कोलकाता. कभी-कभी जिंदगी और मौत के बीच का फासला सिर्फ कुछ सौ मीटर का होता है. नेपाल में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड के बीच पश्चिम बंगाल के बशीरहाट का एक बुजुर्ग दंपति ऐसी ही खौफनाक स्थिति से गुजरकर लौटा है. मानसरोवर यात्रा पर निकले अनुकूल पोद्दार और उनकी पत्नी रेवा उस वक्त तबाही से महज करीब 300 मीटर दूर थे, जब उनकी गाड़ी ने अचानक रास्ता बदल लिया. जिस रास्ते पर उनका काफिला आगे बढ़ने वाला था, वही कुछ देर बाद बाढ़ और मलबे की चपेट में आ गया.
अनुकूल पोद्दार रिटायर्ड स्कूल शिक्षक हैं. वह अपनी पत्नी के साथ 37 सदस्यीय तीर्थयात्री समूह का हिस्सा थे, जो 21 अगस्त को पश्चिम बंगाल से मानसरोवर यात्रा के लिए रवाना हुआ था. इस समूह में तेलंगाना के 20 और पश्चिम बंगाल के 17 यात्री शामिल थे. यात्रा के दौरान 26 अगस्त को समूह काठमांडू से चीन सीमा के पास स्थित इमिग्रेशन सेंटर की ओर रवाना हुआ. यात्रियों को आगे बढ़ना था, लेकिन उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि कुछ ही दूरी पर प्रकृति का कहर उनका इंतजार कर रहा है.
उत्तरी-मध्य नेपाल के रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिलों में अचानक फ्लैश फ्लड ने तबाही मचा दी. ये इलाके बागमती प्रांत में चीन की सीमा के करीब स्थित हैं. जिस वक्त बाढ़ ने रास्तों को अपनी चपेट में लेना शुरू किया, उस समय यह पर्यटक समूह भी उसी दिशा में बढ़ रहा था. लेकिन किस्मत ने जैसे समय रहते उन्हें रोक दिया. उनकी गाड़ी प्रभावित इलाके से करीब 300 मीटर पहले ही वापस लौट गई. अगर वाहन थोड़ा और आगे बढ़ जाता, तो यह सफर जिंदगी का आखिरी सफर भी बन सकता था.
ग्रुप की गाड़ी के ड्राइवर को आगे जा रहे दूसरे ड्राइवरों से आपदा के बारे में पता चला और उसने तुरंत वापस मुड़ने का फैसला किया. पोद्दार परिवार ने कहा कि ड्राइवर के तुरंत फैसला लेने और रास्ते में कागजो की जांच में हुई देरी की वजह से उनकी जान बच गई. अनुकुल ने फोन पर ‘द टेलीग्राफ ऑनलाइन’ को बताया, “जब हमें आपदा के बारे में पता चला, तो तबाही वाली जगह बस 300 मीटर दूर थी.” बसीरहाट के कछारीपारा में रहने वाले अनुकुल ने आगे कहा, “अगर हम थोड़ा और आगे होते, तो हमारे घर लौटने का कोई चांस नहीं था.”
उन्होंने कहा, “मौसम बहुत अच्छा था और आसमान साफ था. हमें अंदाजा भी नहीं था कि इतने अच्छे मौसम में ऐसा खतरा आ सकता है. लेकिन ड्राइवर और टूर ऑपरेटर के परेशान चेहरे देखकर मुझे शक हुआ. उन्होंने हमें बताया कि आगे अचानक कोई प्राकृतिक आपदा आ गई है. फिर हम तुरंत काठमांडू वापस आ गए.” जब गाड़ी पहाड़ी रास्ते से वापस लौटी, तो टूरिस्टों ने नदियों और सड़कों के किनारे आपदा की तबाही देखी. वे दोपहर तक काठमांडू पहुंचे और तुरंत घर पर अपने परिवार वालों से संपर्क किया.
अनुकुल ने कहा, “काठमांडू में कोई परेशानी नहीं थी. लेकिन तबाही देखकर और उस ख़तरे का एहसास करके जिससे हम बाल-बाल बचे थे – भगवान की कृपा और ड्राइवर के सही समय पर लिए गए फैसले की वजह से – हम सब सदमे में थे.” जब पता चला कि टूरिस्ट नेपाल में फंसे हुए हैं, तो मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने अनुकुल के जीजा प्रसून रॉय से बात की और पूछा कि क्या बुज़ुर्ग जोड़े को घर लौटने के लिए किसी मदद की जरूरत है.
बाद में अनुकुल ने अपने पड़ोसी और दोस्त दिलीप दत्ता को फ़ोन पर बताया कि ड्राइवर की सतर्कता के अलावा, यात्रा के दौरान कागज़ों की जांच में हुई देरी भी उनके लिए वरदान साबित हुई. दत्ता ने कहा, “रास्ते में कागजो की जांच की वजह से देरी हुई, जिससे वे लगभग 15 मिनट तक रुके रहे, और वही चीज उनकी जान बचाने वाली साबित हुई. अगर वे इमिग्रेशन सेंटर की तरफ थोड़ा और आगे होते, तो वे गंभीर खतरे में पड़ जाते.”
बंगाल के 17 टूरिस्टों ने शुक्रवार को अपनी वापसी की यात्रा शुरू की. पाँच लोग हवाई जहाज़ से कलकत्ता लौट आए, जबकि बाकी 12 लोग – जिनमें पोद्दार परिवार भी शामिल था – बीरगंज गए, जो काठमांडू से दक्षिण में लगभग 135 किमी दूर और बिहार से सटे भारतीय बॉर्डर के पास है. वहां रात बिताने के बाद, वे शनिवार सुबह भारत में दाखिल हुए और बिहार के रक्सौल जंक्शन पहुंचे. शनिवार सुबह करीब 10 बजे, वे हावड़ा जाने वाली 13022 मिथिला एक्सप्रेस में सवार हुए और रविवार को उनके घर पहुंचने की उम्मीद थी. रेबा ने कहा, “ऐसा लग रहा है जैसे नई जिंदगी मिल गई हो. हमें राहत महसूस हो रही है, लेकिन साथ ही, उन लोगों के लिए बहुत दुख भी है जिन्होंने अपनी जान और सब कुछ खो दिया.”