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न शादी, न अपना परिवार… राजस्थान के इस शख्स के हैं 60...


पाली: कहते हैं कि एक-दो बच्चों की परवरिश करना और उन्हें संभालना ही आज के दौर में सबसे बड़ी जिम्मेदारी माना जाता है. लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि इस दुनिया में और खासकर हमारे राजस्थान में एक ऐसा व्यक्ति भी है, जिसके एक नहीं, दो नहीं, बल्कि पूरे 60 हजार बच्चे हैं! जी हां, चौंकिए मत. यह बिल्कुल सच है. और ये अनोखा पिता अपने इन 60 हजार बच्चों को सिर्फ पालता ही नहीं है, बल्कि उनसे बेइंतहा मोहब्बत करता है, उनका पूरा ख्याल रखता है. यह हम नही कहते यह कहते है खुद पर्यावरण प्रेमी रविंद्र काबरा जो इनको अपने बच्चो की तरह ही केयर करते है. दिन में 10 घंटे इनकी देखरेख करते है. इनका मानना है कि अगर हमें एक हेल्दी जीवन जीना है, तो हमें प्रकृति से जुड़ना होगा और पौधों को अपने बच्चों की तरह प्यार देना होगा. आज के इस दौर में जहां लोग बड़ी-बड़ी गाड़ियों और सुख-सुविधाओं को लग्जरी मानते हैं, वहीं इस शख्स ने ‘ग्रीनरी’ को ही अपनी असली लग्जरी मान लिया है.

पर्यावरणविद रविंद्र काबरा ने बताया, ग्रीनरी के लिए काम करते हुए मुझे 55 साल हो गए. उन्हे इसकी प्रेरणा उनके दादा जी से मिली क्योंकि वह भी इस तरह से 5-5 घंटे गार्डनिंग को दिया करते थे. पहले 45 प्लांट से इसकी शुरूअता की थी ओर आज मेरे पास 60 हजार बच्चे (प्लांट्स) हो गए है. जब 60,000 हो गए तो मैंने पर्यावरण को महत्ता देते हुए जोधपुर के मेड़तीगेट से अपना पूरा गार्डन जवाई बांध बीसलपुर ब्रिज पर शिफ्ट किया है. इसे ‘गोकुल: द वैली ऑफ फ्लावर्स’ का नाम दिया गया. अब सपने में ही मुझे मेरे बच्चे दिखाई देते है.

400 से भी ज्यादा किस्म के प्लांट्स 
यहां 400 किस्म के प्लांट्स हैं. जिनमें कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, जापान, उत्तरप्रदेश, साउथ और विदेशी किस्मों के अलावा भारत भर के प्लांट्स मौजूद हैं. यहां 35 कलर की लिलि, 80 कलर्स के चंपा, 70 कलर में बोगनवेलिया, 150 प्रकार के अडेनियम, 50,000 सीजनल, 70 प्रकार के फ्रूट्स और 500 प्रकार के बड़े पेड़ हैं. हाइड्रेजिया, ट्यूलिप, हेलिकेर्निया, बर्ड ऑफ पैरेडाइज सहित बड़े प्लांट्स में लेजेस्टोनिया, स्पेथोडिया, बॉटल ब्रश हैं. आम, जामुन, अमरूद, संतरा, मौसमी, आंवला, नींबू, चीकू, शहतूत, सीताफल सहित प्लांट्स वैरायटियां हैं. ये पर्यावरण को दुरुस्त बनाने के साथ विशेष प्रकार की जीव जंतुओं को सेफ्टी, भोजन और सुकून दे रहे हैं.

मां जैसे बच्चो की समझ जाते है हर परेशानी 
एक मां जैसे अपने बच्चों से जडती है तो उनकी हर तकलीफ और परेशानी को समझती है काबरा का भी अपने बच्चो से कुछ ऐसा ही कनेक्शन है. काबरा का कहना है कि मेने आज तक न तो कभी गूगल किया न ही कोई किताब पढी है बच्चो ने ही अपने हर जरूरत को बताया है और आज मैं इतना कह सकता हूं कि इनकी छोटी सी और बडी तकलीफ पांच मिनट इनके पास आकर खडा होता हूं तो यह खुद अपने आप अपने भाव प्रकट करते है.

जोधपुर से पाली के जवाई तक का सफर 
काबरा कहते है कि वह बरसों पूर्व जंवाई बांध फोटोग्राफी करने जाता था. उसी समय ये जगह मुझे पसंद आ गई थी. जब जोधपुर में प्लांट्स बढ़े तो मैंने यहां करीब डेढ़ लाख स्क्वायर फीट में मेंटेन करना शुरू किया. यहां आने के बाद पता चला कि यहां जमीन में एक फीट के नीचे ग्रेनाइट, मिट्टी कम मूंगिया अधिक है. इसको डवलप करना मुश्किल था. एक साल की मेहनत के बाद ये तैयार हुआ. इन प्लांट्स के वेस्ट से हर दिन 25 किलो से अधिक ऑर्गेनिक खाद भी मिल जाती है. री-साइकिल टेक्निक यूज करने के बाद भी हर माह 60 हजार का खर्चा आता है. 80 प्रतिशत तक पानी मै खुद ही प्लांट्स को पिलाता हूं.



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