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तमिलनाडु की राजनीति भारत के सबसे अनोखे राजनीतिक इतिहासों में गिनी जाती है. इसकी शुरुआत गैर-ब्राह्मण आंदोलन और जस्टिस पार्टी से हुई, जिसने सामाजिक न्याय और आरक्षण की नींव रखी. बाद में पेरियार के द्रविड़ आंदोलन, डीएमके के उदय, हिंदी विरोधी आंदोलन और एआईएडीएमके के गठन ने राज्य की राजनीति को नई दिशा द. करुणानिधि और जयललिता के दशकों लंबे सत्ता संघर्ष ने तमिलनाडु को द्विध्रुवीय राजनीति का केंद्र बना दिया. अब थलापति विजय की टीवीके पार्टी नई राजनीतिक चुनौती बनकर उभरी है, जिससे राज्य की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करती दिख रही है.

क्या तमिलनाडु के नए सीएम थलापति विजय पुरानी द्रविडियन पॉलिटिक्स पर आगे बढ़ेंगे या फिर विकास की नई राजनीति को बढ़ावा देंगे?
Tamil Nadu, Anti-Brahmin Dravidian Politics & Thalapathy Vijay: आखिरकार एक लंबे सस्पेंस के बाद तमिलनाडु के 13वें मुख्यमंत्री के तौर पर अभिनेता से राजनेता बने थलापति विजय ने शपथ ले ली है. थलापति के शपथ ग्रहण के साथ तमिलनाडु की राजनीति में एक नए युग की शुरूआत की बात कही जा रही है. हालांकि, लोगों की जिज्ञासा अभी भी यह जानने को लेकर है कि थलापति का नया युग तमिलनाडु के साथ द्रविडियन पॉलिटिक्स को किस दिशा में लेकर जाएगा.
दरअसल यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है, क्यों कि बीते कई दशकों से तमिलनाडु में द्रविडियन पॉलिटिक्स का बोलबाला रहा है. 1916 में ब्राह्मणों के विरोध से जन्मी द्रविडियन पॉलिटिक्स की बदलौत डीएमके और एआईएडीएमके ने बीते 1967 के बाद लेकर अब तक तमिलनाडु पर राज किया है. 2026 के विधानसभा चुनाव में जनादेश काफी हद तक डीएमके और एआईएडीएमके के खिलाफ रहा. शायद इसी वजह से भी लोगों की निगाह थलापति की तरफ है कि वह फिर जातिगत राजनीति को बढ़ावा देंगे या फिर विकास को प्राथमिकता.
तमिलनाडु का हैरान करने वाला सियासी खेल!
- द्रविडियन राजनीति की नींव: तमिलनाडु की राजनीति की असली नींव 20वीं सदी की शुरुआत में रखी गई थी. उस समय भारत में ब्रिटिश शासन का शासन था. मद्रास प्रेसीडेंसी के अंतर्गत आने वाले प्रशासनिक और शैक्षणिक संस्थानों में ब्राह्मणों का दबदबा था. भले ही ब्राह्मण आबादी में अल्पसंख्यक थे, लेकिन वे उच्च पदों पर आसीन थे. इसी असंतोष की वजह से गैर-ब्राह्मण आंदोलन ने जन्म लिया.
- 1916 में हुआ जस्टिस पार्टी का गठन: तमिलनाडु की द्रविडियन पॉलिटिक्स की तरफ पहला और अहम कदम जस्टिस पार्टी का गठन था. डॉ टीएम नायर और पी त्यागराज चेट्टी जैसे दिग्गज नेताओं ने सबसे पहले ‘साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन’ (SILF) की स्थापना की, जिसे जनता के बीच ‘जस्टिस पार्टी’ के नाम से लोकप्रियता मिली. आगे चलकर यह पार्टी गैर-ब्राह्मण आंदोलन का प्रतीक बन गई.
- गैर-ब्राह्मण आंदोलन की शुरुआत: कहा जाता है कि डॉ टीएम नायर और पी त्यागराज चेट्टी ने जस्टिस पार्टी बनाकर एक तरह का सामाजिक विद्रोह कर दिया था. इस पार्टी ने मद्रास प्रेसीडेंसी में गैर-ब्राह्मणों के लिए नौकरियों, शिक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण की मांग की थी. यही वो बीज था जो बाद में सामाजिक न्याय के सिद्धांत के तौर पर विकसित हुआ.
- पेरियार ने आंदोलन को दी नई दिशा: उस समय के बड़े नेताओं में एक नेता ईवी रामास्वामी भी थे, जिन्हें सभी पेरियार के नाम से जानते हैं. उनकी गिनती इस आंदोलन के सबसे कट्टर आलोचकों में होती थी. उनका मानना था कि सामाजिक न्याय के आंदोलन को राजनीति से अलग रहना चाहिए. क्योंकि, राजनीति में भ्रष्टाचार मूल विचारधारा को दूषित कर देता है. उनकी यही विचारधारा ने बाद में आंदोलन को जाति-विरोधी दिशा दी.
- हिंदी का शुरू हुआ तमिलनाडु में विरोध: आजादी की लड़ाई के समय कांग्रेस हिंदी को देश की भाषा बनाना चाहती थी. लेकिन तमिलनाडु के लोगों ने इसका विरोध किया. उन्हें लगा कि उन पर उत्तर भारत की संस्कृति और भाषा जबरदस्ती थोपी जा रही है. हिंदी विरोधी आंदोलन से गैर-ब्राह्मण आंदोलन को लोगों का ज्यादा समर्थन मिला. इसके बाद यह आंदोलन सिर्फ जाति की बात तक सीमित नहीं रहा, बल्कि तमिल लोगों की पहचान और सम्मान की लड़ाई बन गया.
डीएमके के उदय से बंटवारे तक का सफर
- 1944 में बनी द्रविड़ कड़गम (डीके): जस्टिस पार्टी के पतन के बाद, द्रविड़ आंदोलन ने एक नया आकार लेना शुरू किया, जिसने तमिलनाडु की राजनीति को पूरी तरह से बदल कर रख दिया. पेरियार ने जस्टिस पार्टी का पुनर्गठन कर ‘द्रविड़ कड़गम’ का गठन किया. यह एक गैर-राजनीतिक संगठन था, जो समाज सुधार पर केंद्रित था. इसकी प्रमुख मांग एक अलग ‘द्रविड़नाडु’ की थी. वह द्रविड़ों के लिए अगल स्वतंत्र राष्ट्र चाहते थे. उन्हें लगता था कि भारत में द्रविड़ों की उपेक्षा होगी.
- 1949 में हुआ डीएमके का जन्म: सीएन अन्नादुराई (अन्ना) न ही पेरियार के द्रविड़नाडु की मांग का समर्थन करते थे और ना ही वह संसदीय राजनीति को नकारने के रवैये से सहमत नहीं थे. उनका मानना था कि बदलाव सिर्फ़ सड़क पर नहीं, बल्कि विधानसभा के अंदर बैठकर लाना होगा. इस मतभेद के कारण उन्होंने 1949 में ‘द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम’ (डीएमके) की स्थापना की. डीएमके ने अलग द्रविड़नाडु की मांग को छोड़कर ‘संघीय ढांचे में अधिकारों’ की मांग शुरू कर दी.
- 1967 की डीएमके को मिली बड़ी जीत: 1960 के दशक में कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर हिंदी को एकमात्र राजभाषा बनाने का प्रयास शुरू कर दिया. इससे पूरे राज्य में विरोध की भयंकर आग लग गई. इन हिंदी विरोधी दंगों की अगुवाई डीएमके ने अन्नादुराई कर रहे थे. उनकी मांग थी कि हिंदी थोपो नहीं, अंग्रेजी बनाए रखो. 1967 के चुनावों में इस हिंदी विरोधी आंदोलन का असर दिखा. डीएमके ने भारी जीत हासिल कर कांग्रेस का लगभग सफाया कर दिया.
- अन्नादुराई बने डीएमके के पहले सीएम: विधानसभा चुनाव में जबरदस्त जीत के बाद डीएमके ने सीएन अन्नादुराई डीएमके को अपने पहले मुख्यमंत्री के तौर पर कुर्सी पर बैठाया. दुर्भाग्यवश, 1969 में केवल दो साल बाद उनका निधन हो गया. उनके जाने के बाद, पार्टी की कमान एम करुणानिधि के हाथों में आ गई. लेकिन 1960 के दशक के अंत तक डीएमके के भीतर सत्ता, व्यक्तित्व और विचारधारा को लेकर मतभेद पनपने लगे थे. इसी का नतीजा था कि दो टुकड़ों में बंट गई.
- करुणानिधि के लिए एमजीआर बने चुनौती: तब के सुपर स्टार अभिनेता एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) की गिनती डीएमके के कद्दावर नेताओं में होने लगी थी. उनकी बढ़ती लोकप्रियता करुणानिधि को भी चुनौती देने लगी थी. करुणानिधि को लगता था कि एमजीआर एक फिल्म स्टार के तौर पर पार्टी को गलत दिशा में ले जा रहे हैं. वहीं, एमजीआर को लगा कि पार्टी में परिवारवाद और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है.
जब डीएमके और एआईएडीएमके में बंटी पार्टी
- 1972 में इस वजह से बनी एआईएडीएमके: 1972 तक बात एमजीआर के निष्कासन तक पहुंच गई. नतीजतन, एमजीआर ने डीएमके पार्टी छोड़कर नई पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया. उसी साल उन्होंने अपनी नई पार्टी ‘ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (एआईएडीएमके-AIADMK)’ का गठन कर दिया. पार्टी के नाम में ‘अन्ना’ को जोड़कर उन्होंने खुद को डीएमके से ज्यादा सीएन अन्नादुराई का सच्चा वारिस बताने की कोशिश की.
- सीएम बनने वाले भारत के पहले नेता बने एमजीआर: 1977 के विधानसभा चुनाव में तमिलनाडु की जनता ने बड़ा बदलाव देखने को मिला. इस चुनाव में एमजीआर ने करुणानिधि को बुरी तरह हराकर मुख्यमंत्री बनने का इतिहास रच दिया. वे भारत के पहले ऐसे फिल्म अभिनेता थे, जो सूबे के मुख्यमंत्री बने थे. उन्होंने 1977 के साथ-साथ 1980 और 1984 में भी उन्होंने करुणानिधि की डीएमके को शिकस्त दी और लगातार तीन बार मुख्यमंत्री का पद संभाला.
- एमजीआर के बाद जयललिता के हाथ आई कमान: जब 1987 में एमजीआर के निधन के बाद ऐसा लगा कि एआईएडीएमके का अस्तित्व खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है. लेकिन, इसी बीच उनकी को-एक्ट्रेस रहीं जयललिता ने पार्टी की कमान संभाली. इसके बाद, डीएमके के करुणानिधि और जयललिता के बीच पैदा हुई कड़वाहट ने तमिलनाडु की राजनीति को अलग ही ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया. इसके बाद समीकरण कुछ ऐसे बने कि अगले पांच दशकों तक डीएमके और एआईएडीएमके के बीच लगातार सत्ता बारी-बारी से बदलती रही.
करुणानिधि-जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु की राजनीति में किस तरह का बदलावा आया?
21वीं सदी के दूसरे दशक में तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया. 2016 के चुनाव में जीतने के बाद साल 2016 के अंत में जयललिता का अचानक निधन हो गया. इसके ठीक एक साल बाद, 2017 में नवंबर महीने में करुणानिधि ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया. भले ही वे 2016 में चुनाव हार गए थे, लेकिन उनकी विरासत बरकरार थी. इन दोनों राजनेताओं के जाने के बाद राज्य की राजनीति में नेतृत्व का एक भयंकर संकट पैदा हो गया. एआईएडीएमके टुकड़ों में बंट गई और डीएमके को एमके स्टालिन के नेतृत्व में नई जान मिली, लेकिन जनता के मन में एक शून्य जरूर पैदा हो गया था.
क्या टीवीके और विजय थलापति पुरानी द्रविडियन पॉलिटिक्स फॉलो करेंगे या नई शुरूआत करेंगे?
इस शून्य को भरते हुए फिल्म अभिनेता थलापति विजय ने राजनीति में कदम रखा. तमिलनाडु में फिल्म सितारों का राजनीति में आना कोई नई बात नहीं थी, लेकिन विजय का तरीका थोड़ा अलग था. उन्होंने सालों तक फैन क्लबों के जरिये सोशल वर्क कर लोगों को खुद से जोड़ा था. थलापति विजय ने 2024 की शुरुआत में अपनी पार्टी ‘तमिलगा वेट्री कझगम (टीवीके)’ की घोषणा की. उन्होंने कहा कि राजनीति कोई सेकेंड हैंड व्यवसाय नहीं है. उनकी यह पार्टी पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से थोड़ी अलग दिख रही थी. वह कट्टर अलगाववादी न होकर एक प्रगतिशील, सामाजिक न्याय और विकास का एजेंडा लेकर चलने की बात कर रहे थे.
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Anoop Kumar Mishra is currently serving as Assistant Editor at News18 Hindi Digital, where he leads coverage of strategic domains including aviation, defence, paramilitary forces, international security affairs…और पढ़ें