नई दिल्ली.
सुप्रीम कोर्ट का कोर्ट रूम नंबर एक… बाहर भीषण गर्मी, लेकिन अंदर का माहौल उससे भी कहीं ज्यादा गर्म! नौ जजों की संविधान पीठ के सामने भारत के सबसे दिग्गज वकील आमने-सामने थे. मुद्दा सिर्फ एक मंदिर का नहीं था, मुद्दा था क्या धर्म की आड़ में किसी को उसके अधिकारों से वंचित किया जा सकता है? तनाव तब और बढ़ गया जब वकील ने एक सर्वे का पन्ना लहराते हुए कहा, “साहब, देश की आधी आबादी इस बदलाव के खिलाफ है!” मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत की कड़क आवाज गूंजी। उन्होंने कहा ये सर्वे खास एजेंडे के लिए ‘टेलर-मेड’ किया गया है.
अदालत में तर्क नहीं, बल्कि भविष्य के भारत की नींव रखी जा रही थी. एक तरफ सदियों पुरानी मर्यादा और संप्रदाय की दुहाई थी तो दूसरी तरफ वैकोम के उस संघर्ष की याद जिसने 101 साल पहले मंदिरों के बंद दरवाजे खोल दिए थे. वकील की एक ही बात पूरे कोर्ट रूम में गूंजती रही भगवान भेदभाव नहीं करते, ये इंसान की बनाई दीवारें है.
1. सर्वे पर CJI का कड़ा प्रहार
सुनवाई के दौरान जब सीनियर एडवोकेट शादान फरासत ने दलील दी कि “50% भारतीय इंटर-कास्ट मैरिज के खिलाफ हैं” तो बेंच ने तुरंत हस्तक्षेप किया. CJI ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “ये सर्वे कुछ नहीं हैं, इन्हें खास जरूरतों और एजेंडे को पूरा करने के लिए ‘टेलर-मेड’ (विशेष रूप से तैयार) किया जाता है.” कोर्ट का मानना था कि सामाजिक सुधार के मामलों में इस तरह के डेटा को आधार नहीं बनाया जा सकता क्योंकि ये अक्सर पक्षपाती होते हैं.
2. सामाजिक सुधार बनाम धार्मिक अधिकार
सीनियर एडवोकेट जयदीप गुप्ता और विजय हंसारिया ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 25(2)(b) राज्य को सामाजिक सुधार के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है.
· तर्क: यदि कोई सामाजिक कुप्रथा धार्मिक रिवाज का चोला ओढ़ ले तो सरकार उसे सुधारने के लिए हस्तक्षेप कर सकती है.
· निष्कर्ष: संविधान पीठ इस बात की जांच कर रही है कि क्या धार्मिक संप्रदाय के अधिकार इतने बड़े हैं कि वे समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) को भी दबा दें?
3. ‘भगवान भेदभाव नहीं करते, इंसान करता है’
सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने वैकोम सत्याग्रह का उदाहरण देते हुए कहा कि मंदिर में प्रवेश का अधिकार केवल आस्था का नहीं बल्कि मानवीय गरिमा का विषय है. उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि इतिहास गवाह है कि भगवान ने हमेशा अपने भक्तों को दर्शन दिए हैं, चाहे वे किसी भी जाति के हों. उन्होंने जोर दिया कि ईश्वर के दरबार में कोई भेदभाव नहीं है, यह इंसानी सोच है जिसने दीवारें खड़ी की हैं.
4. कोर्ट रूम में महिला प्रतिनिधित्व की गूंज
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक मुद्दा उठाया. उन्होंने याद दिलाया कि कैसे अदालतों की दीवारों पर महिलाओं की कमी खटकती है.
· उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में 9-जजों की बेंच पूरी तरह महिलाओं की होगी.
· जस्टिस नागरत्ना ने इस पर चुटकी लेते हुए कहा— “शायद कुछ वर्षों बाद लोग यहां आकर पूछेंगे कि पुरुष कहां हैं?”
प्रमुख प्वाइंट्स
· अनुच्छेद 25 और 26 का टकराव: क्या धार्मिक प्रबंधन की स्वतंत्रता (Art 26) व्यक्तिगत समानता के अधिकार (article 14) से ऊपर है?
· संप्रदाय और धर्म: एडवोकेट जयदीप गुप्ता ने स्पष्ट किया कि संविधान के उद्देश्य के लिए संप्रदाय और संप्रदाय एक ही हैं, लेकिन इन्हें पूरे धर्म का पर्यायवाची नहीं माना जा सकता.
· तर्कसंगत सिद्धांत: संजय हेगड़े ने तर्क दिया कि अंधविश्वास और कुरीतियों को धर्म का सुरक्षा कवच नहीं मिलना चाहिए.
· सामाजिक सुधार का प्रभाव: विजय हंसारिया ने कहा कि सामाजिक सुधार के लिए बना कानून धार्मिक अधिकारों पर प्रभावी होना चाहिए.
यह मामला केवल सबरीमाला या किसी एक मंदिर का नहीं है बल्कि यह तय करेगा कि आधुनिक भारत में संवैधानिक नैतिकता बड़ी है या धार्मिक परंपराएं। कोर्ट का रुख स्पष्ट है कि वह तैयार किए गए सामाजिक आंकड़ों के बजाय संवैधानिक मूल्यों को प्राथमिकता देगा.
सवाल-जवाब
क्या राज्य धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है?
हां, अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत राज्य को अधिकार है कि वह सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए धार्मिक संस्थानों में हस्तक्षेप कर सके, विशेषकर सार्वजनिक संस्थानों को सभी वर्गों के लिए खोलने के मामले में.
धार्मिक संप्रदाय (Religious Denomination) किसे माना जाता है?
कोर्ट के अनुसार जिसका एक विशिष्ट नाम हो, एक समान विचारधारा या मत हो और जो एक संगठित समूह के रूप में काम करे, उसे संप्रदाय माना जाता है (जैसे रामकृष्ण मिशन).
क्या 2018 का सबरीमाला फैसला बदल गया है?
नहीं, 2018 का फैसला अभी प्रभावी है लेकिन सुप्रीम कोर्ट की यह 9-जजों की बेंच उन व्यापक कानूनी सवालों पर विचार कर रही है जो उस फैसले की समीक्षा के दौरान उठे थे.