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कोडरमा की संगीता की इमोशनल स्टोरी:हादसे में जवान बेटा खोया, अब स्कूल...




मदर्स डे के मौके पर झुमरी तिलैया की संगीता शर्मा की कहानी हर आंख नम कर देती है। 10 मई 2003। वही दिन, जब उनकी दुनिया उजड़ गई। वह अपने 21 वर्षीय बेटे सानिध्य से मिलने दिल्ली जाने की तैयारी कर रही थीं। स्कूल में गर्मियों की छुट्टियां होने वाली थीं। मां ने बेटे के साथ समय बिताने के कई सपने देखे थे। लेकिन उसी रात एक खबर आई। दिल्ली में बाइक से घर लौटते समय सानिध्य की सड़क हादसे में मौत हो गई। यह खबर सुनते ही संगीता बिखर गईं। फिर भी खुद को संभाला। दिल्ली पहुंचीं। बेटे का अंतिम संस्कार किया। मां के जीवन में यह सबसे बड़ा दर्द था। मां ने दर्द को ताकत बनाया, बच्चों में खोजा अपना सानिध्य दिल्ली से कोडरमा लौटने के बाद संगीता ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने आंसुओं को अपनी ताकत बना लिया। एक बड़ा फैसला लिया। अपने विद्यालय के हजारों बच्चों को ही अपना बेटा मान लिया। हर बच्चे में उन्होंने अपने सानिध्य को देखना शुरू किया। अब उनका जीवन उन्हीं बच्चों के लिए है। वह रोज स्कूल जाती हैं। बच्चों से मां की तरह बात करती हैं। उनकी हर समस्या सुनती हैं। उन्हें संस्कार देती हैं। जीवन की सही राह दिखाती हैं। उनके लिए हर बच्चा अब सानिध्य है। आज भी बनाती हैं बेटे का पसंदीदा खाना संगीता शर्मा सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं हैं। वह बच्चों के जीवन के हर पहलू का ध्यान रखती हैं। उनके खानपान, पहनावे और व्यक्तित्व विकास पर विशेष फोकस करती हैं। छात्रावास में रहने वाले बच्चों के लिए वह आज भी अपने बेटे सानिध्य का पसंदीदा खाना खुद बनाकर लाती हैं। जब वह बच्चों को अपने हाथों से खाना खिलाती हैं, तो उनकी आंखें भर जाती हैं। उन्हें लगता है जैसे वह अपने बेटे को ही स्नेह दे रही हों। बच्चों के लिए वह सिर्फ शिक्षिका नहीं, बल्कि एक सच्ची मां हैं। समाजसेवा में भी निभा रहीं मां की भूमिका संगीता ने मां होने का दायरा सिर्फ अपने स्कूल तक सीमित नहीं रखा। रोटरी क्लब से जुड़कर उन्होंने कई बेसहारा लोगों की मदद की। खासकर उन बच्चों के लिए काम किया, जो जन्म से दिल में छेद जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में उन्होंने 15 से अधिक गरीब बच्चों के महंगे ऑपरेशन निःशुल्क कराए। इनका इलाज फोर्टिस अस्पताल और कोच्चि के अस्पतालों में कराया गया। अब मेदांता अस्पताल पटना के साथ मिलकर इस अभियान को आगे बढ़ा रही हैं। इसके अलावा दिव्यांगों को कृत्रिम अंग दिलाने और डायलिसिस सेंटर की स्थापना में भी अहम भूमिका निभाई है। संगीता कहती हैं : मैंने अपना बेटा खो दिया, लेकिन मुझे हर बच्चे में वही नजर आता है।



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