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Palamu Tiger Reserve Featured In KBC: लोकप्रिय शो कौन बनेगा करोड़पति में पलामू टाइगर रिजर्व से जुड़ा सवाल पूछे जाने पर झारखंड की यह प्राकृतिक धरोहर राष्ट्रीय मंच पर चर्चा में आ गई है. इस कारण से इसके समृद्ध वन्यजीव इतिहास और पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.
पलामू. टेलीविजन के लोकप्रिय क्विज शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (KBC) में पलामू टाइगर रिजर्व से जुड़ा सवाल पूछे जाने के बाद झारखंड की प्राकृतिक धरोहर एक बार फिर राष्ट्रीय मंच पर चर्चा में आ गई है. शो के होस्ट अमिताभ बच्चन ने प्रतियोगी से पूछा कि प्रोजेक्ट टाइगर के तहत स्थापित शुरुआती नौ टाइगर रिजर्व में शामिल पलामू टाइगर रिजर्व किस राज्य में स्थित है. इस सवाल ने देशभर के दर्शकों को पलामू के समृद्ध वन्यजीव इतिहास और बाघ संरक्षण में इसके ऐतिहासिक योगदान से परिचित कराने का अवसर दिया है.
राष्ट्रीय मंच पर पलामू टाइगर रिजर्व की पहचान
डिप्टी डायरेक्टर प्रजेश कांत जैना ने लोकल18 को बताया कि पलामू टाइगर रिजर्व झारखंड का इकलौता टाइगर रिजर्व है. वर्ष 1973 में देश में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के दौरान चुने गए शुरुआती नौ टाइगर रिजर्व में इसे भी शामिल किया गया था. यह उपलब्धि पलामू के जंगलों के ऐतिहासिक और पारिस्थितिक महत्व को दर्शाती है. केबीसी जैसे लोकप्रिय कार्यक्रम में इसका उल्लेख होने से उम्मीद है कि देश के दूसरे हिस्सों के लोग भी इस क्षेत्र की जैव विविधता, वन्यजीवों और पर्यटन की संभावनाओं के बारे में जानने के लिए प्रेरित होंगे.
केबीसी में सवाल पूछे जाना बेहद गर्व की बात
प्रजेश कांत जैना ने आगे कहा कि कौन बनेगा करोड़पति जैसे राष्ट्रीय स्तर के लोकप्रिय कार्यक्रम में पलामू टाइगर रिजर्व के बारे में सवाल पूछा जाना बेहद खुशी की बात है. इससे आम लोगों के बीच इस अभयारण्य के बारे में जानकारी बढ़ेगी और लोग इसके इतिहास को जानने के लिए उत्साहित होंगे. उन्होंने बताया कि वर्ष 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर के तहत शामिल होने से पहले भी पलामू का वन्यजीव इतिहास काफी समृद्ध रहा है. पुराने अभिलेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण उल्लेख मिलता है. राष्ट्रीय मंच पर इसकी चर्चा होने से बाघ संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ेगी और रिजर्व के पुनरुद्धार के प्रयासों को भी प्रोत्साहन मिल सकता है.
1932 में पलामू से शुरू हुई बाघों की गणना की ऐतिहासिक पहल
पलामू टाइगर रिजर्व का इतिहास केवल प्रोजेक्ट टाइगर तक सीमित नहीं है. डिप्टी डायरेक्टर ने बताया कि वर्ष 1932 में जे. डब्ल्यू. निकोलसन ने पलामू क्षेत्र में बाघों के पगमार्क के आधार पर उनकी गणना की प्रक्रिया शुरू की थी. इसे बाघों की गणना के इतिहास में एक महत्वपूर्ण शुरुआती पहल के रूप में देखा जाता है. बाद में वन्यजीवों की निगरानी और संरक्षण के लिए इसी तरह की पद्धतियों का इस्तेमाल किया गया. इस तरह पलामू का जंगल बाघों के संरक्षण और उनके अध्ययन के इतिहास में खास स्थान रखता है.
अंग्रेजी शासन के दौर में बाघों को माना जाता था खतरनाक जानवर
बता दें कि पलामू के जंगलों का इतिहास अंग्रेजी शासन के समय से जुड़ा है. वर्ष 1898 में डी. एच. आइ. सैंडर्स द्वारा तैयार किए गए सर्वे ऑफ सेटलमेंट रिकॉर्ड में इस क्षेत्र से संबंधित जानकारियां दर्ज थीं. उस दौर में बाघों को खतरनाक जानवरों की श्रेणी में रखा जाता था. बाघों को मारने पर इनाम देने जैसी व्यवस्थाएं भी प्रचलित थीं. उस समय वन्यजीव संरक्षण के बजाय कई क्षेत्रों में शिकार को बढ़ावा मिलता था. इसका असर जंगलों में बाघों की संख्या पर भी पड़ा.
जमींदारी उन्मूलन के बाद शिकार से वन्यजीवों को नुकसान
वाइल्ड लाइफ के जानकार डॉ. डी. एस. श्रीवास्तव ने बताया कि वर्ष 1951 में जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के बाद जंगलों और वन्यजीवों के संरक्षण से जुड़ी चुनौतियां बढ़ीं. वर्ष 1951 से 1965 के बीच बड़े पैमाने पर बाघों और दूसरे जंगली जानवरों का शिकार हुआ. उस दौर में वन्यजीवों की घटती संख्या पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया. नतीजतन देश के कई हिस्सों में बाघों की संख्या तेजी से कम होती चली गई. बाघों के अस्तित्व पर मंडराते खतरे को देखते हुए देश में संगठित संरक्षण की जरूरत महसूस हुई और वर्ष 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की गई.
1974 में पलामू में मौजूद थे 22 बाघ
प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के बाद बाघों के संरक्षण और उनकी संख्या का आकलन करने के लिए प्रयास तेज हुए. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 1974 में पलामू क्षेत्र में 22 बाघ मौजूद थे. शुरुआती नौ टाइगर रिजर्व में शामिल होने के बावजूद समय के साथ यहां बाघों की संख्या में गिरावट आती गई. वर्तमान में पलामू टाइगर रिजर्व में बाघों की मौजूदगी सीमित बताई जाती है. ऐसे में बाघों की संख्या बढ़ाना वन विभाग के सामने बड़ी चुनौती है.
पर्यटन और नई पीढ़ी के लिए भी महत्वपूर्ण है यह पहचान
कौन बनेगा करोड़पति में पलामू टाइगर रिजर्व से जुड़ा सवाल पूछे जाने से इसकी ऐतिहासिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा मिली है. यह क्षेत्र वन्यजीवों, घने जंगलों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है. जागरूकता बढ़ने से यहां इको-टूरिज्म की संभावनाओं को भी बल मिल सकता है. साथ ही, नई पीढ़ी को यह जानने का अवसर मिलेगा कि झारखंड की यह धरोहर देश में बाघ संरक्षण के शुरुआती इतिहास से गहराई से जुड़ी हुई है. अब जरूरत इस ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए पलामू के जंगलों में बाघों के भविष्य को मजबूत बनाने की है.
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Raina Shukla is an experienced journalist and content professional with nearly two decades of experience in print and digital media. She holds a Master’s degree in Mass Communication and Journalism from Bundelk…