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दो छात्रावास और सात शौचालय बनाने में ₹3.10 करोड़ खर्च हो गए,...




भास्कर न्यूज | लातेहार जिले में विभिन्न विभागों द्वारा भवन निर्माण और जीर्णोद्धार के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। लेकिन इनमें से कई भवन आज भी अनुपयोगी साबित हो रहे हैं। सरकारी योजनाओं के तहत बनाए गए छात्रावास और मॉडल शौचालय अपनी उपयोगिता साबित नहीं कर सके हैं। ऐसे में सरकारी धन के उपयोग और योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। लातेहार, चंदवा और बरवाडीह प्रखंडों में तीन ऐसी योजनाएं सामने आई हैं, जिन पर करीब ₹3.10 करोड़ खर्च किए गए, लेकिन आम लोगों को उसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। कहीं भवन वर्षों से हैंडओवर का इंतजार कर रहा है तो कहीं जीर्णोद्धार पर बार-बार राशि खर्च करने के बावजूद उपयोग में नहीं लाया जा रहा है। कहीं हैंडओवर की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई तो कहीं संचालन शुरू ही नहीं किया गया है। ^मुझे इसकी जानकारी नहीं थी, यदि ऐसा है तो मामले की जांच कराई जाएगी। उपयोगी योजनाओं में ही सरकारी राशि खर्च हो, इसका लगातार प्रयास किया जा रहा है।^ -संदीप कुमार, डीसी लातेहार। लातेहार में 1.75 करोड़ के मॉडल शौचालय, लेकिन उपयोग न के बराबर : नगर पंचायत क्षेत्र में ललमटिया, बानपुर, डुरूआ, चंदनडीह सहित सात स्थानों पर मॉडल शौचालयों का निर्माण कराया गया। प्रत्येक शौचालय पर लगभग ₹25 लाख खर्च हुए। कुल लागत करीब ₹1.75 करोड़ आई। अधिकांश शौचालय ऐसे स्थानों पर बनाए गए जहां लोगों की आवाजाही कम है। कई शौचालयों में दिनभर ताला लगा रहता है। कुछ का संचालन केवल नाममात्र के लिए हो रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि इनका निर्माण व्यस्त बाजारों और सार्वजनिक स्थलों पर किया जाता तो उनकी उपयोगिता कहीं अधिक होती। बरवाडीह में एक ही छात्रावास में तीन बार राशि खर्च, फिर भी नहीं शुरू हुआ : बरवाडीह प्रखंड में वर्ष 2004 में ₹20 लाख की लागत से आदिवासी बालिका छात्रावास का निर्माण कराया गया। वर्ष 2016 में इस भवन के जीर्णोद्धार पर ₹15 लाख खर्च किए गए। वर्ष 2026 में फिर से उसी भवन के जीर्णोद्धार के नाम पर ₹40 लाख खर्च कर दिए गए। तीन चरणों में कुल ₹75 लाख खर्च होने के बाद भी छात्रावास शुरू नहीं हो सका है। चंदवा में 33 साल बाद भी शुरू नहीं हो सका छात्रावास : चंदवा प्रखंड में वर्ष 1992 में करीब ₹10 लाख की लागत से आदिवासी बालक छात्रावास का निर्माण कराया गया था। निर्माण के बाद भवन का विधिवत हैंडओवर नहीं हो सका। 33 साल बाद जिला परिषद द्वारा ₹49.82 लाख खर्च कर भवन का जीर्णोद्धार कराया गया। जीर्णोद्धार कार्य पूरा हुए करीब सात माह बीत चुके हैं, लेकिन अब तक भवन संबंधित विभाग को हैंडओवर नहीं किया गया है।



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