नई दिल्ली. 20 जुलाई का वो संसद चलो मार्च. सड़कों पर हजारों की भीड़, चारों तरफ भारी पुलिस फोर्स, फुल ऑन कसौटी वाला माहौल और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत दीपके का एनर्जी लेवल बिल्कुल 0%. भूख हड़ताल के तीसरे दिन शरीर ने जवाब दे दिया था. दीपके सुबह ही फेंट (बेहोश) हो चुके थे और पैदल चलने की हिम्मत न होने की वजह से सीधे ट्रक पर सवार थे. लेकिन कहानी में असली मोड़ तब आया जब दीपके को अपने दो सबसे भरोसेमंद साथी आशुतोष रंका और सौरव दास की सबसे सख्त जरूरत थी और वो दोनों सीन से गायब थे. दीपके फोन मिलाते रहे लेकिन दोनों के नंबर आउट ऑफ रीच. BBC को दिए एक स्पाइसी इंटरव्यू में दीपके ने उस दिन के पूरे ड्रामे, अपनी उस ‘Pissed Off’ (तंग आने) वाली फीलिंग और बीजेपी नेताओं की 5 घंटे वाली उस सस्पेंस मीटिंग पर से पर्दा उठाया.
5 घंटे का इंतजार और 10 मिनट की मुलाकात
अभिजीत दीपके ने बीबीसी को दिए बइंटरव्यू में उस दिन की पूरी घटना का ब्योरा देते हुए बताया, “सौरव और आशुतोष बैठक के लिए गए थे. बीजेपी प्रतिनिधिमंडल ने उन्हें बुलाया और 5 घंटे तक बिठाए रखा जबकि बैठक सिर्फ 10 मिनट चली.” दीपके का कहना है कि जब एक तरफ जंतर-मंतर पर भीड़ उग्र और बेकाबू हो रही थी, तब उनके दो सबसे अहम रणनीतिकार उनसे दूर थे. उन्होंने दोनों को बार-बार फोन करने की कोशिश की लेकिन उनके फोन आउट ऑफ रीच आ रहे थे, जिससे तनाव और बढ़ गया.
“भूख हड़ताल का अनुभव नहीं था”
दीपके ने अपनी शारीरिक स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि 20 जुलाई को उनकी भूख हड़ताल का तीसरा दिन था. उन्होंने स्वीकार किया, “मुझे अनुभव नहीं था कि भूख हड़ताल के दौरान क्या करना चाहिए और क्या नहीं. पहले दो दिन मैं लगातार भीड़ को संबोधित करता रहा और उनसे बातचीत करता रहा, जिससे तीसरे दिन मेरी बची-कुची ताकत भी खत्म हो गई. मार्च वाले दिन सुबह मैं बेहोश हो गया था, जिसके चलते मुझे पैदल चलने के बजाय ट्रक पर सवार होना पड़ा.”
दीपके ने आगे कहा कि अगर आशुतोष और सौरव उस वक्त जंतर-मंतर पर मौजूद रहते तो भीड़ को संभालना और संसद मार्च की सही तरीके से अगुवाई करना काफी आसान हो जाता. उन्होंने कहा कि अगर उन्हें इस स्थिति का पहले अंदाजा होता तो वे दोनों प्रवक्ताओं को उस बैठक में जाने से साफ मना कर देते.
NEET UG विवाद और 37 दिनों का आंदोलन
CJP का यह संसद चलो मार्च NEET UG परीक्षा में हुई धांधलियों के विरोध में शुरू किए गए 37 दिवसीय लंबे आंदोलन का एक प्रमुख हिस्सा था. 20 जुलाई को संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्ग, रायसीना रोड, जनपथ, कनॉट प्लेस और इंडिया गेट तक फैल गए थे. इस दौरान प्रदर्शनकारियों और दिल्ली पुलिस के बीच जगह-जगह तीखी झड़पें हुई थीं. इस चौतरफा दबाव के बाद 25 जुलाई को तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद CJP ने अपना आंदोलन वापस लिया था.
सवाल-जवाब
अभिजीत दीपके 20 जुलाई को अपने प्रवक्ताओं आशुतोष और सौरव पर क्यों नाराज हुए थे?
‘संसद चलो’ मार्च के दौरान भूख हड़ताल के तीसरे दिन दीपके बेहद कमजोर थे और भीड़ बेकाबू हो रही थी, जबकि दोनों प्रवक्ता बीजेपी नेताओं की बैठक में 5 घंटे फंसे रहे और उनके फोन भी अनरीचेबल थे.
CJP का 37 दिनों का आंदोलन किस मुद्दे को लेकर खत्म हुआ था?
NEET UG परीक्षा में गड़बड़ियों के विरोध में चल रहे इस आंदोलन के बाद 25 जुलाई को तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद यह आंदोलन समाप्त हुआ.