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छऊ मास्क से मोआ लड्डू तक…जीआई टैग प्रोडक्ट्स का महत्व बता रहे...


जमशेदपुर. भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब ‘वोकल फॉर लोकल’ और गांवों की पारंपरिक पहचान को दुनिया तक पहुंचाने की बात कही, तब से देशभर में जीआई टैग को लेकर एक नई जागरूकता देखने को मिली. प्रधानमंत्री ने अपने कई भाषणों में कहा है कि हर गांव और हर क्षेत्र की विशेष कला, परंपरा और उत्पाद को वैश्विक पहचान मिलनी चाहिए. इसी सोच को दिल से अपनाया है जमशेदपुर के रहने वाले विकास सेठ ने.

कॉरपोरेट कंपनी में कार्यरत विकास सेठ आज सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जीआई टैग से जुड़ी भारत की विरासत को खोजने और लोगों तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं. उन्हें जब पता चला कि देश में अब तक 697 से अधिक उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है, तब उन्होंने इसके बारे में गहराई से रिसर्च शुरू की.

लोग नहीं समझते असली कीमत
विकास बताते हैं कि आज भी कई गांव ऐसे हैं, जहां की पारंपरिक सामग्री को जीआई टैग मिल चुका है, लेकिन वहां रहने वाले लोगों को इसकी असली कीमत और पहचान का अंदाजा तक नहीं है. यही वजह है कि उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करना शुरू किया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक लाइन – ‘देश की मिट्टी, देश की खुशबू, कारीगरों की मेहनत और पसीने को तराशने की जरूरत है’ – विकास सेठ को बेहद प्रेरित करती है. इसी सोच के साथ वे अलग-अलग राज्यों में जाकर वहां की पारंपरिक कला और उत्पादों की जानकारी जुटा रहे हैं.

इन पर किया रिसर्च
अब तक उन्होंने पश्चिम बंगाल के पुरुलिया स्थित मुकुक्ष ग्राम के प्रसिद्ध छऊ मास्क, मेदिनीपुर की मधुरकाठी चटाई, जयनगर का मशहूर मोआ लड्डू, बरुईपुर का अमरूद, ओडिशा के रघुराजपुर का पत्ताचित्र, पीपली का एप्लिक वर्क, कोणार्क स्टोन क्राफ्ट, बांकुड़ा का टेराकोटा और डोकरा कला जैसी कई जीआई टैग प्राप्त सामग्रियों पर रिसर्च की है.

सिर्फ रिसर्च ही नहीं, विकास को इन उत्पादों को संग्रहित करने का भी शौक है. जहां भी जाते हैं, वहां की कोई न कोई जीआई टैग प्राप्त वस्तु अपने घर जरूर लेकर आते हैं. उनके घर में आज देश के अलग-अलग हिस्सों की पारंपरिक कला और उत्पादों का अनोखा संग्रह देखने को मिलता है.

समय-समय पर करते हैं सेमिनार
विकास जमशेदपुर में समय-समय पर सेमिनार और जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित करते हैं. इन कार्यक्रमों में वे लोगों को बताते हैं कि जीआई टैग सिर्फ एक पहचान नहीं, बल्कि गांवों और कारीगरों की आर्थिक स्थिति बदलने का जरिया भी बन सकता है. सही जानकारी और सही बाजार मिलने पर गांव के कारीगरों की आमदनी कई गुना तक बढ़ सकती है.

आज विकास का यह प्रयास सिर्फ एक शौक नहीं, बल्कि भारत की मिट्टी, कला और कारीगरों को नई पहचान दिलाने का मिशन बन चुका है. वे मानते हैं कि अगर गांवों की असली कला दुनिया तक पहुंचे, तो देश के लाखों कारीगरों की जिंदगी बदल सकती है.



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