‘आपने रॉन्ग नंबर डायल कर दिया है. यह प्रदर्शन और नारेबाजी का अच्छा सीजन है, आप भी ऐसा कर सकते हैं.’ सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को एक याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya kant) ने अपने मजाकिया अंदाज से अदालत का माहौल हल्का कर दिया. अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित विधानसभा और संसदीय सीटों को समय-समय पर बदलने यानी रोटेशन की मांग लेकर पहुंचे याचिकाकर्ता के वकील से सीजेआई सूर्यकांत ने मजाकिया महजे में इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन की सलाह दी.
दरअसल, याचिकाकर्ता चाहता था कि लंबे समय से आरक्षित चली आ रही सीटों को बदलने के लिए रोटेशन की व्यवस्था लागू की जाए. उसका तर्क था कि कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में दशकों से आरक्षण जारी रहने के कारण चुनावी मुकाबला सीमित हो गया है और कुछ परिवारों को बार-बार चुनाव लड़ने का मौका मिल रहा है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि यह फैसला अदालत नहीं, बल्कि संसद और संबंधित विधायी संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में आता है.
‘संसद तक अपनी आवाज पहुंचाइए, हम देश नहीं चला सकते’
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच के सामने जब याचिका पर सुनवाई हुई, तो सीजेआई ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि वह इस मुद्दे को लेकर अदालत क्यों आए हैं, विधायिका के सामने अपनी बात क्यों नहीं रखते. उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि यह प्रदर्शन और नारेबाजी का दौर है, इसलिए याचिकाकर्ता को भी उसी तरह अपनी आवाज उठानी चाहिए.
वकील ने जवाब दिया कि उनका प्रदर्शन करने का कोई इरादा नहीं है और गला खराब होने की वजह से वह नारेबाजी भी नहीं कर सकते. इस पर सीजेआई ने कहा कि वह अपनी आवाज उठा सकते हैं और जनप्रतिनिधियों से कह सकते हैं कि अब संसद के लिए इस मुद्दे पर कुछ करने का समय आ गया है.
बेंच की टिप्पणी का संदेश साफ था कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के रोटेशन का फैसला राजनीतिक और विधायी प्रक्रिया के जरिए ही होना चाहिए. अदालत इस मामले में संसद की जगह नहीं ले सकती.
1952 से आरक्षित है यूपी की कादीपुर सीट
यह याचिका उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर विधानसभा सीट से जुड़े मतदाता जगदीश सिंह ने दाखिल की थी. याचिकाकर्ता का दावा था कि यह सीट 1952 में पहले चुनाव के बाद से लगातार अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रही है. उनका आरोप था कि लंबे समय तक सीट के आरक्षित रहने से केवल तीन-चार या चार-पांच परिवारों को बार-बार चुनाव लड़ने का अवसर मिला.
याचिका में मांग की गई थी कि विधानसभा और संसद की आरक्षित सीटों के लिए भी समय-समय पर रोटेशन की व्यवस्था लागू की जाए. याचिकाकर्ता ने दलील दी कि पंचायत और नगर निकाय चुनावों में आरक्षण के रोटेशन की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों में ऐसा नहीं किया जाता.
उनका कहना था कि एक ही सीट लंबे समय तक आरक्षित रहने से मतदाताओं के सामने उम्मीदवार चुनने के विकल्प सीमित हो जाते हैं. याचिका में इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 के अधिकारों से जोड़ते हुए चुनौती दी गई थी.
‘वोट देने का अधिकार खत्म नहीं होता’
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि किसी निर्वाचन क्षेत्र के आरक्षित होने से मतदाता का वोट देने का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता. उन्होंने कहा कि उम्मीदवार के विकल्प सीमित हो सकते हैं, लेकिन मतदाता अपना वोट डालने के अधिकार से वंचित नहीं होता.
जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि यह मान लेना सही नहीं होगा कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में बहुसंख्यक समुदाय के लोग केवल जाति या समुदाय के आधार पर ही वोट करते हैं. बहुदलीय लोकतंत्र में मतदाता राजनीतिक दलों और उनकी विचारधारा के आधार पर भी मतदान करते हैं. ऐसे में अदालत यह तय नहीं कर सकती कि मतदाता किस आधार पर अपना वोट डालेंगे.
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने का अवसर न मिलने का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति का चुनाव लड़ने का अधिकार पूरी तरह सीमित हो गया. वह अन्य गैर-आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से भी चुनाव लड़ सकता है.
‘हम संसद का तीसरा सदन नहीं बन सकते’
याचिकाकर्ता के वकील ने संविधान के अनुच्छेद 243D और 243T का हवाला दिया. इन प्रावधानों के तहत पंचायतों और नगरपालिकाओं में आरक्षण और सीटों के रोटेशन की व्यवस्था है. वकील ने दलील दी कि इसी सिद्धांत को विधानसभा और लोकसभा की आरक्षित सीटों पर भी लागू किया जाना चाहिए.
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि स्थानीय निकायों के चुनावों के लिए संविधान में अलग व्यवस्था है. संसद और विधानसभा की सीटों के आरक्षण का ढांचा अलग है. अदालत संविधान के प्रावधानों को नए सिरे से लिखकर उनमें रोटेशन की व्यवस्था नहीं जोड़ सकती.
उन्होंने कहा, “हम संसद के तीसरे सदन की भूमिका नहीं निभा सकते.’ पीठ के मुताबिक, अगर किसी कानून में स्पष्ट मनमानी दिखाई देती है तो अदालत उसकी संवैधानिकता की जांच कर सकती है, लेकिन केवल यह कहकर किसी व्यवस्था को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता कि उसमें बदलाव वांछनीय है.
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की अपील, विधायकों के पास जाने की दी सलाह
याचिका में परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) को भी चुनौती दी गई थी. याचिकाकर्ता ने परिसीमन आयोग की 2008 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के रोटेशन पर विचार करने की सिफारिश की गई थी. लेकिन पीठ ने कहा कि परिसीमन के दिशा-निर्देश उस प्रक्रिया के दौरान लागू होते हैं और उनसे लगातार रोटेशन की अनिवार्यता नहीं निकलती.
अदालत ने माना कि आरक्षित सीटों के रोटेशन का मुद्दा विधायिका और संवैधानिक संस्थाओं के विचार का विषय है. इस आधार पर उसने हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया और अपील खारिज कर दी. हालांकि, याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी गई कि वह अपने जनप्रतिनिधियों के सामने यह मुद्दा उठाए और परिसीमन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप बदलाव की मांग करे.