19वीं सदी में बंगाल में टैगोर परिवार जाना माना बहुत संपन्न परिवार था. उनकी गिनती भारत के सबसे धनी परिवारों में होती थी. जाहिर सी बात है कि इस परिवार के सबसे चर्चित और प्रसिद्ध चेहरे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर थे. उनका बनाया शांति निकेतन आज भी खूब फलफूल रहा है. उनके नाम से देशभर में बहुत सी संस्थाएं हैं. किताबें छपती हैं लेकिन क्या आपको मालूम है कि टैगोर परिवार के लोग अब क्या कर रहे हैं.
रवींद्रनाथ टैगोर के वंशज आज दुनिया भर में फैले हुए हैं. उनमें से अधिकांश लोग सार्वजनिक सुर्खियों से दूर अपनी निजी और व्यावसायिक जिंदगी में सक्रिय हैं. वैसे ये बात सही है कि रवींद्रनाथ टैगोर की अपनी सीधी संतान रेखा अब नहीं रही. उनके बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर के वंशज अभी उनके विचारों और विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.
रवींद्रनाथ टैगोर के भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर के परपोते सुप्रियो टैगोर छह दशकों से अधिक समय से शांतिनिकेतन की विरासत के अगुआ और संरक्षक रहे. वह विश्व भारती विश्वविद्यालय के छात्र थे, जिसकी स्थापना टैगोर ने की थी. वह टैगोर की प्रसिद्ध आश्रम प्रणाली के विद्यालय, पाठा भवन स्कूल के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले प्रधानाचार्य भी रहे.
हाल के वरसों में परिवार के कुछ सदस्यों ने रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़ी ऐतिहासिक संपत्तियों के संरक्षण के लिए आवाज उठाई है. फरवरी 2025 में प्रदीप टैगोर ने रांची के ‘टैगोर हिल’ पर हो रहे अवैध कब्जे के खिलाफ स्थानीय अधिकारियों से मुलाकात की. ऐतिहासिक संपत्तियों को मुक्त कराने की मांग की.
वैसे परिवार के ज्यादातर लोग पारंपरिक रूप से चकाचौंध से दूर रहकर सादगीपूर्ण जीवन जीना पसंद करते हैं. हालांकि वे अक्सर अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं और कोलकाता, शांतिनिकेतन या अन्य स्थानों पर अपने पेशेवर जीवन में सक्रिय हैं.
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर अपनी बहू प्रतिमा और बेटे रथींद्रनाथ के साथ (फाइल फोटो)
टैगोर परिवार के घर को ठाकुरबाड़ी कहा जाता था. ठाकुरबाड़ी का नाम आते ही एक ऐसे परिवार का नाम उभरने लगता है जो ज्ञान, कला, साहित्य और समृद्धि के बीच जीता था. ईस्ट इंडिया के जमाने में उद्योगपति द्वारकानाथ टैगोर से शुरू हुई ये यात्रा महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर से होती हुई गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर तक पहुंची लेकिन ये सवाल अक्सर मन में आता है कि रवींद्रनाथ टैगोर के सीधे वंशज आज कहां हैं, क्या कर रहे हैं.
रवींद्रनाथ टैगोर की संतानें
रवींद्रनाथ टैगोर का विवाह मृणालिनी देवी से हुआ था. उनके पांच बच्चे थे.
1. माधुरीलता (बेला) – सबसे बड़ी बेटी
2. रथींद्रनाथ – सबसे बड़े बेटे
3. रेणुका – दूसरी बेटी
4. मीरा – सबसे छोटी बेटी.
5. शमींद्रनाथ – सबसे छोटा बेटा
नियति के क्रूर खेल से ये परिवार नहीं बच सका. बीमारी और अकाल मौतों का साया परिवार पर पड़ा रहा. टैगोर के जीवनकाल में ही उनके तीन बच्चों बेला, रेणुका और शमींद्रनाथ की मृत्यु युवाकाल या और कम उम्र में हो गई. शमींद्रनाथ की मृत्यु मात्र 11 वर्ष की आयु में हैजा से हुई, जिससे गुरुदेव पूरी तरह टूट गए थे. रवींद्रनाथ की वंशरेखा के भौतिक रूप से समाप्त होने के पीछे मुख्य रूप से दो कारण रहे – अकाल मृत्यु और संतानहीनता.
एक बेटा और एक बेटी ही बच सके
रवींद्रनाथ के एक बेटा और एक बेटी ही बाद जीवित बच पाए. बेटे रथींद्रनाथ टैगोर कृषि वैज्ञानिक थे. वह शांतिनिकेतन के पहले उपकुलपति बने. उन्होंने प्रतिमा देवी से विवाह किया, लेकिन उनकी अपनी कोई संतान नहीं हुई. उन्होंने नंदिनी नाम की एक कन्या को गोद लिया. रथींद्रनाथ बाद के वर्षों में पारिवारिक और प्रशासनिक विवादों के कारण शांतिनिकेतन छोड़कर देहरादून चले गए.
रवींद्रनाथ टैगोर अपने बेटे रथींद्रनाथ और बेटी माधुरीलता के साथ (फोटो X)
रथींद्रनाथ टैगोर का अंतिम समय देहरादून में ही बीता. उनका वहां जाना टैगोर परिवार के इतिहास का एक अत्यंत दुखद और विवादास्पद अध्याय माना जाता है. गुरुदेव की मृत्यु के बाद वह विश्वभारती विश्वविद्यालय के पहले ‘उपकुलपति’ बने. उनके शांतिनिकेतन छोड़ने और देहरादून बसने के पीछे की दो वजहें थीं.
1. प्रशासनिक विवाद
रथींद्रनाथ एक कुशल कृषि वैज्ञानिक और शिल्पी थे. 7 अगस्त 1941 में गुरुदेव की मृत्यु के बाद विश्वभारती को संभालना उनके लिए कांटों भरा ताज साबित हुआ. शांतिनिकेतन के पुराने आश्रमवासियों और कुछ दिग्गज विद्वानों के साथ उनके मतभेद गहरे हो गए. उन पर प्रशासनिक अनियमितताओं और विश्वविद्यालय के फंड के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए.
रथींद्रनाथ स्वभाव से बहुत संवेदनशील थे. उन पर लगे आरोपों की जांच के लिए समितियां बनाई गईं, जिससे उन्हें लगा कि जिस संस्था को उनके पिता ने खून-पसीने से सींचा, वहीं उनका अपमान हो रहा है. आखिरकार 1953 में उन्होंने भारी मन से उपकुलपति के पद से इस्तीफा दे दिया.
2. पारिवारिक विवाद और मीरा से नजदीकियां
रथींद्रनाथ का निजी जीवन भी काफी जटिलताओं से भरा रहा, जिसने उन्हें शांतिनिकेतन से दूर जाने पर मजबूर किया. उनकी पत्नी प्रतिमा देवी के साथ उनके संबंध अंतिम वर्षों में बहुत मधुर नहीं रह गए थे. प्रतिमा देवी शांतिनिकेतन में ही रहना चाहती थीं, जबकि रथींद्रनाथ वहां के माहौल से ऊब चुके थे.
रथींद्रनाथ के जीवन में मीरा चटर्जी का प्रवेश हुआ, जो उनके मित्र निर्मल चंद्र चटर्जी की पत्नी थीं. मीरा उनके अकेलेपन का सहारा बनीं. जब रथींद्रनाथ ने शांतिनिकेतन छोड़ा, तो मीरा चटर्जी और उनका परिवार भी उनके साथ देहरादून चला गया. इस रिश्ते को उस समय के बंगाली समाज और टैगोर परिवार के कई सदस्यों ने स्वीकार नहीं किया, जिससे विवाद और बढ़ गया.
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के बेटे रथींद्रनाथ पारिवारिक और विश्वभारती विवि के प्रशासनिक विवादों के बाद सबकुछ छोड़कर देहरादून आ गए. उनका अंतिम जीवन यहीं गुजरा (फाइल फोटो)
बेटा सबकुछ छोड़ देहरादून चला गया
1953 में शांतिनिकेतन त्यागने के बाद रथींद्रनाथ देहरादून के राजपुर’ इलाके में एक बंगले में रहने लगे, जिसका नाम उन्होंने ‘मयाली’रखा था. वहां उन्होंने अपना समय पेंटिंग करने, लिखने और बागवानी में बिताया. वह शांतिनिकेतन की राजनीति से दूर एक गुमनाम जीवन जीना चाहते थे. देहरादून में रहते हुए भी वे आर्थिक तंगी और मानसिक अवसाद से जूझते रहे.
गुमनामी में निधन
3 जून 1961 को देहरादून में ही उनका निधन हुआ. उनकी मृत्यु के समय उनके पास शांतिनिकेतन का कोई आधिकारिक प्रतिनिधि नहीं था, जो उस महान विरासत के उत्तराधिकारी के लिए एक विडंबना ही थी. रथींद्रनाथ का देहरादून प्रवास वास्तव में एक ऐसे पुत्र की ‘निर्वासन यात्रा’ थी, जो अपने पिता के विशाल व्यक्तित्व के साये और संस्थागत राजनीति के बोझ से थक चुका था.
गुरुदेव की बेटी का क्या हुआ
टैगोर की छोटी बेटी मीरा देवी का विवाह नगेंद्रनाथ गांगुली से हुआ था. उनका एक बेटा था – नितिनेंद्रनाथ. रवींद्रनाथ इस पोते से बहुत प्यार करते थे. उसे उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी भेजा गया. 1932 में जर्मनी में ही नितिन की असामयिक मृत्यु हो गई. इस घटना ने टैगोर परिवार की पुरुष वंशरेखा को करीब खत्म ही कर दिया.
गुरुदेव के नाम को आगे बढ़ाने वाला कोई सीधा ‘पोता’ जीवित नहीं बचा. रथींद्रनाथ की दत्तक पुत्री नंदिनी और मीरा देवी की पुत्री अदिता के माध्यम से परिवार आगे बढ़ा, लेकिन ‘टैगोर’ उपनाम वाली सीधी जैविक वंशरेखा वहीं ठहर गई.
वर्तमान में कहां हैं टैगोर परिवार के लोग?
हालांकि रवींद्रनाथ की सीधी वंशरेखा सीमित रही, लेकिन उनके भाइयों द्विर्मेंद्रनाथ, सत्येंद्रनाथ, ज्योतिरिंद्रनाथ का परिवार काफी बड़ा था. आज ‘टैगोर’ उपनाम वाले जो भी लोग हमें मिलते हैं, वे मुख्य रूप से रवींद्रनाथ के भाइयों के वंशज हैं.
शर्मिला टैगोर और सैफ किस ब्रांच से
भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर, गुरुदेव के भाई द्विर्मेंद्रनाथ टैगोर की वंशज हैं. उनके माध्यम से सैफ अली खान, सोहा अली खान आदि भी इसी ब्रांच से ताल्लुक रखते हैं.
प्रसिद्ध चित्रकार अवनिंद्रनाथ रवींद्रनाथ के भतीजे थे. उनके वंशज आज भी कला और संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय हैं, हालांकि वे सार्वजनिक चकाचौंध से दूर रहना पसंद करते हैं. टैगोर परिवार की एक और शाखा से जुड़े सुप्रिया ठाकुर लंबे समय तक शांतिनिकेतन के ‘पाठ भवन’ के प्रधानाचार्य रहे.
अक्सर यह कहा जाता है कि महान प्रतिभाओं की वंशरेखा प्रकृति जानबूझकर भौतिक रूप से सीमित रखती है ताकि उनकी विरासत किसी एक घर की जागीर न बनकर पूरी मानवता की धरोहर बन जाए. रवींद्रनाथ टैगोर ने खुद कहा था कि उनकी असली संतान उनके ‘गीत’ और ‘शांतिनिकेतन’ हैं. आज विश्वभारती विश्वविद्यालय और रबींद्र संगीत ही उनकी वास्तविक वंशावली है.
बंगाल के कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ठाकुरबाड़ी जोरासांको के ठाकुर परिवार में विलासिता और अत्यधिक बौद्धिकता के बीच एक ऐसा अकेलापन था, जिसने कई सदस्यों को मानसिक अवसाद और बीमारियों की ओर धकेला.
सोर्स
1. “On the Edges of Time” – ये किताब खुद रथींद्रनाथ द्वारा लिखी गई संस्मरणों की पुस्तक है. इसमें उन्होंने अपने पिता के साथ बिताए समय और शांतिनिकेतन के शुरुआती दिनों के बारे में बताया है.
2. “The Tagores and Their World” – चितरंजन बंदोपाध्याय की लिखी ये पुस्तक में टैगोर परिवार की वंशावली और उनके पारिवारिक अंतर्विरोधों के बारे में विस्तार से बताती है.
3. “Selected Letters of Rabindranath Tagore” – संपादक सुकांत चौधरी ने पत्रों के माध्यम से रवींद्रनाथ के अपने पुत्र रथींद्रनाथ के प्रति अपेक्षाओं और उनके बीच के संबंधों की गहराई से बताया है.
4. “Rabindranath Tagore: A Biography” – कृष्णा कृपलानी की ये किताब टैगोर के जीवन पर सबसे प्रामाणिक जीवनियों में एक मानी जाती है, जिसमें रथींद्रनाथ और प्रतिमा देवी के संबंधों के बारे में विस्तार से बताया गया है.
5. प्रसिद्ध लेखिका नमिता गोखले और अन्य इतिहासकारों ने रथींद्रनाथ के देहरादून के दिनों पर कई लेख लिखे हैं.
6.”Rathindranath Tagore: The Unsung Hero” – मीरा चटर्जी के साथ रथींद्रनाथ के संबंधों और देहरादून में उनके अंतिम वर्षों के “मयाली” बंगले के जीवन पर प्रकाश डालते हैं.