नेबरहुड फर्स्ट और एक्सटेंडेड नेबरहुड की नीति पर चलते हुए भारत मध्य एशिया के शतरंज पर एक बहुत बड़ा दांव खेलने जा रहा है. पीएम नरेंद्र मोदी का 29 अगस्त से 1 सितंबर तक उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान के दौरे पर होंगे. ये दौरा कोई रुटीन कूटनीतिक ट्रिप नहीं है. जब चीन अपना जाल बिछा रहा हो और वैश्विक समीकरण बदल रहे हों, तब ताशकंद का राजकीय दौरा और बिश्केक में 26वें SCO शिखर सम्मेलन में मौजूदगी भारत के व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक हितों को सीधा साधने की बड़ी तैयारी है. मध्य एशिया में भारत की मजबूत एंट्री सिर्फ हमारी मौजूदगी नहीं दर्ज कराएगी, बल्कि इस पूरे इलाके में पावर बैलेंस का नया ढांचा तय करेगी.
पीएम मोदी का उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान दौरा
21वीं सदी की दुनिया का असली पावर सेंटर सिर्फ वॉशिंगटन, बीजिंग या मॉस्को नहीं, बल्कि मध्य एशिया की वो जमीन है जिसे कभी ‘ग्रेट गेम’ का मैदान कहा जाता था. 29 अगस्त से शुरू हो रहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उज्बेकिस्तान और किर्गिज़ गणराज्य का दौरा इसी विशाल बिसात पर भारत की एक ऐसी चाल है, जो आने वाले दशकों के लिए भारत की आर्थिक और डिफेंस नीतियों की दिशा तय करने वाली है.
ताशकंद का ऐतिहासिक नाता और ‘विकसित भारत@2047’ का विजन
उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शवकत मिर्जियोयेव के खास निमंत्रण पर पीएम मोदी का ये चौथा ताशकंद दौरा है. कूटनीति में जब कोई नेता किसी देश में बार-बार कदम रखता है, तो इसका सीधा मतलब होता है कि दोनों देशों के बीच सिर्फ रस्म अदायगी नहीं हो रही, बल्कि जमीनी स्तर पर काम चल रहा है. हमारे बीच सिल्क रूट के जमाने का व्यापारिक और सांस्कृतिक नाता तो रहा ही है, लेकिन आज की चुनौती इस ऐतिहासिक रिश्ते को हाई-टेक युग में ढालने की है.
ताशकंद में इस बार सबसे बड़ा फोकस ‘विकसित भारत@2047’ और ‘उज्बेकिस्तान-2030’ के विकास मॉडलों को आपस में सिंक करने पर है. भारत अपनी आर्थिक तरक्की का फायदा मध्य एशिया तक पहुंचाना चाहता है और इसके तीन सबसे अहम पिलर हैं.
- डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और UPI: भारत का फिनटेक मॉडल आज पूरी दुनिया में डंका बजा रहा है. ताशकंद में डिजिटल पेमेंट्स और UPI जैसी तकनीकों को साझा करने से उज्बेकिस्तान की अर्थव्यवस्था को तो मदद मिलेगी ही, भारतीय डिजिटल कंपनियों के लिए भी एक नया बाजार खुलेगा.
- ऊर्जा और यूरेनियम सिक्योरिटी: परमाणु ऊर्जा और स्वच्छ ऊर्जा के लिए भारत को ईंधन चाहिए. उज्बेकिस्तान के पास प्राकृतिक खजाने और यूरेनियम का विशाल भंडार है. इस दौरे पर लंबी अवधि के आपूर्ति समझौतों पर मुहर लगना भारत की एनर्जी सिक्योरिटी के लिए मास्टरस्ट्रोक होगा.
- सांस्कृतिक और जन-जन का रिश्ता: ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री जी के स्मारक पर श्रद्धांजलि देना और ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी में महात्मा गांधी केंद्र जाना सिर्फ एक प्रोटोकॉल नहीं है. ये उस सॉफ्ट पावर को सींचने का तरीका है, जो भारत को वहां के स्थानीय लोगों के दिलों में खास जगह देता है.
बिश्केक में 26वां SCO सम्मेलन: 25वीं वर्षगांठ पर भारत की गर्जना
दौरे का दूसरा चरण बिश्केक में होने वाला 26वां शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन है. संगठन की 25वीं वर्षगांठ का ये अवसर ऐसे समय में आया है जब दुनिया दो-फाड़ नजर आ रही है. 2017 से SCO का पूर्ण सदस्य होने के नाते भारत हमेशा इस बात पर अड़ा रहा है कि ये मंच किसी देश के एजेंडे को थोपने का जरिया नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शांति का जरिया बनना चाहिए.
बिश्केक में पीएम मोदी का पूरा भाषण तीन बुनियादी बातों के इर्द-गिर्द घूमने वाला है.
- सुरक्षा: अफगानिस्तान में जो कुछ भी घट रहा है, उसका सीधा असर सेंट्रल एशिया और भारत की सीमा सुरक्षा पर पड़ता है. आतंकवाद, कट्टरपंथ और ड्रग्स की क्रॉस-बॉर्डर तस्करी के खिलाफ एक फ्रेमवर्क तैयार करना भारत की पहली प्राथमिकता है.
- कनेक्टिविटी: बिना बेहतर रास्तों के व्यापार मुमकिन नहीं है. भारत चाबहार पोर्ट और ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर’ के जरिए सेंट्रल एशिया तक पहुंचना चाहता है. पीएम मोदी यहां चीन की ‘बेल्ट एंड रोड’ (BRI) नीति के कर्ज-जाल को चुनौती देते हुए साफ कहेंगे कि कनेक्टिविटी ऐसी हो जो संप्रभुता का सम्मान करे, न कि देशों को गुलाम बनाए.
- अवसर: स्टार्टअप्स, पारंपरिक चिकित्सा और युवाओं के लिए नए अवसर पैदा करना. भारत अपनी इनोवेटिव क्षमता के बल पर मध्य एशियाई युवाओं को जोड़ने का खाका रखेगा.
‘वर्ल्ड नोमैड गेम्स’: सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी
बिश्केक में पीएम मोदी का छठे ‘वर्ल्ड नोमैड गेम्स’ के उद्घाटन समारोह में शामिल होना कूटनीति का एक बहुत ही खूबसूरत पहलू है. मध्य एशिया की पुरानी खानाबदोश संस्कृति, पारंपरिक खेलों और घुड़सवारी कला को समर्पित ये इवेंट इस इलाके का सांस्कृतिक दिल है.
चीन जहां पैसे और कर्ज के दम पर धौंस जमाता है, वहीं भारत उनकी संस्कृति, पहचान और परंपराओं को सम्मान देकर अपनापन जताता है. यही सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी भारत को मध्य एशिया में एक भरोसेमंद पार्टनर बनाती है.
सेंट्रल एशिया में भारत का ‘मास्टरस्ट्रोक’
मध्य एशिया में भारत की मौजूदगी चीन के ‘कर्ज-जाल’ और पाकिस्तान के ‘रास्ते की नाकेबंदी’ का सबसे सटीक जवाब है.
- चीन और पाकिस्तान के गठजोड़ को मात: चीन अपने बीआरआई (BRI) प्रोजेक्ट्स के जरिए मध्य एशियाई देशों पर आर्थिक कब्जा जमाना चाहता है, जबकि पाकिस्तान भारत के जमीनी रास्तों को रोककर बैठा है. ऐसे में भारत चाबहार बंदरगाह और उज्बेकिस्तान-किर्गिज़स्तान के रास्ते से मध्य एशिया में अपनी सीधी एंट्री सुनिश्चित कर रहा है.
- एक सुरक्षित और पारदर्शी विकल्प: मध्य एशियाई देश अब अच्छी तरह समझ चुके हैं कि चीन की मदद मुफ्त में नहीं आती. वे एक ऐसे साझेदार की तलाश में हैं जो लोकतांत्रिक हो, पारदर्शी हो और उनकी संप्रभुता का सम्मान करे. भारत इस खांचे में पूरी तरह फिट बैठता है.
कूटनीतिक बैलेंस और ‘ग्रोथ’ का नया दौर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये दौरा भारत की बहुआयामी विदेश नीति के एडवांस लेवल को दिखाता है. भारत ने ये साबित कर दिया है कि वो पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करते हुए भी अपने पुराने, ऐतिहासिक पड़ोसियों को नहीं भूलता.
‘विकसित भारत@2047’ के हमारे सपने को पूरा करने के लिए हमें कच्चा माल, यूरेनियम, नए निर्यात बाजार और सुरक्षित व्यापारिक कॉरिडोर चाहिए. मध्य एशिया इस पूरी पहेली की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है. 29 अगस्त से शुरू हो रही ये चार दिवसीय यात्रा न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से एक नया मील का पत्थर साबित होगी, बल्कि वैश्विक पटल पर भारत की धाक को और मजबूत करेगी.