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But the faith is unwavering… Moonrise at 7:54 pm


रांची6 घंटे पहले

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आज करवा चौथ का त्योहार है। पारंपरिक रूप से इस व्रत की पूर्णता रात्रि में चंद्रमा के दर्शन और विधिवत पूजन के उपरांत ही मानी जाती है। पर मौसम के बदले मिजाज और ‘अर्नब’ तूफान की वजह से गुरुवार को आसमान में बादल छाए रह सकते हैं और संभव है कि चांद दिखाई न दे।

ऐसे में चंद्रोदय के समय चांद की दिशा की तरफ मुंह करके पूजा, प्रार्थना और अर्घ्य देकर व्रत का पारण कर सकते हैं। शास्त्र सम्मत व्यवस्था के अनुसार, यदि बादलों की वजह से चांद नजर न आए, तो व्रतियों को परेशान होने की जरूरत नहीं है। ऐसे में चंद्रोदय के समय चांद की दिशा की तरफ मुंह करके पूजा, प्रार्थना और अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जा सकता है। पंचांग की गणना के अनुसार, गुरुवार को शाम 7:54 बजे चंद्रोदय होगा। इसके बाद रात्रि 10:00 बजे तक चंद्रदेव को अर्घ्य देकर करवा चौथ का व्रत संपन्न किया जा सकेगा।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से आज का दिन विशेष संयोगों से युक्त है। आज चंद्रमा वृषभ व मिथुन राशि में गोचर करेंगे। नक्षत्रों की बात करें तो दोपहर 3:32 बजे तक रोहिणी नक्षत्र रहेगा, जिसके उपरांत मृगशिरा नक्षत्र का प्रवेश होगा। इसके साथ ही आज पूरे दिन परिघ योग बना रहेगा।

  • एक व्रत, आस्था के रंग अनेक… समाज बदले पर हर सुहागिन के भाव एक

वीरा कुड़िए करवड़ा, लै सर्व सुहागिन करवड़ा… गीत गाएंगी महिलाएं पंजाबी समाज की ज्योति चावला शाम ढलते ही लाल-गुलाबी सूट या पारंपरिक पटियाला पोशाक और चूड़ा पहन कर पूजा के लिए तैयार होती हैं। पंजाबी समाज की महिलाएं पूजा के दौरान गोल घेरे में बैठकर 7 बार एक-दूसरे को करवा थमाते हुए थाली बदलती हैं। इस फेरे के दौरान ‘वीरा कुड़िए करवड़ा, लै सर्व सुहागिन करवड़ा…’ जैसे पारंपरिक लोकगीत गाकर पति की बेहतरी की कामना की जाती है।

13 दानों का ‘हुंकारा’ और कांसे की थाली में ‘बायना’ निकाला जाता है मारवाड़ी समाज की सरिता बथवाल बताती हैं कि शाम को चौथ माता और भगवान श्रीगणेश की विधिवत पूजा की जाती है। हाथ में गेहूं या चावल के 13 दाने रखकर कथा सुनने का विधान है। इस दौरान हर प्रसंग पर ‘हुंकारा’ भरना होता है। थाली में कलश में गेहूं के ऊपर चीनी व रुपए रखकर ‘बायना’ निकाला जाता है। इसके बाद बहू सास से अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त करती है।

16 शृंगार, निर्जला साधना और छलनी से दर्शन के बाद बड़ों का आशीष जरूरी झारखंडी-बिहारी समाज की रूपम कुमारी बताती हैं कि वह दिनभर निर्जला उपवास रखती हैं। शाम को 16 शृंगार कर सजती-संवरती हैं और पूजा की थाली सजाकर करवा चौथ की कथा सुनती हैं। रात में चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं। इसके बाद छलनी से चांद और फिर पति का चेहरा देखकर व्रत का पारण किया जाता है। घर के बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है।



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