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Natural Farming: पलामू जिले की महिला किसान अब रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर बढ़ रही हैं. चैनपुर प्रखंड के चेड़ाबर गांव की सुनीता देवी पिछले 16 वर्षों से खेती कर रही हैं. पहले वह रासायनिक खाद और दवाओं का इस्तेमाल करती थीं. अब वह प्राकृतिक तरीके से सब्जियों और दूसरी फसलों की खेती कर रही हैं. वह घर पर ही जैविक खाद तैयार करती हैं. इससे खेती की लागत कम हो गई है. सुनीता देवी प्राकृतिक खेती से हर महीने करीब 15 से 20 हजार रुपये तक कमा रही हैं.
पलामू: झारखंड के पलामू जिले में महिला किसान अब खेती के पुराने तरीकों में बदलाव कर रही हैं. कई महिलाएं रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक और जैविक खेती अपना रही हैं. इससे खेती की लागत कम हो रही है. साथ ही किसानों की आमदनी भी बढ़ रही है. चैनपुर प्रखंड के चेड़ाबर गांव की सुनीता देवी इसकी एक अच्छी मिसाल हैं. सुनीता देवी पिछले करीब 16 वर्षों से खेती कर रही हैं. पहले वह परिवार की परंपरा के अनुसार रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल करती थीं. लेकिन समय के साथ उन्होंने खेती का तरीका बदल दिया. अब वह प्राकृतिक और जैविक तरीके से खेती कर रही हैं.
दवाओं की जगह जैविक खाद का इस्तेमाल
सुनीता देवी अपने खेत में कई तरह की सब्जियां और दूसरी फसलें उगाती हैं. वह रासायनिक खाद और दवाओं की जगह जैविक खाद का इस्तेमाल करती हैं. उनके खेत की ताजी और रसायनमुक्त सब्जियों की मांग आसपास के लोगों में बढ़ रही है. इससे उन्हें अच्छी आमदनी हो रही है. सुनीता देवी के मुताबिक, प्राकृतिक खेती से उन्हें हर महीने करीब 15 से 20 हजार रुपये तक की आमदनी हो जाती है. अलग-अलग मौसम में होने वाली फसलों से उन्हें अतिरिक्त कमाई भी होती है. खास बात यह है कि जैविक खाद के लिए उन्हें बाजार पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. वह घर पर ही खाद तैयार करती हैं. इससे खेती का खर्च काफी कम हो जाता है.
जमीन की सेहत के लिए नुकसानदायक
लेस्लीगंज से प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण लेने पहुंची कलिंदा देवी भी इस तरीके से प्रभावित हैं. उन्होंने करीब एक साल पहले प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण लिया था. इसके बाद से वह लगातार प्राकृतिक तरीके से खेती कर रही हैं. उनका कहना है कि इससे लागत कम होती है और फसल से बेहतर मुनाफा मिलता है. कलिंदा देवी के अनुसार, प्राकृतिक खेती सिर्फ किसानों की आमदनी के लिए ही अच्छी नहीं है. इससे मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहती है. पर्यावरण को भी नुकसान कम होता है. उनका मानना है कि रासायनिक खाद और दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल लंबे समय में जमीन की सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है.
बेहतर मुनाफा देने वाली तकनीक
क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र चियांकी के कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने बताया कि जिले के अलग-अलग क्षेत्रों से महिला किसानों को प्राकृतिक और जैविक खेती का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. इसका उद्देश्य किसानों को कम लागत में बेहतर मुनाफा देने वाली तकनीकों से जोड़ना है. उन्होंने बताया कि अंधाधुंध रासायनिक खेती का असर मिट्टी और पर्यावरण पर पड़ सकता है. इसका प्रभाव इंसानों और पशुओं पर भी पड़ सकता है. किसानों को जीवामृत, घन जीवामृत, प्राकृतिक खाद और दूसरी जैविक विधियों की जानकारी दी जा रही है.
दूसरे किसानों के लिए मिसाल
कृषि वैज्ञानिक के अनुसार, प्राकृतिक खेती में इस्तेमाल होने वाली कई चीजें किसान अपने घर और खेत पर ही तैयार कर सकते हैं. इससे बाहर से सामान खरीदने का खर्च घटता है. खेती ज्यादा लाभकारी बनती है. साथ ही मिट्टी की सेहत भी बेहतर होती है. प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण के जरिए महिला किसानों को खेती को केवल आजीविका नहीं, बल्कि अच्छी आय का जरिया बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. सुनीता देवी जैसी महिला किसान अब दूसरे किसानों के लिए भी मिसाल बन रही हैं.
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न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क…
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