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बोकारो का ‘मकर केंद’ बना लोगों की पहली पसंद, रसगुल्ले से भी...


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Bokaro Makar Kend: बोकारो जिला सिर्फ खनिज संपदा के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी वन उपज और पारंपरिक स्वादों के लिए भी जानी जाती है. इन्हीं प्राकृतिक सौगातों में एक है ‘मकर केंद’. जो इन दिनों खूब चर्चाओं में है. बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड और हजारीबाग के सीमावर्ती क्षेत्र के जंगलों और नदी किनारे उगने वाला यह फल इन दिनों सड़क किनारे और स्थानीय हाट-बाजारों की शान बना हुआ है. जिसे ग्राहक खूब खरीद रहे हैं.

दूर से देखने पर यह चिकनी सतह और हल्के पिला रंग के कारण बिल्कुल टमाटर जैसा दिखाई देता है. लेकिन स्वाद में बहुत ही मीठा होता है और अक्सर ग्रामीण कहते हैं कि इसकी मिठास के आगे रसगुल्ला भी फैल है. यही वजह है कि लोगों को मकर केद का सालभर इंतजार रहता है.

स्थानीय व्यापारी विष्णु गुंजू बताते हैं कि मकर केंद फल पूरी तरह प्राकृतिक होता है. इसकी मिठास ही इसकी सबसे बड़ी पहचान है. उन्होंने कहा कि इस फल को इकट्ठा करना आसान काम नहीं है. इसके लिए सुबह करीब पांच बजे ही घने जंगलों में जाना पड़ता है और कई बार जंगली हाथी और जानवरों का भी सामना करना पड़ता है. मौसम में अधिक बारिश या गर्मी हो तो फल खराब होने लगते हैं और बाजार में सही कीमत नहीं मिल पाती है.

आगे विष्णु गुंजू बताते हैं कि जंगल से फल चुनने के बाद उसे साफ पानी से धोकर सड़क किनारे और स्थानीय हाट में बेचा जाता है. आमतौर पर यह 40 से 50 रुपये प्रति किलो तक बिकता है और रोजाना करीब 20 से 25 किलो की बिक्री हो जाती है.

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इस काम से कई ग्रामीण महिलाएं और स्थानीय परिवार जुड़े हुए हैं, जिनकी पास खेती या रोजगार के सीमित साधन हैं और उनकी जीविका इसी पर निर्भर हैं. फल खरीद रहे ग्राहक महेंद्र प्रसाद कहते हैं कि मकर केंद झारखंड की प्राकृतिक पहचान है. इसके स्वाद में गांव की मिट्टी और जंगलों की खुशबू बसती है.

यही कारण है उन्हें पूरे साल इस फल का इंतजार रहता है. जैसे ही बाजार में यह दिखाई देता है, परिवार के साथ इसका स्वाद लेने पहुंच जाते हैं, क्योंकि आज कल बाजार में रासायनिक फलों कि भरमार है. ऐसे समय में मकर केंद जैसे प्राकृतिक फल लोगों को सीधे जंगल और प्रकृति से जोड़ते हैं.



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