धनबाद21 घंटे पहलेलेखक: रवि मिश्रा
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पिछले 50 वर्षों में गंगा नदी की करीब 18 लाख जलधाराएं गायब, हम रोज औसतन 99 प्राकृतिक जलधाराएं खो रहे हैं पिछले 50 वर्षों में गंगा नदी की करीब 18 लाख जलधाराएं गायब हो गई हैं। हम रोज औसतन 99 प्राकृतिक जलधाराएं खो रहे हैं। यह सनसनीखेज खुलासा आईआईटी (IIT) धनबाद के एक शोध में हुआ है। यह अध्ययन संस्थान के पर्यावरण विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. अंशुमाली और उनकी टीम ने किया है।
उन्होंने झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की 7 छोटी नदियों तथा उनके 56 वाटरशेड्स (जलसंभरों) का अध्ययन किया, जो आगे जाकर गंगा नदी में मिलती हैं। टीम ने पाया कि आधी सदी (50 साल) में हर दिन करीब 55 किलोमीटर की औसत दर से कुल 10 लाख किलोमीटर की जलधाराएं गुम हो गईं। इस कारण जल-निकास घनत्व (Drainage Density) भी 2 किमी से घटकर 0.9 किमी रह गया है। अंधाधुंध भूमि उपयोग, कृषि विस्तार, बुनियादी ढांचे का विकास, कोयला व खनिज खनन और अनियंत्रित रेत खनन जैसे कारणों से नदियां लगातार सिकुड़ती गईं। (शेष पृष्ठ 9 पर)
ये छोटी नदियां गंगा की धाराओं को प्रबल बनाती हैं
| नदी | संगम |
| कतरी – दामोदर | हुगली (गंगा) |
| खुदिया – बराकर – दामोदर | हुगली (गंगा) |
| बांकी – नॉर्थ कोयल – सोन | गंगा |
| दानरो – … | गंगा |
| खुदार – केन – यमुना | गंगा |
| उर्मिल – केन – यमुना | गंगा |
| बोदला – बेतवा – यमुना | गंगा |
(नोट: कतरी व खुदिया नदी झारखंड के धनबाद; दानरो नदी गढ़वा; बोदला नदी गुमला व हजारीबाग होकर बहती हैं। वहीं, खुदार व उर्मिल नदियां मध्य प्रदेश के छतरपुर और बांकी नदी छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में बहती हैं।)
अंधाधुंध भूमि उपयोग और अनियंत्रित खनन बड़ी वजह
सुझाव: सरकारी योजनाओं में संशोधन से भी प्राकृतिक धाराओं का पुनरुद्धार संभव
पहले देश की जमीन का 9-10% हिस्सा रिवर बेसिन (नदी घाटियों) में आता था, जो अब घटकर केवल 0.5-3% रह गया है। ऐसे में कृषि, शहरी, औद्योगिक और संरक्षित क्षेत्रों में नदियों को उनके पुराने स्वरूप में लाने के लिए भूमि अधिग्रहण जरूरी हो गया है। ‘नमामि गंगे’ और ‘जल जीवन मिशन’ जैसी सरकारी योजनाओं में संशोधन कर यदि नदियों के लिए जमीन अधिग्रहण के प्रावधान को जोड़ दिया जाए, तो इससे प्राकृतिक धाराओं का पुनरुद्धार संभव है।
बचाव: नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को बचाने के लिए जमीन का अधिग्रहण हो
केंद्र सरकार के पास नदी बेसिनों के नुकसान का सटीक डेटा नहीं है। ऐसे में जरूरी है कि जलधाराओं की संख्या, लंबाई और जल-निकास घनत्व में आई कमी के आधार पर ‘नदी लाल सूची’ (River Red List) की श्रेणियों और मानदंडों को लागू किया जाए। नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को बचाने के लिए जमीन का अधिग्रहण किया जाना चाहिए। साथ ही, एक समर्पित ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ की स्थापना हो, जो वाटरशेड के संदर्भ-वर्ष (Reference Year) और वर्तमान वर्ष के आंकड़े तैयार करे तथा उनकी निरंतर निगरानी करे।
असर: भूजल की कमी के साथ बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदाएं बढ़ीं
प्रो. अंशुमाली बताते हैं कि उनकी टीम ने 7 प्रमुख वाटरशेड्स (छोटी नदियां) और 56 सब-वाटरशेड्स का अध्ययन किया है। इसमें सामने आया कि वाटरशेड के वृक्षाकार जालतंत्र (Dendritic Drainage Pattern) की बनावट में गिरावट आई है। इसी कारण गंगा नदी बेसिन के क्षेत्रों में बादल फटने, भूस्खलन, अचानक बाढ़ (Flash Floods), भूजल की कमी और मरुस्थलीकरण जैसी पर्यावरणीय आपदाएं तेजी से बढ़ रही हैं।
