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धान की खेती के लिए ड्रम सिडर मशीन वरदान साबित हो रही है. यह मशीन 70 से 80 प्रतिशत श्रम बचाती है। इससे बिना बिचड़ा तैयार किए सीधे धान की बुआई होती है. एक अकेला व्यक्ति एक दिन में तीन एकड़ खेत बो सकता है. कम पानी में कारगर यह तकनीक किसानों का समय और लागत बचाती है.
पलामूः झारखंड और बिहार में रोहिणी नक्षत्र शुरू होते ही किसान खरीफ खेती की तैयारी में जुट जाते हैं. खासकर धान की खेती को लेकर गांवों में हलचल बढ़ जाती है. लेकिन बदलते मौसम और कम बारिश की आशंका के बीच अब किसानों के लिए पारंपरिक खेती के बजाय आधुनिक तकनीक अपनाना ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है. ऐसे में ड्रम सिडर मशीन किसानों के लिए बेहतर विकल्प बनकर सामने आ रही है. यह मशीन धान की सीधी बुआई करने वाली आधुनिक तकनीक है, जिससे किसानों को कम लागत, कम समय और कम मजदूर में बेहतर उत्पादन मिल सकता है.
क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र चियांकी के कृषि विशेषज्ञ डॉ. प्रमोद कुमार ने बताया कि ड्रम सिडर मशीन से धान की खेती करने पर 70 से 80 प्रतिशत तक श्रम की बचत होती है. पारंपरिक तरीके में पहले धान का बिचड़ा तैयार किया जाता है, फिर मजदूरों के माध्यम से रोपाई कराई जाती है. इसमें अधिक पानी और मजदूरों की जरूरत पड़ती है. वहीं इस मशीन के जरिए बिना रोपाई किए सीधे खेत में धान की बुआई की जाती है. इस बार बारिश कम होने की संभावना जताई जा रही है, ऐसे में बिचड़ा तैयार करने में किसानों को पानी की समस्या का सामना करना पड़ सकता है. ड्रम सिडर तकनीक इस परेशानी से किसानों को राहत दे सकती है.
मशीन की खूबी
यह मशीन 7.5 किलो वजन की होती है. बाजार में चार ड्रम और छह ड्रम वाले मॉडल उपलब्ध हैं. चार ड्रम वाली मशीन से आठ लाइन और छह ड्रम वाली मशीन से 12 लाइन में धान की बुआई होती है. मशीन से करीब 20 सेंटीमीटर की दूरी पर बीज गिरता है, जिससे पौधों के विकास के लिए पर्याप्त जगह मिलती है. इसके लिए नर्सरी तैयार करने की आवश्यकता नहीं पड़ती. किसान खेत में कीचड़ तैयार कर जल निकासी और उर्वरक का प्रयोग करने के बाद सीधे अंकुरित धान बीज की बुआई कर सकते हैं.
आगे कहा कि इसमें प्रति हेक्टेयर 60 से 80 किलो बीज की जरूरत होती है. एक ड्रम में करीब 1.5 से 2 किलो अंकुरित बीज रखा जाता है. बुआई के एक-दो दिन बाद अंकुरण शुरू हो जाता है. सबसे बड़ी बात यह है कि एक व्यक्ति अकेले इस मशीन से एक दिन में करीब 3 एकड़ खेत में धान की बुआई कर सकता है, जबकि पारंपरिक रोपाई में 30 मजदूरों की जरूरत पड़ती है. उत्पादन भी लगभग समान मिलता है. बाजार में इसकी कीमत 6 से 7 हजार रुपये के बीच है. वहीं कृषि विभाग की आत्मा योजना के तहत किसानों को इस मशीन पर 50 प्रतिशत तक अनुदान भी दिया जा रहा है.
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मीडिया में 6 साल का अनुभव है. करियर की शुरुआत ETV Bharat (बिहार) से बतौर कंटेंट एडिटर की थी, जहां 3 साल तक काम किया. पिछले 3 सालों से Network 18 के साथ हूं. यहां बिहार और झारखंड से जुड़ी खबरें पब्लिश करता हूं.