CJP Protest on NEET Paper Leak: आभासी दुनिया की उपज काक्रोच जनता पार्टी (CJP) ने NEET परीक्षा के पेपर लीक के मुद्दे पर आंदोलन शुरू किया है. आंदोलन का मुद्दा जितना जायज और जरूरी है, उतने ही खतरनाक इसके इरादे लगते हैं. सरकार ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर इसके धरने में आरंभिक दिनों में कोई अवरोध पैदा नहीं किया. तब भी नहीं, जब वहां 3 हफ्ते तक अनशन पर रहे सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की खराब होती हालत के बावजूद आभासी अंदाज में बनी कॉकरोच जनता पार्टी के कर्ता-धर्ताओं ने उन्हें मनाने की कोई पहल नहीं की. दिल्ली हाईकोर्ट ने जब इस पर चिंता जताई तो पुलिस और प्रशासन को सोनम की सलामती के लिए हरक़त में आना पड़ा. अदालत के रुख को देखते हुए पुलिस ने उन्हें उठा कर सफदर जंग अस्पताल में भर्ती कराया. आंदोलनकारियों ने अब नया बखेड़ा संसद मार्च का शुरू किया है. वे केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पेपर लीक का दोषी ठहराते हुए उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं.
आश्चर्य इस बात पर होता है कि विपक्षी पार्टियां पहले कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को भाजपा का मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने वाला तिकड़म मान रही थीं और अब मुद्दा गरमाने पर समर्थन का प्रहसन कर रही हैं. पीएम मोदी के आवास के बाहर राहुल गांधी कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ धरने पर बैठे. साथ देने समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव भी उपस्थित हो गए. पुलिस ने उन्हें वहां से जबरन हटाया. ये वही राहुल गांधी हैं, जिन्हें नाम लेकर काक्रोच जनता पार्टी के संस्थापक दीपके ने बुलाया था. दीपके का इन्विटेशन तो ओपन था, लेकिन शुरू में संदेह की नजरों से देखने वाले विपक्षी नेता तब जाग्रत हुए, जब उन्हें लगा कि इससे राजनीतिक रोटी सेंकी जा सकती है. बंगाल हार चुकीं ममता बनर्जी ने भी CJP के आंदोलन में शामिल होने की इच्छा जताई है.
सीजेपी के समर्थन में राहुल-केजरीवाल
इस बीच आम आदमी पार्टी (AAP) ने CJP के समर्थन में राहुल गांधी के धरना को लेकर तीखी टिप्पणी की है. ‘आप’ सांसद संजय सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि CJP के विरोध प्रदर्शन को कमजोर करने के लिए पीएम मोदी ने राहुल गांधी को अपने ही आवास के बाहर धरने पर बिठा दिया है. दिल्ली की पूर्व सीएम आतिशी और सोमनाथ भारती सहित आम आदमी पार्टी के कई नेताओं ने इसे कांग्रेस और भाजपा की फिक्सिंग करार दिया है. उन्होंने सवाल उठाया है कि जब जंतर-मंतर पर CJP और सोनम वांगचुक एक महीने से प्रदर्शन कर रहे हैं तो सरकार उनसे बात नहीं करती, लेकिन राहुल गांधी को आसानी से पीएम आवास के बाहर धरना देने की अनुमति मिल जाती है. AAP के संयोजक और दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल खुद जंतर-मंतर पर CJP प्रदर्शनकारियों और सोनम वांगचुक से मिलने पहुंचे थे, जबकि राहुल गांधी जंतर-मंतर न जाकर पीएम आवास के बाहर अलग धरना पर बैठ गए.
आजादी से अब तक के आंदोलन और सबक
आजादी के अवज्ञा आंदोलन से लेकर अब तक भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही है कि जब कोई बात अनुकूल न लगे तो आंदोलन करो. यह अहिंसक आंदोलन माना जाता है. पर, सच यह है कि आजादी के बाद का जय प्रकाश नारायण का 1974 का आंदोलन इसलिए सफल हुआ कि उसके पीछे एक परिपक्व राजनेता का दिमाग था. व्यवस्था बदलने की मांग पर करीब 5 दशक पहले शुरू हुआ आंदोलन सत्ता परिवर्तन का आधार इसलिए बना कि विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने में जेपी कामयाब हो गए. पर, 1980 में सब व्यर्थ हो गया, जब इंदिरा गांधी पूरे दमखम के साथ वापस आ गईं. आंदोलन से उपजी सत्ता का अंत हो गया. व्यवस्था परिवर्तन के लिए जेपी ने आंदोलन का अलख जगाया था, लेकिन सत्ता बदलने तक ही बात सीमित रह गई.
जेपी मूवमेंट से लेकर अन्ना आंदोलन तक
जेपी मूवमेंट के अर्सा बाद अन्ना आंदोलन शुरू हुआ. वह भी लोक हित के लिए ही था. आंदोलनों का उद्देश्य जनहित का ही होता है, लेकिन यहां भी लोगों का भ्रम टूटा. अन्ना के आंदोलन की कोख से आम आदमी पार्टी का उदय हुआ और इसका अंत आम आदमी पार्टी की सरकार की लाटशाही और लापरवाही के कारण हो गया. तब से आम आदमी का भरोसा आंदोलनों से उपजी सरकारों से उठ गया है. बांग्लादेश और नेपाल में भी आंदोलनों के बाद सत्ता बदल गई, लेकिन स्थितियों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है. काक्रोच जनता पार्टी में कुछ लोग सरकार बदल देने की संभावनाएं देख रहे हैं, लेकिन अभी तक के अनुभव यही बताते हैं कि अव्वल तो यह संभव नहीं और संभव हुआ भी तो बदलाव के स्थायी रहने की संभावनाएं संदिग्ध हैं.
आंदोलन और उसकी उपलब्धियां
अब जरा नजर डालते हैं उन आंदोलनों और उनकी उपलब्धियों पर, जिन्हें अतीत में अवाम ने देखा है. आजादी के बाद देश में कई सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आंदोलन हुए हैं. ये आंदोलन लोकतंत्र को मजबूत करने, अधिकारों की रक्षा करने और नीतियों में बदलाव लाने के लिए हुए, लेकिन स्थितियां पहले से भी भयावह हो गईं. जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की उपलब्धि सत्ता परिवर्तन तक सीमित रही. बड़े आंदोलनों में 2020-21 का किसान आंदोलन भी शुमार है. फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और कृषि नीतियों के लिए किए इस आंदोलन की उपलब्धि यह रही कि सरकार को तीन कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा. इस आंदोलन को भी राजनीतिक रंग देने की भाजपा विरोधी पार्टियों ने कोशिश की. पर, भाजपा सरकार ने किसान नेताओं से बात कर मामले को सलटा लिया.
कहीं सियासी दल न उठा ले फायदा
CJP का आंदोलन आगे चल कर कौन-सा रूप अख्तियार करेगा, यह आने वाले समय में पता चलेगा. पर, सच यह है कि इस आंदोलन की आग में अब विपक्षी पार्टियां राजनीति की रोटी सेंकने से पीछे नहीं हटेंगी. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी को अभी सरकार विरोधी ऐसे आंदोलन की जरूर भी है. अगले साल 2027 में 5 राज्यों- उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव होने हैं. कांग्रेस पंजाब में वापसी के लिए कुलबुला रही है तो आम आदमी पार्टी अपनी सरकार रिपीट करने की फिराक में हैं. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को अपनी जमीन पुख्ता करनी है. यही वजह है कि महीने भर पहले शुरू हुए CJP के आंदोलन से दूर रहने वाले राहुल गांधी, अखिलेश यादव के साथ आम आदमी पार्टी का पूरा कुनबा अपने-अपने ढंग से युवाओं के साथ खड़े रहने का अब भरोसा जताने लगे हैं. वैसे भी राहुल गांधी की मंशा देश में जेन-जी आंदोलन खड़ा करने की पहले से रही है. भाजपा भी इनके मंसूबों पर पानी फेरने में कोई कसर शायद ही छोड़े. यही वजह रही कि जेपी नड्डा ने आंदोलनकारियों के प्रतिनिधिमंडल से बात की. उपद्रव में घायल युवक से मिलने विपक्षी नेताओं की तरह अस्पताल गए. पीएम आवास के बाहर धरना दे रहे राहुल गांधी को मनाने जीतेंद्र सिंह गए.
बातचीत ही आखिर बेहतर विकल्प
युवाओं का आंदोलन सियासत की भेंट नहीं चढ़ा तो इसके अच्छे परिणाम जरूर निकल सकते हैं. यह बात CJP समर्थकों को सोचनी पड़ेगी. राजनीतिक दलों की घुसपैठ के कारण ही जंतर-मंतर पर भाजपा, मोदी, आरएसएस और जातीय-धार्मिक उन्माद भड़काने वाले नारे लग रहे हैं. इस पर इतराने वाले यह भूल जाते हैं कि आंदोलन का मकसद प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी रोकना है. धर्मेंद्र प्रधान से भी आंदोलनकारियों की कोई व्यक्तिगत खुन्नस नहीं है. शिक्षा मंत्री के नाते वे युवाओं के गुस्से का शिकार बने हैं. सरकार को भी चाहिए कि वे आंदोलनकारियों से बातचीत करे. उन्हें भरोसा दिलाए कि आगे ऐसी गड़बड़ियां नहीं होंगी. बातचीत से बड़ी-बड़ी समस्याओं का निदान हो जाता है. सच तो यह है कि समस्या के समाधान के लिए बातचीत ही अंतिम और उपयुक्त विकल्प है.