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Jharkhand’s Special Art Sohrai Paintings: झारखंड की सोहराय पेंटिंग प्रकृति, वन्यजीवन और ग्रामीण जीवन को दर्शाती है. इसमें प्राकृतिक रंगों व बारीक आकृतियों का इस्तेमाल होता है, जो अब गांवों से शहरों तक फैल रही है. खास बात यह है कि इस पेंटिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले रंग भी प्राकृतिक होते हैं.
जमशेदपुर. झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और परंपराओं में सोहराय पेंटिंग का विशेष स्थान है. यह कला झारखंड की लोक संस्कृति, प्रकृति और वन्यजीवन से गहराई से जुड़ी हुई है, जो घरों की दीवारों और सार्वजनिक स्थानों पर देखी जा सकती है. इसे राज्य की पहचान कहा जाए तो गलत नहीं होगा. इस पेंटिंग की खास बात केवल आकृतियां और डिजाइन नहीं बल्कि विशेष रंगों का इस्तेमाल भी है. इन पेंटिंग्स को बनाने के लिए केमिकल वाले रंगों का इस्तेमाल नहीं किया जाता.
सोहराय कला की पहचान
सोहराय पेंटिंग झारखंड की प्रकृति, पशु-पक्षियों और ग्रामीण जीवन के प्रति लोगों के जुड़ाव को दर्शाती है. जमशेदपुर के प्रोफेशनल सोहराय आर्टिस्ट अर्णव कोले के अनुसार, इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी प्रकृति से जुड़ी शैली है. यह पेंटिंग प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ा कोई न कोई संदेश देती है, जिसमें जंगल में घूमते हाथी, हिरण, बैल, मछली और पक्षियों की आकृतियां शामिल होती हैं. इन आकृतियों के माध्यम से कलाकार प्रकृति और इंसान के बीच के रिश्ते को दर्शाते हैं.
प्राकृतिक रंगों का उपयोग
सोहराय पेंटिंग को खास बनाने वाली एक और महत्वपूर्ण बात इसमें इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक रंग हैं. आर्टिस्ट अर्णव कोले बताते हैं कि पारंपरिक सोहराय कला में मुख्य रूप से लाल, पीला, सफेद और काला रंग इस्तेमाल किया जाता है. इन रंगों को तैयार करने के लिए बाजार में मिलने वाले केमिकल रंगों की जगह झारखंड की मिट्टी और प्राकृतिक स्रोतों का उपयोग किया जाता है, जिससे पेंटिंग का स्वरूप पूरी तरह प्राकृतिक दिखाई देता है.
बारीक आकृतियां और डिजाइन
सोहराय की एक और खासियत इसकी आकृतियों और डिजाइन में देखने को मिलती है. कलाकार बिना किसी आधुनिक मशीन या तकनीक के हाथ से दीवारों पर बारीक आकृतियां बनाते हैं. जानवरों के साथ पेड़-पौधे, पत्तियां, फूल और दूसरी प्राकृतिक आकृतियां भी इसमें शामिल की जाती हैं. यही वजह है कि एक साधारण दीवार भी सोहराय पेंटिंग के बाद प्रकृति की खूबसूरत कहानी सुनाने लगती है.
कला का बढ़ता प्रसार
आज सोहराय कला गांवों की दीवारों से निकलकर शहरों और देश-दुनिया तक पहुंच रही है. लोग अपने घरों, कैफे, संस्थानों और अलग-अलग जगहों पर भी इस कला को अपना रहे हैं. हालांकि स्थान कोई भी हो, एक बात पक्की है कि जहां भी इस कला का इस्तेमाल किया जाता है, उसकी खूबसूरती बढ़कर कई गुना हो जाती है.
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Raina Shukla is an experienced journalist and content professional with nearly two decades of experience in print and digital media. She holds a Master’s degree in Mass Communication and Journalism from Bundelk…
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