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Inspirational News: हाथों में कुदाल, फावड़ा और सब्बल लेकर निकले गांववालों का एक ही संकल्प है- आने वाली पीढ़ियों को सड़क के अभाव में होने वाली परेशानियों से मुक्ति दिलाकर रहेंगे. लोगों के हौसले और सामाजिक एकजुटता की यह कहानी झारखंड के हजारीबाग जिले के एक गांव की है. करीब 250 ग्रामीण जंगल के बीच पांच किलोमीटर लंबे जर्जर रास्ते को दुरुस्त करने में पूरे जोश के साथ जुटे हैं. पूरी खबर विस्तार से आगे पढ़िये.
हजारीबाग के हेसाकोचा में आदिवासियों ने कुदाल-फावड़ा से बना रहे 5 किमी सड़क.
हजारीबाग. जब सिस्टम ने नहीं सुना और विकास का इंतजार लंबा हुआ तो ग्रामीणों ने खुद ही विकास की राह बनाने का फैसला कर लिया. झारखंड के हजारीबाग जिले में टाटीझरिया प्रखंड की बेडम पंचायत के सुदूरवर्ती हेसाकोचा गांव में महिला, पुरुष और युवा मिलकर पिछले पांच दिनों से श्रमदान कर रहे हैं. आदिवासी बहुल हेसाकोचा गांव में करीब 250 ग्रामीण जंगल के बीच पांच किलोमीटर लंबे जर्जर रास्ते को दुरुस्त करने में जुटे हैं. गांव की महिलाएं, अधिकांश पुरुष और युवा मिलकर पिछले पांच दिनों से श्रमदान कर रहे हैं और जंगल के बीच पांच किलोमीटर लंबे जर्जर रास्ते को दुरुस्त करने की ठान चुके हैं. हाथों में कुदाल, फावड़ा और सब्बल लेकर निकले इन ग्रामीणों का एक ही संकल्प है- आने वाली पीढ़ियों को सड़क के अभाव में होने वाली परेशानियों से मुक्ति दिलाना.
महिला, पुरुष और युवा हाथों में कुदाल, फावड़ा, गैंता और सब्बल लेकर रास्ते को चलने लायक बना रहे हैं. कोई मिट्टी काट रहा है, कोई पत्थर हटा रहा है, तो कोई रास्ते को समतल कर रहा है. सुबह से शाम तक गांव के लोग जंगल के बीच श्रमदान में लगे हैं. सबसे खास बात यह है कि इसमें महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं. मुनिया मरांडी जैसी महिलाएं कहती हैं कि अब इंतजार नहीं करना, खुद ही रास्ता बनाना है.
हर बरसात के बाद टूट जाती है सड़क
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से गुहार लगाने के बावजूद सड़क नहीं बनी. कच्चा रास्ता बरसात के बाद हर साल जर्जर हो जाता है. उन्हें हर साल खुद श्रमदान करना पड़ता है. यह रास्ता बेडम पंचायत को मुख्य सड़क से जोड़ता है, लेकिन जंगल के बीच होने से इसकी मरम्मत नहीं हो पाती. इस बार गांव वालों ने तय किया कि अब खुद ही इसे दुरुस्त करेंगे.
खाट पर ले जाना पड़ता है मरीजों को
सड़क के अभाव में गर्भवती महिलाओं और बीमार मरीजों को खाट पर लादकर पांच किलोमीटर तक ले जाना पड़ता है. स्कूल जाने वाले बच्चों को भी कीचड़ भरे रास्ते से गुजरना पड़ता है. इसलिए गांव वालों ने इस श्रमदान को सिर्फ सड़क नहीं, बल्कि जिंदगी बचाने की पहल बताया है. ऐसे में गांववालों का यह जज्बा और लोगों की पहल पूरे झारखंड के लिए मिसाल बन रहा है.
सामूहिक एकजुटता बनी सबसे बड़ी ताकत
ग्रामीणों की यह पहल सरकारी व्यवस्था के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर रही है, लेकिन साथ ही यह भी दिखा रही है कि अगर गांव एकजुट हो जाए तो कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं. सामाजिक कार्यकर्ता राजू यादव कहते हैं कि हेसाकोचा के लोगों ने दिखा दिया कि विकास का इंतजार नहीं, शुरुआत खुद करनी पड़ती है. अब उनकी मांग है कि जल्द पक्की सड़क का निर्माण कराया जाए ताकि उनका यह श्रमदान स्थायी समाधान में बदले.
सकारात्मक पहल, बड़ा संदेश
बहरहाल, हेसाकोचा के ग्रामीणों ने अपने श्रम और एकजुटता से विकास की एक मिसाल पेश की है. पांच दिनों से जारी यह मुहिम केवल पांच किलोमीटर रास्ते को दुरुस्त करने की कोशिश नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य की उम्मीद भी है. अब जरूरत है कि ग्रामीणों की इस पहल को प्रशासनिक सहयोग मिले और गांव को जल्द पक्की सड़क की सौगात मिले, ताकि उन्हें हर साल इसी तरह श्रमदान करने और मरीजों को खाट पर ढोने की मजबूरी से मुक्ति मिल सके.