E20 Petrol Ethanol Blending: E20 पेट्रोल अब सिर्फ पेट्रोल पंप का मामला नहीं रह गया है. यह करोड़ों वाहन मालिकों की जेब, गाड़ी की सेहत और सरकार की नीति पर भरोसे का सवाल बन चुका है. एक तरफ केंद्र सरकार और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी लगातार कह रहे हैं कि E20 पूरी तरह सुरक्षित है और इसके खिलाफ चल रहा अभियान महज प्रोपेगेंडा है. दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल इस मुद्दे को लेकर लगातार सरकार और ऑटो कंपनियों से सवाल पूछ रहे हैं. सोशल मीडिया पर हजारों लोग अपनी गाड़ियों के खराब होने, माइलेज घटने और फ्यूल सिस्टम में दिक्कत आने के दावे कर रहे हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आम गाड़ी मालिक आखिर किसकी बात माने? सरकार की, कंपनियों की या फिर उन लोगों की जो अपने अनुभव के वीडियो और बिल सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं. यही वजह है कि E20 अब तकनीकी बहस से निकलकर राजनीतिक और जनसरोकार का बड़ा मुद्दा बन गया है.
इस पूरे विवाद को और हवा तब मिली जब अरविंद केजरीवाल ने 29 ऑटोमोबाइल कंपनियों को पत्र लिखकर उनसे लिखित जवाब मांगा. उनका दावा है कि कई कंपनियों के पुराने ओनर्स मैनुअल में E10 से अधिक एथेनॉल वाले पेट्रोल के इस्तेमाल से बचने की सलाह दी गई थी. वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी खुले मंच से चुनौती दे रहे हैं कि यदि किसी की गाड़ी E20 की वजह से खराब हुई है तो उसे सामने लाकर दिखाया जाए. इसी बीच नीति आयोग की पुरानी रिपोर्ट, कंपनियों की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने बहस को और तेज कर दिया है.
केजरीवाल ने 29 कंपनियों को क्यों लिखी चिट्ठी?
- अरविंद केजरीवाल ने E20 पेट्रोल को लेकर सीधे 29 ऑटोमोबाइल कंपनियों से जवाब मांगा है. उनका कहना है कि कंपनियों के ओनर्स मैनुअल और सार्वजनिक बयानों में विरोधाभास दिखाई देता है. उन्होंने दावा किया कि कई कंपनियों के मैनुअल में साफ लिखा गया था कि साल 2023 से पहले बनी गाड़ियों में 10 प्रतिशत से अधिक एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. केजरीवाल का कहना है कि ओनर्स मैनुअल कंपनी और ग्राहक के बीच हुए समझौते का हिस्सा होता है. ऐसे में यदि कंपनियां अब कुछ और कह रही हैं तो उन्हें लिखित रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए.
- अरविंद केजरीवाल ने यह भी कहा कि वह अगले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पत्र लिखेंगे. उन्होंने सरकार से अपील की कि E20 पेट्रोल को अनिवार्य बनाने के बजाय विकल्प के तौर पर उपलब्ध कराया जाए. उनका दावा है कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में करोड़ों पुराने वाहन प्रभावित हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि, ‘हमारे देश में 22 करोड़ मोटरसाइकिल ऐसी हैं जो E20 कंप्लायंट नहीं हैं. 8 करोड़ कारें ऐसी हैं जो E20 कंप्लायंट नहीं हैं. सरकार की इस जिद की वजह से 30 करोड़ व्हीकल्स रिस्क पर हैं. मेरी हाथ जोड़कर विनती है मोदी जी से, जिद मत करो, मान जाओ. जनता सिर्फ एक चीज मांग रही है कि E20 पेट्रोल को ऑप्शनल कर दीजिए.’
- केजरीवाल का यह भी कहना है कि वह एथेनॉल ब्लेंडिंग के विरोध में नहीं हैं. उनका कहना है कि यदि इससे देश को फायदा होता है तो एथेनॉल मिलाया जाना चाहिए, लेकिन पुरानी गाड़ियों के लिए सुरक्षित विकल्प भी उपलब्ध रहना चाहिए ताकि वाहन मालिकों को नुकसान न उठाना पड़े.
गडकरी बोले- एक भी गाड़ी दिखा दो जो E20 से खराब हुई हो
- जहां विपक्ष सवाल उठा रहा है, वहीं केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी E20 पेट्रोल को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नजर आते हैं. उन्होंने सोशल मीडिया पर चल रहे दावों को राजनीतिक प्रचार और पेड कैंपेन बताया. गडकरी ने खुली चुनौती देते हुए कहा कि यदि किसी की गाड़ी E20 पेट्रोल की वजह से खराब हुई है तो उसे सामने लाकर दिखाया जाए.
- गडकरी ने कहा, ‘ये पॉलिटिकली मैनिपुलेटेड झूठा प्रचार है. मैं पूछता हूं कि जितनी गाड़ियां खराब हुई हैं, उनमें से कोई एक गाड़ी लेकर आइए. मैं ऑटो कंपनी से उसकी टेस्टिंग कराऊंगा और जो भी नतीजा आएगा, वह सबके सामने रखूंगा. कोई गाड़ी नहीं है. प्रोपेगेंडा हो रहा है. पेड कैंपेन चलाया जा रहा है.’
- गडकरी का कहना है कि सरकार और ऑटोमोबाइल कंपनियों ने लंबी टेस्टिंग के बाद ही E20 को लागू किया है. इसलिए बिना वैज्ञानिक प्रमाण के लोगों को डराने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए. हालांकि उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने अपनी गाड़ियों के वीडियो और रिपेयरिंग के बिल साझा करने शुरू कर दिए.
सोशल मीडिया पर लोगों ने क्या-क्या दावे किए?
- गडकरी की चुनौती के बाद सोशल मीडिया पर कई वीडियो तेजी से वायरल होने लगे. कुछ लोगों ने दावा किया कि E20 पेट्रोल भरवाने के बाद उनकी कार का माइलेज अचानक कम हो गया. कुछ ने फ्यूल पंप, फ्यूल फिल्टर और अन्य पुर्जों में खराबी आने की बात कही. कई बाइक मालिकों ने भी दावा किया कि पहले की तुलना में इंजन की परफॉर्मेंस कमजोर हुई है.
- एक वायरल वीडियो में एक वाहन मालिक अपनी कार का माइलेज रिकॉर्ड दिखाते हुए कहता है कि पहले उसकी गाड़ी 14 से 15 किलोमीटर प्रति लीटर का औसत देती थी, लेकिन अब यह घटकर लगभग 10 किलोमीटर प्रति लीटर रह गया है. वहीं एक अन्य व्यक्ति ने फ्यूल पंप बदलवाने का बिल दिखाते हुए दावा किया कि यह समस्या E20 पेट्रोल इस्तेमाल करने के बाद आई.
- हालांकि इन दावों की स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है और सरकार या संबंधित कंपनियों ने इन्हें प्रमाणित नहीं माना है. दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर ऐसे वाहन मालिक भी सामने आए जिन्होंने कहा कि उन्हें E20 पेट्रोल से किसी तरह की परेशानी नहीं हुई. यही वजह है कि यह बहस अब दो धड़ों में बंट चुकी है और आम उपभोक्ता असमंजस की स्थिति में है.
जनता के वीडियो बनाम गडकरी का चैलेंज, आखिर सच किसके साथ?
एक तरफ केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी लगातार यह कह रहे हैं कि E20 पेट्रोल से किसी भी वाहन को नुकसान नहीं हुआ है. उनका दावा है कि सोशल मीडिया पर चल रहा पूरा अभियान राजनीतिक और पेड प्रोपेगेंडा है. उन्होंने खुली चुनौती देते हुए कहा कि अगर किसी की गाड़ी वास्तव में E20 की वजह से खराब हुई है तो उसे उनके सामने लाकर दिखाया जाए. उनका कहना है कि वह ऑटोमोबाइल कंपनियों से उसकी तकनीकी जांच कराएंगे और जो भी तथ्य सामने आएंगे, उन्हें सार्वजनिक करेंगे.
गडकरी ने कहा, ‘मैं पूछता हूं कि जितनी गाड़ियां खराब हुई हैं, उनमें से एक भी गाड़ी लेकर आइए. मैं ऑटो कंपनी को टेस्टिंग करने के लिए लगाऊंगा और जो कुछ भी होगा, मुझे बताइए. कहां है कोई गाड़ी? यह पॉलिटिकली मैनिपुलेटेड झूठा प्रचार है. यह पेड कैंपेन है.’ उनका यह बयान आते ही सोशल मीडिया पर बहस और तेज हो गई. कई लोगों ने वीडियो, बिल और सर्विस रिकॉर्ड शेयर करना शुरू कर दिया.
सोशल मीडिया पर लोगों ने क्या-क्या दावे किए?
गडकरी के चैलेंज के बाद कई वाहन मालिकों ने अपने अनुभव साझा किए. कुछ लोगों ने दावा किया कि E20 पेट्रोल भरवाने के बाद उनकी कार का माइलेज अचानक कम हो गया. कुछ ने फ्यूल पंप और फ्यूल फिल्टर बदलने के बिल भी सोशल मीडिया पर पोस्ट किए. हालांकि इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इन वीडियो ने बहस को और तेज कर दिया. एक वीडियो में कार मालिक ने बताया कि उसकी गाड़ी पहले लगभग 14 से 15 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज देती थी, लेकिन अब यह घटकर करीब 10 किलोमीटर प्रति लीटर रह गया है. उसने फ्यूल पंप बदलने का बिल भी दिखाया. वहीं कुछ बाइक मालिकों ने दावा किया कि इंजन की परफॉर्मेंस पहले जैसी नहीं रही और वाहन में कंपन तथा स्टार्टिंग जैसी समस्याएं आने लगीं.
तहसीन पूनावाला ने भी गडकरी को दे दिया नया चैलेंज
E20 विवाद में राजनीतिक विश्लेषक तहसीन पूनावाला भी कूद पड़े. उन्होंने कहा कि अगर केंद्रीय मंत्री वास्तव में प्रभावित लोगों से मिलना चाहते हैं तो वह खुद 6 से 10 ऐसे वाहन मालिकों को लेकर आने के लिए तैयार हैं जिन्हें E20 पेट्रोल के बाद दिक्कत आने का दावा है. पूनावाला ने कहा, ‘आदरणीय नितिन गडकरी जी कह रहे हैं कि केवल एक व्यक्ति को ले आइए जिसे E20 पेट्रोल से समस्या हुई हो. मैं उनके घर पर छह से दस ऐसे भारतीयों को लेकर आऊंगा. उनकी राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है. मेरी सिर्फ एक शर्त है कि मुलाकात कैमरे पर हो और उसकी लाइव स्ट्रीमिंग हो.’ इस बयान के बाद यह विवाद राजनीतिक चुनौती का रूप भी लेने लगा.
सरकार और तेल कंपनियां क्या कह रही हैं?
सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां लगातार यह दावा कर रही हैं कि E20 पेट्रोल पूरी तरह सुरक्षित है. हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) ने भी बयान जारी कर लोगों से अफवाहों पर भरोसा नहीं करने की अपील की. कंपनी के मुताबिक ARAI और SIAM जैसी अधिकृत संस्थाओं की टेस्टिंग में E20 को इंजन के लिए सुरक्षित पाया गया है. HPCL का कहना है कि लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर भी E20 पेट्रोल इंजन को नुकसान नहीं पहुंचाता. कंपनी ने लोगों से सोशल मीडिया के दावों के बजाय वैज्ञानिक परीक्षणों और अधिकृत रिपोर्टों पर भरोसा करने की अपील की. इसके बावजूद कई वाहन मालिकों का कहना है कि उनकी सबसे बड़ी चिंता नई गाड़ियों को लेकर नहीं बल्कि पुरानी गाड़ियों को लेकर है.
असल सवाल पुरानी गाड़ियों का है
विवाद का सबसे बड़ा केंद्र यही है कि क्या 2023 से पहले बनी सभी गाड़ियां E20 के लिए पूरी तरह उपयुक्त हैं. कई वाहन मालिकों का कहना है कि अगर उनकी गाड़ी मूल रूप से E10 के हिसाब से बनी थी तो उसे अचानक E20 पर चलाने के लिए मजबूर क्यों किया जा रहा है. उनका तर्क है कि सरकार अगर E20 लागू करना चाहती है तो कम से कम कुछ समय तक E10 पेट्रोल का विकल्प भी उपलब्ध रहना चाहिए.
यही मांग कई ऑटोमोबाइल विशेषज्ञ भी उठा रहे हैं. उनका कहना है कि नई पीढ़ी की E20 कम्प्लायंट गाड़ियों में समस्या कम हो सकती है, लेकिन पुराने वाहनों के लिए अलग नीति बनाने की जरूरत है. इसलिए बहस अब केवल E20 के पक्ष या विरोध की नहीं रही, बल्कि संक्रमण काल में करोड़ों पुराने वाहन मालिकों को क्या विकल्प मिलेगा, यह सबसे बड़ा सवाल बन गया है.
नीति आयोग की रिपोर्ट और कंपनियों के दस्तावेज क्यों बने बहस का आधार?
इस पूरे विवाद में नीति आयोग की 2021 की रिपोर्ट और कई वाहन कंपनियों के ओनर मैनुअल बार-बार चर्चा में आ रहे हैं. रिपोर्ट में बताया गया था कि E20 ईंधन अपनाने के लिए वाहन निर्माताओं को इंजन और दूसरे कंपोनेंट्स में बदलाव करने होंगे. साथ ही यह भी सुझाव दिया गया था कि संक्रमण काल में E10 ईंधन भी उपलब्ध रहना चाहिए.
इसी आधार पर विपक्ष सवाल उठा रहा है कि अगर पहले तकनीकी बदलाव जरूरी बताए गए थे तो अब यह कैसे कहा जा रहा है कि सभी पुराने वाहन बिना किसी परेशानी के E20 इस्तेमाल कर सकते हैं. दूसरी ओर कंपनियों और सरकार का कहना है कि जिन मॉडलों को E20 कम्प्लायंट घोषित किया गया है, उनकी पर्याप्त टेस्टिंग की जा चुकी है. ऐसे में अब यह विवाद केवल राजनीतिक नहीं बल्कि तकनीकी और उपभोक्ता हितों से जुड़ा मुद्दा बन चुका है.
क्या कहते हैं नीति आयोग और ऑटो इंडस्ट्री के पुराने दस्तावेज?
ई20 पेट्रोल पर सबसे ज्यादा चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि अब बहस केवल नेताओं के बयानों तक सीमित नहीं रह गई है. लोग नीति आयोग की पुरानी रिपोर्ट, ऑटो कंपनियों के ओनर्स मैनुअल और कंपनियों की वेबसाइट तक खंगाल रहे हैं. इसी आधार पर सवाल उठ रहे हैं कि अगर ई20 पूरी तरह सुरक्षित था तो पहले अलग-अलग गाइडलाइन क्यों जारी की गई थीं? 2021 में नीति आयोग की एक्सपर्ट कमेटी की ‘Roadmap for Ethanol Blending in India 2020-25’ रिपोर्ट में बताया गया था कि E20 ईंधन पर जाने के लिए वाहन निर्माताओं को इंजन और फ्यूल सिस्टम में जरूरी बदलाव करने होंगे. रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि पुराने इंजन में फ्यूल एफिशिएंसी पर असर पड़ सकता है और कंपनियों को E20 के हिसाब से अपने प्रोडक्ट तैयार करने होंगे. यही दस्तावेज अब सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर किए जा रहे हैं.
रिपोर्ट के पेज 21 का भी खूब जिक्र हो रहा है. इसमें ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की राय दर्ज है कि पूरे देश में E20 लागू किया जाए, लेकिन संक्रमण काल में E10 भी उपलब्ध रहना चाहिए ताकि पुरानी गाड़ियों के मालिकों को परेशानी न हो. यही वजह है कि अब कई लोग कह रहे हैं कि उनकी मांग एथेनॉल ब्लेंडिंग का विरोध नहीं, बल्कि विकल्प देने की है. उनका तर्क है कि नई E20-कम्प्लायंट गाड़ियों में E20 भरिए, लेकिन पुरानी गाड़ियों के लिए E10 का विकल्प भी जारी रखा जाए.
TVS और दूसरी कंपनियों की वेबसाइट पर क्या लिखा है?
E20 विवाद में TVS का ब्लॉग भी चर्चा में है. कंपनी ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि सड़क पर चलने वाली हर गाड़ी E20 के लिए नहीं बनी होती. E20 कम्पैटिबिलिटी सुनिश्चित करने के लिए इंजन, फ्यूल सिस्टम, टैंक, सील, गैस्केट और अन्य पार्ट्स में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है. ब्लॉग में यह भी कहा गया है कि पुराने वाहनों को अपग्रेड या रेट्रोफिट करना पड़ सकता है. इसी आधार पर सोशल मीडिया पर सवाल पूछा जा रहा है कि यदि ऐसे बदलाव जरूरी थे तो पुराने वाहनों के लिए यह प्रक्रिया कब और कैसे हुई? हालांकि दूसरी ओर कई वाहन निर्माता यह भी कह रहे हैं कि उनकी नई और कई पुरानी गाड़ियां E20 के लिए तैयार हैं. उदाहरण के तौर पर Honda ने अपनी वेबसाइट पर कहा है कि 1 जनवरी 2009 के बाद बनी उसकी गाड़ियां E20 मटेरियल कम्पैटिबल हैं और उनमें बिना पार्ट बदले E20 इस्तेमाल किया जा सकता है. Skoda ने भी अपनी गाड़ियों के E20 सर्टिफिकेशन का ऐलान किया है. यही विरोधाभास अब बहस का बड़ा कारण बन गया है. एक पक्ष पूछ रहा है कि यदि अलग से E20 सर्टिफिकेशन दिया जा रहा है तो इसका मतलब तकनीकी बदलाव हुए हैं, जबकि कंपनियां कह रही हैं कि उनके परीक्षणों में गाड़ियां सुरक्षित पाई गई हैं.
सरकार और तेल कंपनियां क्या कह रही हैं?
केंद्र सरकार और तेल कंपनियां लगातार यह दोहरा रही हैं कि E20 पर फैलाए जा रहे कई दावे भ्रामक हैं. हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) ने हाल ही में कहा कि ARAI और SIAM के परीक्षणों में E20 पेट्रोल इंजन के लिए पूरी तरह सुरक्षित पाया गया है. कंपनी ने लोगों से सोशल मीडिया के दावों के बजाय अधिकृत टेस्ट रिपोर्ट पर भरोसा करने की अपील की. सरकार का कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग से कच्चे तेल का आयात घटेगा, किसानों को फायदा मिलेगा और पर्यावरण पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा.
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी भी लगातार यही बात दोहरा रहे हैं कि ‘अगर किसी की गाड़ी में E20 की वजह से कोई खराबी आई है तो एक भी गाड़ी मेरे पास लेकर आइए. मैं ऑटो कंपनियों से उसकी टेस्टिंग करवाऊंगा. जहां जिम्मेदारी होगी, वहां कार्रवाई होगी. लेकिन अभी तक मेरे पास ऐसा कोई प्रमाण नहीं आया है. यह राजनीतिक रूप से प्रेरित झूठा प्रचार और पेड कैंपेन है.’ सरकार का दावा है कि E20 भारत के ऊर्जा सुरक्षा मिशन का अहम हिस्सा है और इसे लेकर भ्रम फैलाने से बचना चाहिए.
असली सवाल अब भी वही है, पुरानी गाड़ियों का क्या होगा?
पूरे विवाद के बीच सबसे बड़े सवाल का जवाब अभी भी नजर आता है. लाखों वाहन मालिक यह जानना चाहते हैं कि यदि उनकी गाड़ी पुराने मानकों पर बनी है तो क्या उसे लंबे समय तक केवल E20 पर चलाना पूरी तरह सुरक्षित रहेगा? यही वजह है कि बहस अब केवल राजनीति तक सीमित नहीं है. यह सीधे करोड़ों वाहन मालिकों से जुड़ गई है. एक तरफ सरकार और ऑटो कंपनियां E20 को सुरक्षित बता रही हैं, तो दूसरी तरफ विपक्ष, कुछ विशेषज्ञ और सोशल मीडिया पर मौजूद वाहन मालिक अपने अनुभवों के आधार पर सवाल उठा रहे हैं.
फिलहाल इस पूरे विवाद में सबसे संतुलित मांग यही दिखाई दे रही है कि सरकार यदि E20 को बढ़ावा देना चाहती है तो संक्रमण काल में E10 का विकल्प भी उपलब्ध रखे, ताकि जिन लोगों के मन में तकनीकी या आर्थिक चिंता है, उन्हें अपनी गाड़ी के हिसाब से ईंधन चुनने का विकल्प मिल सके. आने वाले दिनों में कार कंपनियों के जवाब, सरकार का रुख और तकनीकी परीक्षणों के सार्वजनिक आंकड़े ही इस बहस को अंतिम दिशा देंगे.