. जिन जंगलों को बचाने के लिए उन्होंने वर्षों तक संघर्ष किया, उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी समझाने का काम करती है. ‘लेडी टार्जन’ जमुना टुडू की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उन्होंने जंगल बचाने की लड़ाई को अकेले का संघर्ष नहीं रहने दिया, बल्कि गांव की महिलाओं और समुदाय को साथ लेकर इसे जनअभियान का रूप दिया.