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माड़-भात खाकर किया संघर्ष, बांस की स्टिक से शुरू किया सफर, जानें...


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Indian Women Hockey Captain Salima Tete: झारखंड की सलीमा टेटे गरीबी के बावजूद भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान बनीं हैं. उन्होंने बॉस की हॉकी से ओलंपिक तक का सफर तय किया है. इसक साथ ही अर्जुन अवार्ड भी जीत चुकी हैं. आइये जानते हैं उनके संघर्ष की कहानी.

झारखंड की सलीमा टेटे ने गरीबी और अभावों के बावजूद भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तानी तक का सफर तय किया है. उनकी कहानी बांस की हॉकी से ओलंपिक तक पहुंचने की प्रेरणादायक गाथा है. झारखंड की राजधानी रांची से करीब 100 किलोमीटर की दूरी पर सिमडेगा है. जहां के छापर गांव की रहने वाली सलीमा टेटे हैं. सलीमा बताती हैं कि उनकी मां और बहन दोनों दूसरे के घरों में काम किया करती थी. पिताजी किसान आदमी थे. आमदनी बिल्कुल भी नहीं थी और वह बचपन में गली में बांस से हॉकी खेला करती थी.

क्योंकि उनके पास हॉकी स्टिक खरीने के पैसे नहीं थे. बता दें कि आज इतनी गरीबी के बावजूद भी सलीमा भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान हैं. इन्होंने ओलंपिक के लिए भी क्वालीफाई किया और कई सारे अवार्ड अपने नाम किया है. यह झारखंड की पहली हॉकी महिला प्लेयर हैं, जिन्हें केंद्र सरकार की तरफ से अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया गया है.

सलीमा बताती हैं जब वह पहली बार नेशनल मैच में खेल रही थी, तब हमारे घर में टीवी नहीं थी, जिसमें मेरे परिवार मुझे देख पाए. ऐसे में किसी पड़ोसी के घर जाकर पहली बार टीवी पर मेरे परिवार वालों ने मुझे देखा और वह पल बहुत ही भावुक कर देने वाला था. कभी नहीं सोचा था कि खेत खलियान और गली से निकल कर इंटरनेशनल लेवल पर खेलने का मौका मिलेगा.

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बचपन में हमारे पास छोटे-छोटे बांस हुआ करते थे. क्योंकि, खेत के अगल-बगल प्राकृतिक रूप से बांस उग जाते थे, तो उसी से हम लोग हॉकी स्टिक बना लेते और कोई पत्थर होता तो इधर-उधर करके हॉकी खेलने का आनंद लेते. घर में खाने के लिए भी एकदम साधारण माड भात तो कभी चोखा भात. इस तरीके का व्यंजन होता था.

लेकिन मन मे एक विश्वास था कि अगर आप मेहनत सही से करते हैं, तो आपको सफलता एक दिन जरूर मिलेगी. आप अपना काम करते रहिए. आपके हिस्से में जो होना होगा. वह अपने आप होते चला जाएगा. बस आप अपने प्रति ईमानदार रहिए. ऐसे में सिमडेगा हॉकी एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज कोंडेगी सर की नजर मुझ पर पड़ी और उनको लगा कि मैं कुछ कर सकती हूं.

उन्होंने मुझे ट्रेनिंग देना शुरू किया और नि:शुल्क आवासीय हॉकी प्रशिक्षण केंद्र में दाखिला देने में बहुत बड़ा सहयोग किया. यहां पर मुझे रहने व खाने पीने का कोई टेंशन नहीं था. आधुनिक हाकी स्टिक और सारी फैसिलिटी मिली और यही से जिंदगी की दिशा और दशा दोनों बदल गई. मैंने भी इस मौके का भरपूर फायदा उठाया और हर दिन 10- 12 घंटे प्रैक्टिस किया करती थी और आज जो भी कुछ हूं, अपने कोच और अपने परिवार की बदौलत हूं.



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