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Supreme Court Latest News | Husband Wife News | Dowry Case –...


नई द‍िल्‍ली. एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर द‍िया है कि पत्‍नी से कुछ दिनों तक बात न करना अपने आप में ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता. खासकर तब जब इसके समर्थन में ठोस सबूत न हों. सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक जीवन में मतभेद और नाराजगी आम बात है और कई बार इसका नतीजा पति-पत्‍नी के बीच कुछ समय तक बातचीत बंद रहने के रूप में सामने आता है पर केवल इसी आधार पर पति को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता.

क्‍या था मामला?

यह मामला तमिलनाडु का है जहां एक व्‍यक्ति पर अपनी पत्‍नी को आत्‍महत्‍या के लिए मजबूर करने और उसे प्रताड़‍ित करने के आरोप लगे थे. ट्रायल कोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट ने उसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498A के तहत दोषी ठहराकर 3 साल की सजा सुनाई थी. आरोप था कि वह 13 दिनों तक अपनी पत्‍नी से बात नहीं कर रहा था और इसी मानसिक पीड़ा के कारण पत्‍नी ने फांसी लगाकर आत्‍महत्‍या कर ली. पत्‍नी अपने मायके में रह रही थी वहीं उसने आत्‍महत्‍या की. आरोप था कि शादी के समय उसके माता-पिता ने 3 लाख रुपये, 20 सोने के गहने और अन्‍य सामान दिए थे. इसके बाद में पति पर यह भी आरोप लगा कि वह पत्‍नी पर मायके से और पैसे लाने का दबाव डालता था जबकि ससुरालवाले भी अतिरिक्त दहेज की मांग को लेकर उसे लगातार परेशान करते थे.

प्रॉस‍िक्‍यूशन की थी क्‍या दलील?
प्रॉसिक्‍यूशन का यह भी कहना था कि पत्‍नी जब अपने मायके गई तो पति और उसके परिवार को यह पसंद नहीं आया. पति ने उसे डांटा, उसकी इस बात पर नाराजगी जताई और फोन पर भी बात करना बंद कर दी. आरोप के मुताबिक, 13 दिनों तक पति की यह चुप्‍पी पत्‍नी के लिए इतनी बड़ी मानसिक पीड़ा बन गई कि उसने जान दे दी.

पत‍ि पर क्‍या था आरोप?
इन आरोपों के आधार पर पति के खिलाफ IPC की धारा 498A (क्रूरता) और 304B (दहेज उत्‍पीड़न से मौत) के तहत केस दर्ज किया गया। साथ ही ससुर, सास और दो देवरों (जिनमें से एक नाबालिग था) पर भी मामला दर्ज हुआ. नाबालिग के खिलाफ ट्रायल नहीं हुआ जबकि बाकी 4 आरोपितों के खिलाफ मुकदमा चला. ट्रायल कोर्ट ने पति को 498A के तहत दोषी ठहराया, जिसे हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा. पति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका भी हाई कोर्ट ने खारिज कर दी.

सुप्रीम कोर्ट में क्‍या हुआ?

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो जस्टिस जे के महेश्‍वरी और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने पूरे रिकॉर्ड और निचली अदालतों के फैसलों को परखा. सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पति के खिलाफ मुख्य आरोप यही थे कि

1. उसने पत्‍नी से फोन पर बात नहीं की,
2. वह इस बात से नाराज था कि पत्‍नी बिना ससुरालवालों को बताए मायके चली गई,
3. इस रवैये से पत्‍नी आहत हुई और उसने आत्‍महत्‍या कर ली.

पीठ ने साफ किया कि प्रॉसिक्‍यूशन पर यह भार होता है कि वह आरोपों को संदेह से परे साबित करे. आरोपी को यह साबित करने की बाध्‍यता नहीं होती कि वह निर्दोष है खासकर धारा 498A जैसे मामलों में. कोर्ट ने कहा कि केवल यह दिखा देना कि पति ने 13 दिन बात नहीं की. अपने आप में ‘क्रूरता’ साबित करने के लिए काफी नहीं है, जब तक कि इसे पुख्‍ता सबूतों से समर्थित न किया जाए और यह न दिखाया जाए कि उसका व्‍यवहार इतना गंभीर था कि वह पत्‍नी को आत्‍महत्‍या की ओर धकेल दे.

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि..

– यह मामला ऐसा नहीं था जहां पति-पत्‍नी के बीच किसी झगड़े या मारपीट का ठोस प्रमाण हो.
– निचली अदालतों ने इस बात का समुचित आकलन नहीं किया कि आरोपों को मजबूत सबूतों से साबित किया गया या नहीं.
– ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ने इस बात पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया कि क्रूरता का आरोप कितनी गंभीरता से सिद्ध हुआ.

कोर्ट ने यह भी पाया क‍ि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के अनुसार, पत्‍नी अपने पति के साथ मसकट नहीं जा सकी थी क्‍योंकि उसके पासपोर्ट के कुछ जरूरी औपचारिकताएं पूरी नहीं हुई थीं इसलिए उसका वीजा जारी नहीं हो पाया. यानी यह कहना कि पति उसे विदेश नहीं ले गया और इसलिए वह परेशान होकर जान दे बैठी, रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्‍यों से मेल नहीं खाता.

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्‍पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कुछ महत्‍वपूर्ण बातें स्‍पष्‍ट कीं:

1. वैवाहिक जीवन में मतभेद और दूरी:
कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा जीवन में मतभेद और खटपट होना असामान्‍य नहीं है. कभी-कभी ऐसे मतभेदों की वजह से पति-पत्‍नी के बीच कुछ समय के लिए बातचीत बंद भी हो सकती है लेकिन हर ऐसी स्थिति को ‘क्रूरता’ नहीं कहा जा सकता, जब तक कि उसके साथ गंभीर उत्‍पीड़न, हिंसा या मानसिक यातना का ठोस प्रमाण न हो.

2. 13 दिन बात न करना = क्रूरता नहीं? 
पीठ ने साफ कहा क‍ि किसी भी तरह के ठोस सबूत के बिना केवल 13 दिन तक मृतका से बात न करना. इस मामले के तथ्‍यों में किसी भी तरह की कल्‍पना में क्रूरता की परिभाषा में नहीं आ सकता. यानी सिर्फ नाराज होकर या किसी कारणवश कुछ दिन बात न करना, अपने आप में IPC की धारा 498A के तहत अपराध नहीं बन जाता.

3. क्रूरता की गंभीरता कैसी होनी चाहिए:
कोर्ट ने स्‍पष्‍ट किया कि ऐसे मामलों में यह देखना जरूरी है कि आरोपी के कथित व्‍यवहार की गंभीरता इतनी हो कि वह किसी महिला को आत्‍महत्‍या करने, खुद को चोट पहुंचाने या उसकी मानसिक सेहत को गंभीर खतरे में डाल दे. केवल मामूली नाराजगी, असंतोष या कुछ समय की चुप्पी को आपराधिक क्रूरता नहीं कहा जा सकता.

4. सबूतों की कसौटी:
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि प्रॉसिक्‍यूशन को आरोपों को संदेह से परे साबित करना होता है। यहां ऐसा कोई ठोस, संगत और विश्वसनीय सबूत नहीं था जो यह दिखाए कि पति की चुप्पी और कथित नाराजगी इतनी गंभीर थी कि उसने पत्नी को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया.



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