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कचरा समझकर जलाते थे पत्ते, अब वही बना कमाई का जरिया, पलामू...


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Palamu Leaf Compost: जिस पतझड़ को लोग सूखेपन और बेकार पत्तों का मौसम समझते थे. वहीं, अब ग्रामीण महिलाओं के लिए कमाई का सुनहरा मौका बन गया है. पेड़ों से गिरने वाले सूखे पत्ते, जिन्हें पहले लोग जला देते थे या कचरा समझकर फेंक देते थे. अब पलामू, गढ़वा और लातेहार के जंगल क्षेत्रों में रोजगार और हरियाली दोनों का आधार बन चुके हैं. इन पत्तों से महिलाएं हर्बल कंपोस्ट तैयार कर रही हैं, जिसकी मांग अब झारखंड से निकलकर नोएडा, हरियाणा समेत कई राज्यों तक पहुंच गई है.

दरअसल, पलामू टाइगर रिजर्व क्षेत्र में पायलट प्रोजेक्ट के तहत वर्ष 2025 में पत्तों से कंपोस्ट बनाने की शुरुआत की थी. ईको डेवलपमेंट समिति से जुड़ी महिलाओं और ग्रामीणों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया. शुरुआती दौर में विभाग ने तकनीकी और संसाधन सहायता दी, जिसके बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण इस योजना से जुड़ते चले गए. आज यह पहल जंगल क्षेत्र के करीब 50 गांवों तक पहुंच चुकी है.

हुनर से रोजगार योजना की नोडल नैनी मधु ने लोकल 18 को बताया कि पत्तों से कंपोस्ट तैयार करने की प्रक्रिया बेहद आसान और पूरी तरह प्राकृतिक है. सबसे पहले सूखे पत्तों को इकट्ठा कर छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है. फिर इन्हें गोबर मिले पानी के साथ मिलाकर ढेर के रूप में जमा किया जाता है. नियमित नमी और देखरेख के बाद यही पत्ते 55 से 60 दिनों में बेहतरीन जैविक खाद में बदल जाते हैं. यह खाद खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के साथ-साथ फसलों के लिए भी काफी लाभकारी मानी जा रही है.

उन्होंने कहा कि आंकड़े बताते हैं कि इस पहल ने रफ्तार पकड़ ली है. वर्ष 2025 में जहां 28 हजार किलो कंपोस्ट तैयार हुआ था, वहीं, 2026 में अब तक 1 लाख 75 हजार किलो से अधिक कंपोस्ट तैयार किया जा चुका है. स्थानीय बाजार में इसकी कीमत 15 रुपये प्रति किलो है. जबकि बाहर की कंपनियां इसे 25 रुपये प्रति किलो तक खरीदने की इच्छा जता रही हैं.

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वहीं, ग्रामीण महिला अमोला देवी बताती हैं कि पहले वो घर पर रहती थी. उन्हें इन सभी चीजों के बारे में जानकारी नहीं थी. वो भी लोगों की तरह इन पत्तों को बेकार समझकर जला देती थी, लेकिन अब इन्हें इकट्ठा कर बेच रहे हैं और इससे खाद भी बन रही है. यानी जो पत्ते कभी जंगल में आग का कारण बनते थे. अब वही आय का जरिया बन गए हैं.

उन्होंने कहा कि सबसे खास बात यह है कि समितियां ग्रामीणों से किलो के हिसाब से पत्ते खरीद रही हैं. इससे गांव के लोगों को सीधी आमदनी मिल रही है. साथ ही जंगलों में आग लगने की घटनाएं कम हो रही हैं. पर्यावरण सुरक्षित हो रहा है और वन्यजीवों की भी रक्षा हो रही है. उन्होंने कहा कि इसे बनाने की लंबी प्रक्रिया होती है. जिसमें बहुत लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. इसे बनाने में 3 महीना का समय लगता है. इससे अब पैसे तैयार हो रहे हैं. इससे महिलाओं को काफी फायदा भी हो रहा है.



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