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कल (29 अगस्त को) राष्ट्रीय खेल दिवस पर पूरा देश हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को याद करेगा। खेल संस्कृति को बढ़ावा देने के बड़े-बड़े दावे होंगे। लेकिन इसी मौके पर राजधानी रांची की जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आएगी। दैनिक भास्कर ने राष्ट्रीय खेल दिवस के मौके पर जिले के सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए उपलब्ध खेल के संसाधनों की पड़ताल की। पता चला कि जिले के सैकड़ों सरकारी स्कूलों के नौनिहाल आज भी एक अदद सुरक्षित खेल मैदान के लिए तरस रहे हैं। रांची जिले में प्राथमिक, मध्य और हाई स्कूलों को मिलाकर कुल 2100 सरकारी स्कूल संचालित हैं। इनमें से करीब 1300 स्कूलों के पास अपना खेल मैदान ही नहीं है। व्यवस्था की बदहाली का आलम यह है कि 1200 स्कूलों में बाउंड्री वॉल तक नहीं है। नतीजतन, बच्चे स्कूल के संकरे बरामदों, सामने पड़ी कच्ची जमीन या व्यस्त सड़कों पर खेलने को मजबूर हैं। टाइम-टेबल में खेल की घंटी तो रोज बजती है, लेकिन मैदान के अभाव में शारीरिक शिक्षा केवल खानापूर्ति बनकर रह गई है। खेल सामग्री और आयोजनों के नाम पर हर साल लाखों रुपए पानी की तरह बहाए जाते हैं, मगर बुनियादी ढांचा आज भी नदारद है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि बिना सुरक्षित मैदान, दौड़ने की जगह और जरूरी सुविधाओं के झारखंड से राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी आखिर कैसे तैयार होंगे। जहां फिजिकल टीचर नहीं, वहां दूसरे शिक्षक करा रहे रस्म अदायगी राजधानी रांची के सरकारी हाई स्कूलों में खेल प्रतिभाओं को तराशने के सरकारी दावे हवा-हवाई साबित हो रहे हैं। जिले के 176 हाई स्कूलों में से मात्र 100 स्कूलों में ही नियमित शारीरिक शिक्षक (फिजिकल टीचर) पदस्थापित हैं। वहीं शेष 76 हाई स्कूल बिना किसी खेल शिक्षक के संचालित हो रहे हैं। विशेषज्ञ शिक्षकों की भारी कमी का सीधा खामियाजा विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है, जिससे उनका नियमित शारीरिक प्रशिक्षण और खेल अभ्यास पूरी तरह ठप पड़ा है। कई स्कूलों में सामान्य विषयों के शिक्षक जैसे-तैसे खेल की जिम्मेदारी संभालते हैं, जबकि अधिकांश स्कूलों में खेल की घंटी केवल औपचारिकता रह गई है। बिना बुनियादी मार्गदर्शन के बच्चों की खेल प्रतिभाएं स्कूल स्तर पर ही दम तोड़ रही हैं। केस-1 : राजकीयकृत प्राथमिक विद्यालय, कोकर (मैदान नहीं, सड़क किनारे खेलते हैं बच्चे) कोकर जतरा मैदान स्थित राजकीयकृत प्राथमिक विद्यालय में नर्सरी से पांचवीं कक्षा तक करीब 150 बच्चे पढ़ते हैं। स्कूल के पास न तो अपना खेल मैदान है और न ही सुरक्षा के लिए बाउंड्री वॉल। स्कूल के बाहर स्थित जतरा मैदान भी विद्यालय की संपत्ति नहीं है। यहां सप्ताह में एक दिन हाट-बाजार सजता है। मैदान से सटी व्यस्त सड़क पर दिनभर तेज रफ्तार वाहनों की आवाजाही लगी रहती है। शिक्षकों का कहना है कि खेल की घंटी बजते ही बच्चे मजबूरी में इसी असुरक्षित मैदान में खेलने लगते हैं, जिससे गंभीर हादसे की आशंका बनी रहती है। वहीं, बारिश के दिनों में प्रार्थना सभा से लेकर खेल तक स्कूल के संकरे बरामदे में समेटनी पड़ती हैं। केस-2 : जिला स्कूल, मेन रोड (फिजिकल टीचर हैं, पर मैदान बदहाल) राजधानी के मेन रोड स्थित प्रतिष्ठित जिला स्कूल में शारीरिक शिक्षक (फिजिकल टीचर) तो तैनात हैं, लेकिन खेल मैदान की घोर बदहाली विद्यार्थियों की राह में बड़ा रोड़ा बनी हुई है। बरसात के मौसम में पूरे मैदान में बड़ी-बड़ी अनचाही घास उग आई है, जिससे दौड़, फुटबॉल, एथलेटिक्स सहित अन्य खेलों का अभ्यास बंद पड़ा है। नियमित साफ-सफाई और सही रखरखाव के अभाव में खिलाड़ियों को दैनिक अभ्यास करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। उपेक्षा का आलम यह है कि जिस मैदान पर छात्रों को पसीना बहाना चाहिए, वहां दिनभर बेसहारा मवेशी घास चरते नजर आते हैं। अपना मैदान नहीं, दूसरे परिसरों का सहारा लेते हैं जिन सरकारी स्कूलों के पास अपना खेल मैदान नहीं है, वहां विद्यार्थियों को पास के सार्वजनिक स्थलों या अन्य संस्थानों के मैदान में खेल गतिविधियां कराई जाती हैं। कई पुराने स्कूल बिना मैदान के प्रावधान के ही बने थे। फिलहाल इस समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस योजना नहीं है। – शशि रंजन, राज्य परियोजना निदेशक
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